Pawan Jury BhilwaraRj

भारत में कार बाजार लगातार बढ़ रहा है लेकिन कार निर्माता कम्पनियां अपना माल बेचने के चक्कर में बेहद असुरक्षित 'छोटी' कारों का निर्माण कर रही है। इससे सड़क दुर्घटनायें बढ़ती है और लोग अपनी जान गवातें है।
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वेगन-आर का उदाहरण लीजिए :
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स्पीडोमीटर पर स्पीड 180 दर्ज है, लेकिन 90 पर वाइब्रेशन शुरू हो जाता है और 100 पर गाड़ी पूरी तरह से धूजने लगती है। 110 पर पूरी तरह नियंत्रण से बाहर।
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मारुती सुजुकी गाड़ीयां बनाते समय सुरक्षा मानकों को पूरी तरह से ताक पर रख देती है। मारुती ने स्टेंडिंग सीटे लगाने के चक्कर में वेगन-आर की छत को ऊँचा उठा दिया लेकिन माइलेज बेहतर रखने के लिए गाड़ी का वजन नहीं बढ़ाया। इससे वेगन-आर का वायुगतिकी आकार बिगड़ गया। जब गति बढ़ती है तो गाड़ी की छत के पिछले हिस्से में टेपर (ढलान) नहीं होने के कारण हवा छत से गुजरने वाली हवा का दबाव कम हो जाता है और गाडी असंतुलित हो जाती है।
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स्थिति को और भी बदतर बनाने के लिए वेगन-आर में एबीएस नहीं लगाया गया है, अत: 100 पर ब्रेक लगाने का मतलब है, निश्चित दुर्घटना। यदि इसमें एबीएस लगाया जाता तो लागत बढ़ जाती।
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स्विफ्ट, स्विफ्ट डिजायर और रिट्ज का आकार तो वायुगतिकीय सिद्धांतो के बिलकुल उलट है, और इन कारों में भी तेज गति पर एकदम ब्रेक लगाने से गाड़ी का संतुलन बिगड़ना तय है। डिजायर तो सुरक्षा की दृष्टी से और भी खतरनाक है। इसका मूल डिजाइन स्विफ्ट है लेकिन सिडान बनाने के लिए कम्पनी ने इसके पीछे एक डिग्गी चिपका दी, जिससे इसका वायुगतिकी ढांचा और भी बिगड़ गया। स्विफ्ट और स्विफ्ट डिजायर में हालांकि एबीएस है लेकिन इस एबीएस की परफॉर्मेंस इतनी कमतर है कि, एबीएस का होना न होना बराबर है।
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आल्टो में भी एबीएस नहीं है लेकिन आल्टो अपेक्षाकृत ज्यादा सुरक्षित है। कार में वजन भी है और इसका आकार भी वायुगतिकीय सिद्धांतो के अनुरूप है। आल्टो 110 पर वाइब्रेट होना शुरू हो जाती है, जो कि छोटी कार के लिहाज से अच्छी परफॉर्मेंस है।
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इंडिका, विस्टा, सेंट्रो आई-10 और आई-20 का संतुलन ठीक ठाक है लेकिन इनमे आई-20 और इंडिका का एबीएस सही तरीके से काम नहीं करता। वेन, इक्को और जेन एस्टिलो के बारे में जितना कम कहा जाए उतना अच्छा है।
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फोर्ड के सुरक्षा मानक बेहतर स्तर के है और एबीएस भी बहुत अच्छा काम करता है। किन्तु फोर्ड छोटी कारों का निर्माण नहीं करता और इसके पार्ट्स खुले बाजार में उपलब्ध नहीं होने के कारण मेंटेनेंस महंगा पड़ता है।
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आदमी जूते, कपड़े, सब्जी आदि खरीदता रहता है अत: उसे इनकी खरीद का अनुभव होता है। लेकिन कारों के मामले में ऐसा नहीं है। ज्यादातर व्यक्ति जब कार खरीदने जाते है तो यह इनकी पहली खरीद होती है और खरीदते समय वे ऐसे आदमी से सलाह लेते है जिसने 'एक' कार खरीदी होती है। ऐसे में ज्यादातर क्रेता कारों के सेल्समेन की सलाह पर निर्भर हो जाते है या कारों के दर्शनीय डिजाईन, अनुपयोगी फंक्शन और माइलेज जैसे पहलुओं को आधार बनाकर फैसला लेते है।
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ज्यादा समस्या छोटी कारों को लेकर है। इनमे यदि सुरक्षा मानकों को लागू किया जाता है तो लागत बढ़ सकती है। इसीलिए कार निर्माता कम्पनियां इनमें एबीएस और एयरबैग आदि फीचर्स का प्रयोग नहीं करती। लेकिन सिर्फ आकर्षक बनाने के लिए कार के वायुगतिकीय सिद्धांत का उलंघन करना तथा माईलेज ज्यादा रखने के लिए कार का वजन घटाकर उसे असुरक्षित बना देना बेतुकी बात है।
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सुरक्षा के लिहाज से मौजूदा डिजाइन के अनुसार वेगन-आर, आल्टो, स्विफ्ट आदि कारों के स्पीडो मीटर पर अधिकतम गति 100 तथा वेन, इक्को आदि की गति सीमा 60 किमी प्रति घंटा निर्धारित की जानी चाहिए। क्योंकि ये कारें इससे ज्यादा गति पर चलाने के लायक नहीं है।
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इसीलिए यदि आप छोटी श्रेणी की कार (3-5 लाख मूल्य की) लेने जा रहे है तो ज्यादा से ज्यादा सुरक्षित कार चुने। कार का रंग, डिजाईन, इंटीरियर, अन्य फीचर्स, माईलेज आदि को ज्यादा तवज्जो न दें। जिस स्पीड पर कार में वाइब्रेशन शुरू होता है, खरीदने के बाद उससे आगे के स्पीडोमीटर को काले रंग से पोत दें या अन्य कोई स्थायी निशान लगाए। यदि स्पीड को स्थायी रूप से कम किया जा सके तो ऐसा भी किया जा सकता है। वरना कभी न कभी आप या आपका पारिवारिक सदस्य उस स्पीड पर इस कार को दौड़ाएगा जिस स्पीड पर दौड़ने के लिए यह कार नहीं बनी है, और संतुलन बिगडने से दुर्घटना का शिकार होगा।
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यदि आप मध्यम श्रेणी की कार (5-8 लाख मूल्य की) लेने जा रहे है तो कार का एबीएस-ईबीडी* चेक करे, क्योंकि मध्यम श्रेणी की कारों में वाइब्रेशन की समस्या नहीं होती। आप जब कार खरीदने जाएँ तो अटेंडर को एबीएस चेक करवाने के लिए कहे। तब वह आपको कार की ट्रायल देने के लिए खाली रोड पर ले जाएगा। सीट बेल्ट लगा ले। कार को 90 की स्पीड पर ले जाए और स्टेयरिंग छोड़ कर खींच कर एक ही बार में ब्रेक लगाए। ब्रेक एक ही बार में लगाना है, एकदम से लगाना है, और ब्रेक लगाते समय स्टेयरिंग को छोड़ देना है। ब्रेक लगाते समय कार सीधी दिशा में रहे। यदि कार बिना घूमें सीधी रेखा में रुक जाती है तो एबीएस-ईबीडी सही काम कर रहे है। इतने पर भी सड़क पर टायरों की रगड़ के निशान नहीं बनेंगे। फिर यही प्रक्रिया 100 पर तथा 110 या 120 पर भी दोहराएँ।
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(*) एबीएस और ईबीडी तेज गति पर एकदम से ब्रेक लगाने पर भी कार को सुरक्षित रूप से रोक देता है। ABS - Anti-lock Breaking System और EBD - Electronic Breakeforce Distribution पर गूगल करें।
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भारत में भूतल एवं परिवहन मंत्री आटोमोबाइल कम्पनियो से घूस खाकर उन्हें मनमाने ढंग से सुरक्षा मानकों का उलंघन करने की छूट देते है। राईट टू रिकॉल परिवहन मंत्री के कानून और ज्यूरी सिस्टम प्रक्रियाओं के लागू होने के बाद भारत के नागरिकों द्वारा यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि कार निर्माता कम्पनियां कारों के निर्माण में सुरक्षा मानकों का पालन करें जिससे सड़क दुर्घटनाओ में कमी आये।
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