Pawan Jury BhilwaraRj

नील हिरण = नील गायों की आबादी कम करने के लिए उन्हें चुन चुन कर मारना --- हमारे प्रस्ताव के अनुसार -- नील हिरण का मांस खाने पर रोक लगनी चाहिए, मृत शवो के निस्तारण के लिए या तो उन्हें चिन्हित स्थान पर दफनाया जाना चाहिए या जलाया जाना चाहिए, साथ ही नील हिरण को सिर्फ तब ही गोली मारी जानी चाहिए जब वह खेतो में हो, पर जंगल में उसे मारने पर प्रतिबन्ध लगाया जाना चाहिए।
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संघ और मोदी साहेब सदा से ही भैंसों को काटकर उनका मांस निर्यात करने के प्रबल पक्षधर रहे है। और यह जानी हुयी बात है कि भैंस के निर्यात से अनधिकृत रूप से गौ-मांस के निर्यात में भी तेजी आ जाती है। संघ और मोदी साहेब दोनों ने ही कस्टम अधिकारियो को निर्यात किये जा रहे मांस की जाँच करने की अनुमति देने से मना कर दिया है, ताकि इस बात की पुष्टि न की जा सके कि निर्यातित मांस गाय का है या भैंस का।
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जैसे जैसे भैंस का निर्यात बढ़ता है वैसे ही भारत में गाय और भैंस के मांस की स्थानीय कीमतों में वृद्धि होती है। और मांस की कीमतों को नीचा बनाये रखने के लिए ही भागवत और मोदी साहेब नील हिरणों के संहार का समर्थन कर रहे है।
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नील हिरण को नील गाय कह के पुकारना गलत है। मेरे विचार में नील गाय का सम्बोधन 'अधिकृत' रूप से समाप्त किया जाना चाहिए, और इस जीव के लिए सिर्फ नील हिरण शब्द का ही प्रयोग होना चाहिए। नील गाय किसी भी पहलू से गाय नहीं है यह मूल रूप से हिरण की एक प्रजाति है।
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इस तरह से नील हिरण का वध धार्मिक रूप से अपवित्र नहीं है, लेकिन तब भी इनके संहार की अनुमति नहीं दी जानी चाहिये। यदि नील हिरण खेतों में घुस आता है, या फसलों को नुकसान पहुंचाता है तो उसे मारने की अनुमति दी जा सकती है। लेकिन सिर्फ मांस के लिए इन्हे मारने की इजाजत देने का कोई वाजिब कारण नजर नहीं आता। इसीलिए क़ानून इस तरह से होना चाहिए कि यदि नील हिरण को मारा गया है तो मृत देह को चिन्हित स्थान पर जलाया या दफनाया जाये, तथा इसे सिर्फ तब ही मारा जाए जब यह खेतों में प्रवेश करें।
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नील हिरण के मुक्त संहार से इनकी आबादी में तेजी से कमी आएगी और इससे इन पर निर्भर वन्य जीव जैसे तेंदुए, बाघ आदि उदरपूर्ति के लिए मवेशियों और यहां तक कि इंसानो को भी निशाना बनाएंगे।
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मेनका पशु गांधी का इस विषय पर अपना विरोध जताने का नाटक कर रही है। उनकी एक मात्र मांग यह है कि वरुण गांधी को उत्तर प्रदेश के लिए मुख्य्मंत्री उम्मीदवार या केंद्रीय मंत्री बनाया जाए। इसके अलावा मेनका को जीवो से कोई लेना देना नहीं है। यदि वे इस फैसले के खिलाफ होती तो उन्होंने उसी समय अपना इस्तीफा दे दिया होता जब मोदी साहेब ने नील हिरणो को मारने की अनुमति दी और साथ ही इसके मांस भक्षण पर रोक लगाने से भी साफ़ मना कर दिया।
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मोदी साेहब के साथ ही संघ के सभी अंध सेवक और सोनिया-केजरीवाल के सभी अंध भगत भी भैंस के मांस का निर्यात बढ़ाने की नीति का समर्थन कर रहे है, जिससे नील हिरण की हत्या की अनुमति देने का फैसला किया गया, और अब ये सभी नील हिरण को मारने और उनके मांस को खाने और बेचने का भी समर्थन कर रहे है। भारत स्वाभिमान ट्रस्ट के कार्यकर्ता भी इस मुद्दे पर बीजेपी-कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के साथ है। और मोदी साेहब के अंध भगत तो मोदी साहेब के हर फैसले में उनके साथ गले गले पानी तक साथ खड़े ही है।
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कुल मिलाकर देश में सिर्फ राईट टू रिकॉल पार्टी ही एक मात्र पार्टी है जो नील हिरण के संहार का विरोध करती है। हमारे ज्यादातर रिकालिस्ट्स सिर्फ नील हिरण को गोली मारने का तब समर्थन करते है जब वे खेतों में आये। साथ ही हम नील हिरण के मांस को खाने-बेचने का विरोध करते है तथा मृत देह को जलाने या दफनाने का समर्थन करते है।
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अत: मेरा सभी कार्यकर्ताओ से आग्रह है कि वे बीजेपी/कांग्रेस/आम पार्टी से किनारा कर लें और सिर्फ राईट टू रिकॉल पार्टी द्वारा प्रस्तावित कानूनों को लागू करवाने के लिए प्रयास करें।
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