Pawan Jury BhilwaraRj

मथुरा काण्ड पर : 'सत्याग्रहियों' माने हिंसक दंगाइयों और पुलिस की मुठभेड़ में एसपी एवं एसएचओ समेत 24 व्यक्ति मारे गए। क्यों लगातार बिगड़ते हालात की अनदेखी की गयी और कैसे ऐसी घटनाओं की पुनरावृति से बचा जा सकता है ?
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यह अपने आप में कोई एकदम से नई घटना नहीं है। रूटीन है। कोई नागरिक समूह किसी तरह की मांग करता है। फिर मांग के पक्ष में जमाव होता है। जमाव जब हिंसक हो जाता है तो 'सत्याग्रह' दंगे का रूप ले लेता है। जमाव बढ़ने पर राजनैतिक पार्टियों को लकवा मार जाता है, क्योंकि नागरिक समूह एक वोट बैंक है। सत्तारूढ़ दल वोट बचाने के लिए कार्यवाही करने की जगह आँखे मूँद लेता है और विपक्ष समूह के वोट खींचने के लिए समर्थन दे देता है या आग में और घी डालता है। हरियाणा और गुजरात में ऐसा अभी अभी होकर चुका है। दोनों ही जगह बीजेपी सरकार है।
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पहली बात तो यह कि इस बलवे के पीछे जिम्मेदार कौन है यह कभी 'तय' नहीं हो पाएगा। जांच वगैरह चलती रहेगी। न एसपी जिम्मेदार है न ही डीएम न ही एसएचओ न ही गृह मंत्री न ही मुख्य्मंत्री। ऐसी सभी घटनाओं के बाद जो बंधा बंधाया रूटीन है वही होगा। बीजेपी, सपा और कांग्रेस सीधे मुख्य्मंत्री को जिम्मेदार बताएँगे और मुख्य्मंत्री कहेंगे कि दोषियों पर कार्यवाही होगी व किसी को बख्शा नहीं जाएगा।
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मेरे विचार से इस बलवे के दोषी सपा, बसपा, कांग्रेस, आम पार्टी और बीजेपी है। सबसे बड़ा दोष मोदी साहेब का है। और उससे भी बढ़कर दोषी सोनिया-मोदी-केजरीवाल के अंधभगत है। कैसे ?
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किसी शहर में क़ानून व्यवस्था संभालने की जिम्मेदारी एसपी की है, लेकिन तकनिकी तौर पर एसपी मुख्य्मंत्री/गृहमंत्री के इशारों पर काम करता है। क्योंकि एसपी को नियुक्त करने और उसे नौकरी से बर्खास्त करने का अधिकार मुख्य्मंत्री के पास होता है। तो मान लीजिए कि मथुरा के 10 लाख नागरिक ऐसे अविधिक जमाव का समर्थन नहीं कर रहे है और वे चाहते है कि एसपी इनके खिलाफ कार्यवाही करे। लेकिन क्या एसपी कार्यवाही करेगा ? नहीं करेगा। क्योंकि जनता या क़ानून व्यवस्था को केंद्र में रखकर यदि एसपी कोई फैसला लेता है लेकिन यदि यह फैसला सत्तारूढ़ पार्टी के खिलाफ पड़ता है तो एसपी यह कार्यवाही नहीं कर पाएगा। क्योंकि यदि वह सत्तारूढ़ दल के खिलाफ जाकर फैसला लेता है तो सीएम उसे नौकरी से निकाल देगा।
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तो इस तरह किसी राज्य के सभी एसपी सत्तारूढ़ दलों के राजनैतिक हितों को ध्यान में रखते हुए काम करते है। और यही हालत देश के सभी अधिकारियों की है। अब मान लीजिए कि मथुरा का विधायक ईमानदार व्यक्ति है और इस जमाव के विरुद्ध कार्यवाही करवाने की मंशा रखता है, लेकिन मुख्य्मंत्री या उनके कोई ख़ास मंत्री कार्यवाही के खिलाफ है, तब भी एसपी इन पर कार्यवाही नहीं करेगा और न ही विधायक सीएम के फैसले के खिलाफ जाएगा। क्योंकि सीएम चाहे तो विधायक को मंत्री बना सकता है या मंत्री से मंत्रालय छीन सकता है। इस तरह पूरा तंत्र मुख्य्मंत्री और उनके ख़ास मंत्रियों पर निर्भर होकर काम करता है। सभी को अपनी नौकरी बनाये रखनी है, तरक्की करनी है। इसीलिए मुख़्यमंत्री के निर्देश ही क़ानून है।
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समस्या ?
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भारत में नागरिक सिर्फ विधायक को चुनते है। विधायक मुख्य्मंत्री को चुनते है। मुख्य्मंत्री मंत्रालयों का बंटवारा करता है, और यह मंत्री और विधायक अगले 5 साल तक सरकार चलाते है। सारी शक्तियां इन विधायकों, मंत्रियों और मुख्य्मंत्री में निहित है। यदि इस व्यवस्था में कोई अधिकारी या मंत्री ईमानदारी से लोकहित में कार्य करना चाहता है तो वह अपने विवेक से फैसले नहीं ले सकता। उसे दबाव में आकर ऊपर से आये आदेशों का पालन करना पड़ेगा। वर्ना उसकी नौकरी जायेगी।
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समाधान ?
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1) मल्टी इलेक्शन, 2) राईट टू रिकॉल, 3) ज्यूरी सिस्टम, 4) पारदर्शी शिकायत/सुझाव प्रणाली
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1) मल्टी इलेक्शन : हमारा प्रस्ताव है कि मतदाताओं को अपने विधायको के साथ ही मंत्रियों, मुख्यमंत्री को सीधे चुनने का अधिकार होना चाहिए। साथ ही जिले के मतदाताओं को अपने जिले के पुलिस प्रमुख को चुनने का भी अधिकार दिया जाए। ऐसा होने से पुलिस प्रमुख सीधे जनता द्वारा चुनकर आएगा और जनता के प्रति ही जवाबदेह होगा। तथा सभी मंत्री और मुख्यमंत्री भी जनता के प्रति 'सीधे' जवाबदेह होंगे। जब पुलिस प्रमुख सीधे जनता द्वारा चुनकर आएगा तो वह जिले की क़ानून व्यवस्था बनाने के लिए किये जाने वाले सभी फैसलों को लेने के लिए जिम्मेदार होगा तथा इस प्रकार क़ानून व्यवस्था बनाये रखने के लिए निश्चित रूप से जवाबदेह होने के कारण पुलिस प्रमुख अपने कार्य को ज्यादा कर्मठता से करेगा। कुल मिलाकर मल्टी इलेक्शन अधिकारियों और नेताओ को अलग अलग रूप से जनता के प्रति जवाबदेह बनांता है जिससे वे राजनैतिक गठजोड़ से आजाद हो जाते है और बेहतर प्रदर्शन करते है।
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2) राईट टू रिकॉल : भारत की सभी समस्याओं की जड़ राईट टू रिकॉल प्रक्रियाओं का अभाव है। इस प्रक्रिया के अभाव में एक बार चुन लिए जाने के बाद नेता जनता के हितों की परवाह नहीं करते और सिर्फ चुनाव के दौरान ही नागरिक हितों की और ध्यान देते है। यदि हम मल्टी इलेक्शन प्रक्रियाएं लागू करते है लेकिन नागरिकों को चुने हुए प्रतिनिधियों को वापिस बुलाने का अधिकार नहीं देते तो मल्टी इलेक्शन प्रक्रियाएं कोई बदलाव नहीं ला पाएगी। क्योंकि तब जिला पुलिस प्रमुख धनिक वर्गों और नेताओ से घूस खायेगा और 5 साल तक उसी तरह से मनमानी करेगा जैसे हमारे नेता करते है। यदि नागरिकों को अपने जिले के पुलिस प्रमुख को चुनने के साथ ही हटाने का अधिकार भी दे दिया जाता है तो पुलिस प्रमुख निरंतर जनता के हितों के लिए काम करेगा। क्योंकि ऐसा न करने पर उसे यह भय रहेगा कि नागरिक राईट टू रिकॉल प्रक्रियाओं का प्रयोग करके उसे कभी भी नौकरी से निकाल देंगे।
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3) ज्यूरी सिस्टम : ऐसे किसी भी बलवे के बाद की प्रक्रिया जांच और अदालती कार्यवाही है। यदि मामले का निपटारा त्वरित और निष्पक्ष रूप से होता है तो अपराधी हतोत्साहित होंगे वर्ना ऐसी घटानाओ की पुनरावृति होगी। भारत की अदालतों में जजों का राज है। ऐसे मामले वर्षो तक अदालतों में घिसटते रहते है और अंततोगत्वा जज घूस खाकर आरोपियों को रिहा कर देता है। त्वरित और निष्पक्ष न्याय के लिए हमारा प्रस्ताव है कि भारत में ज्यूरी प्रक्रियांए लागू की जाए। मतदाता सूचियों में से अक्रमत विधि से 12 नागरिकों की ज्यूरी बुलाई जाये और यह ज्यूरी मामले पर फैसला दे। प्रत्येक मामले के लिए अलग ज्यूरी होगी। इससे अपराधियों को त्वरित सजा मिलेगी और अपराधी हतोत्साहित होंगे।
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4) जनमत संग्रह प्रक्रियाएं : सुनने में आया है कि इन 'सत्याग्रहियों' की कुछ मांगे थी। इनकी मांगे कितनी उट पटांग है यह यहाँ विषय नहीं है। विषय यह है कि ये समूह सरकार से कोई मांग कर रहा था। लेकिन मांग करने के लिए इन्हे जवाहर बाग़ में महीनो लम्बा जमावड़ा लगाने की नौबत क्यों आई ? क्योंकि हमारे देश की सभी राजनैतिक पार्टियां चाहती है कि यदि कोई नागरिक समूह सरकार के सामने कोई बात रखना चाहता है तो वह उठाईगीरों की तरह रोड़ पर तम्बू लगाए और खानाबदोश जीवन जिए। इसी कारण सभी राजनैतिक पार्टिया भारत में ऐसी किसी भी क़ानूनी प्रक्रिया का विरोध करती है जिससे नागरिक अपनी बात/सुझाव/शिकायत/प्रस्ताव आदि पारदर्शी, अधिकृत और संगठित तरीके से सरकार के सम्मुख रख सके। ऐसी प्रक्रिया के अभाव में नागरिक समूहों को सड़कों पर मजमा लगाना पड़ता है और जमाव होने के बाद इस तरह के हादसे होते है।
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इस सम्बन्ध में हमारा प्रस्ताव है कि भारत में केंद्रीय स्तर पर और सभी राज्यों में टीसीपी (पारदर्शी शिकायत प्रणाली) क़ानून को लागू किया जाए। इस प्रक्रिया के आने से देश का कोई भी नागरिक अपनी मांग को प्रधानमंत्री की वेबसाइट पर रख सकेगा। इस प्रस्ताव को देश के सभी नागरिक देख सकेंगे तथा अमुक अर्जी पर अपना समर्थन या विरोध दर्ज करवा सकेंगे। यदि करोडो नागरिक किसी मांग का समर्थन करते है तो प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री ऐसी अर्जी पर युक्ति युक्त कार्यवाही कर सकते है।
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हमारे द्वारा प्रस्तावित इन सभी प्रकियाओं के विधिवत ड्राफ्ट दिए गए लिंक्स पर देखे जा सकते है :
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1. पारदर्शी शिकायत प्रणाली के लिए प्रस्तावित कानूनी ड्राफ्ट :
www.facebook.com/pawan.jury/posts/809753852476186
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2. राईट टू रिकाल जिला पुलिस प्रमुख के लिए प्रस्तावित कानूनी ड्राफ्ट :
https://web.facebook.com/pawan.jury/posts/867725646679006
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3. ज्यूरी सिस्टम के लिए प्रस्तावित कानूनी ड्राफ्ट :
www.facebook.com/pawan.jury/posts/809746209143617
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मोदी साहेब 2002 से 2014 तक गुजरात के मुख्य्मंत्री रहे। उनसे हमने कई बार टीसीपी, ज्यूरी सिस्टम, राईट टू रिकॉल पुलिस प्रमुख आदि कानूनों को लागू करने के लिए कहा। लेकिन उन्होंने साफ़ इंकार कर दिया। 10 साल तक मनमोहन और सोनिया गांधी भी केंद्र की सत्ता में रहते हुए इन कानूनों का विरोध करते रहे। और केजरीवाल भी इन क़ानून प्रक्रियाओं के सख्त विरोधी है।
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मोदी साहेब का आज भी यह साफ़ तौर पर कहना है कि भारत के नागरिकों को किसी भी सूरत में पुलिस प्रमुख को नौकरी से निकालने का अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए, और न ही भारत के नागरिकों के पास ऐसी कोई प्रक्रिया होनी चाहिए जिससे वे प्रधानमंत्री की वेबसाइट पर अपनी शिकायत रख सके। और ज्यूरी सिस्टम के तो मोदी साहेब धुर विरोधी है। केजरीवाल, सोनिया और मुलायम सिंह यादव भी मोदी साहेब के इस फैसले का समर्थन करते है। यदि आपको विश्वाश न हो तो आप खुद इन क़ानून प्रक्रियाओं के बारे में अपने नेताओ से पूछ सकते है। आपको जवाब वही मिलेगा जो ऊपर लिखा जा चुका है।
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सोनिया-मोदी और केजरीवाल के सभी अंध भगत भी अपने नेताओ का समर्थन करने के चक्कर में नागरिकों को अधिकार दिए जाने वाली इन सभी क़ानून प्रक्रियाओं का विरोध कर रहे है। उनका प्राथमिक लक्ष्य अपने नेताओ को अधिकार दिलवाना है नागरिकों को नहीं।
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यदि देश में टीसीपी क़ानून लागू होता था तो इस जमाव को इकट्ठा नहीं होना पड़ता था और ये लोग अपनी मांगे शान्ति के साथ प्रधानमंत्री/मुखयमंत्री और देश के अन्य नागरिकों के सामने रख पाते थे। यदि राइट टू रिकॉल पुलिस प्रमुख का क़ानून होता था तो एसपी हालात को काबू करने के लिए काफी पहले ही आवष्यक कदम उठा लेता था और अखिलेश यादव उसे रोक नहीं पाते थे। और यदि अब भी ज्यूरी सिस्टम और सार्वजनिक नार्को टेस्ट के क़ानून को लागू कर दिया जाता है तो इस प्रकरण में लिप्त सभी दोषी कुछ ही महीनो में सलाखों के पीछे चले जाएंगे।
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लेकिन सोनिया-मोदी-केजरीवाल-मुलायम-माया और इनके अंधभगत पहले भी इन कानूनों का विरोध कर रहे थे और आज भी इन सभी कानूनों का विरोध कर रहे है। इस प्रकार मोदी साहेब और उनकी ब्रिगेड तथा सोनिया-केजरीवाल-मुलायम-माया और उनके अंधभगतो पर इन सभी हत्याओं का दोष है। क्योंकि वे देश के कानूनों को सुधारने की मांग करने की जगह अपने नेताओ के लिए वोट खींचने की धंधे में लगे हुए है, और इन अंध भगतो के सभी नेता देश की व्यवस्था को सुधारने के लिए आवष्यक कानूनों का विरोध कर रहे है।
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बहरहाल मोदी भगतो के हाथ चुनावों से पहले बटेर लग गया है और वे इस मुद्दे को उठाकर अच्छे खासे वोट खींच सकेंगे। जहां तक समाधान की बात है, उन्हें इसमें कोई रुचि नहीं। यदि आपकी रुचि इन समस्याओं के समाधान में है तो अपने सांसद/विधायक को एसएमएस द्वारा आदेश भेजे कि ऊपर दिए गए कानूनों को गैजेट में प्रकाशित किया जाए। एसएमएस भेजने से सम्बंधित दिशा निर्देश ऊपर दिए गए कानूनों के लिंक में दिए गए है।
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