Pawan Jury BhilwaraRj

संघ और महादुरात्मा गांधी
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आरएसएस ने महादुरात्मा गांधी का बेहद ख़ूबसूरती से अपने हक़ में इस्तेमाल किया है। संघ का शीर्ष नेतृत्व हमेशा से मोहन गांधी का समर्थक रहा लेकिन उन्होंने अपने कार्यकर्ताओ को मोहन का विरोध करने के लिए प्रेरित किया। इस तरह से संघ के कार्यकर्ता गांधी का विरोध करके बीजेपी के लिए गांधी विरोधियो के वोट इकट्ठा करते है लेकिन संघ का शीर्ष नेतृत्व हमेशा गांधी की नीतियों का अनुसरण करता है।
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आजादी से पहले :
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डॉ केशव बलिराम हेडगेवार पहले कांग्रेस में थे। फिर हिन्दू महासभा में गए। और अंत में उन्होंने 1925 में संघ की स्थापना की।
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ब्रिटिश मोहन दास की अहिंसा की नीति से बहुत खुश थे और वे चाहते थे कि भारत के कार्यकर्ता गांधी की नीति का अनुसरण करे। आजादी से पहले संघ भी महादुरात्मा गांधी की नीतियों पर ही काम करता था। या दूसरे शब्दों में दोनों ब्रिटिश साम्राज्य की नीति पर काम करते थे। दोनों ही अहिंसा में मानते थे, हिन्दुओ को हथियारों का प्रशिक्षण देने के खिलाफ थे और दोनों ही नागरिकों को हथियार रखने की छूट देने का विरोध करते थे। दोनों ही कार्यकर्ताओ को बुत्ता देने के लिए हथियारों का समर्थक होने का दिखावा* करते थे।
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(*) संघ साल में एक दिन दशहरे पर हथियारों के 'चित्रों' की सांकेतिक पूजा करता था और महादुरात्मा गांधी ने दिखावे के लिए एक बार नागरिकों को हथियार रखने की छूट देने की मांग की थी और इस सम्बन्ध में कांग्रेस से प्रस्ताव पास किया था
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महादुरात्मा गांधी और संघ दोनों ही महात्मा भगत सिंह, महात्मा चन्द्रशेखर आजाद आदि क्रांतिकारियों को 'भटके हुए नौजवान' मानते थे और युवाओं को उनके मार्ग पर न चलने की सलाह देने में काफी मेहनत करते थे। दोनों ही आजादी की लड़ाई लड़ने की मंशा रखने वाले नौजवान कार्यकर्ताओ को अनुपयोगी कार्यो जैसे चरखे चलाना, भजन गाना, कम्बल बांटना, पथ संचलन निकालना, शंख बजाना आदि में खपा कर उनका समय और ऊर्जा को बर्बाद करने की गतिविधियाँ संचालित करते थे।
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महादुरात्मा गांधी और डॉ हेडगेवार के बीच मधुर सम्बन्ध थे, और जब मोहन दास ने संघ की शाखा का दौरा किया था तो वे काफी खुश हुए और उन्होंने संघ की उन्नति के लिए शुभकामनाएं दी।
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1943 में संघ के कई स्वयसेवक आजादी की लड़ाई में राजनितिक रूप से भाग लेना चाहते थे लेकिन गोलवलकर ने संघ के स्वयंसेवकों को ब्रिटिश राज के खिलाफ किसी भी राजनैतिक गतिविधी में भाग लेने पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। गोलवलकर बिलकुल भी नहीं चाहते थे कि स्वंयसेवक ऐसा कोई कार्य करे जिससे ब्रिटिश राज को असुविधा हो। ऐसे में महाराष्ट्र के संघचालक के बी लिमये समेत कई स्वयंसेवकों ने संघ छोड़ दिया और 'हिन्दू राष्ट्र दल' की स्थापना की। नाथूराम गोडसे भी इस दल के सदस्य थे। संगठन को टूटने से बचाने के लिए तब गोलवलकर ने स्वंयसेवको को अपनी गतिविधियों की रिपोर्ट कांग्रेस के स्थानीय नेताओ को करने को कहा था। इस प्रकार कांग्रेस के स्थानीय नेता संघ की टूटन रोकने के लिए गतिविधियाँ संचालित कर रहे थे। जब नाथू राम गोडसे ने महादुरात्मा गांधी की हत्या की तो गोलवलकर ने इस हत्याकांड की कठोर शब्दों में निंदा की थी।
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ब्रिटिश राज समाप्त होकर नेहरू युग प्रारम्भ हुआ तो संघ ने जनसंघ के नाम से अपनी राजनैतिक पार्टी बनायी और सत्ता में आने के प्रयास शुरू किये।
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आजादी के बाद :
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संघ 1990 तक महादुरात्मा गांधी के सभी दुष्कर्मो पर खामोश बना रहा। इसके बाद मंडल और कमंडल के दौर में संघ/बीजेपी ने सत्ता पाने के लिए हिन्दू-मुस्लिम ध्रुवीकरण के फार्मूले को अपनाने का फैसला किया। संघ ने महादुरात्मा गांधी को सिर्फ मुस्लिम तुष्टिकरण और हिन्दू विरोधी की नीति पर चलने वाले व्यक्ति के रूप में ही उभारा, ताकि ध्रुवीकरण किया जा सके, लेकिन दुरात्मा गांधी के अन्य दुष्कर्मो पर खामोशी बनाए रखी। संघ ने अपने स्वयंसेवकों को यह जानकारी कभी नहीं दी कि महादुरात्मा गांधी पर सबसे बड़ा आरोप यह है कि उसने हिन्दुओ को हथियार विहीन करने में मुख्य भूमिका निभायी थी और इसी कारण विभाजन के दौरान हुए दंगो में 20 लाख हिन्दुओ को अपने गले कटाने पड़े। संघ यह जानकारी इसीलिए छुपाता आ रहा है क्योंकि खुद संघ भी उस समय हिन्दुओ को हथियार विहीन बनाये रखने के एजेंडे पर कार्य कर रहा था।
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असल में संघ महादुरात्मा गांधी का अधिकृत रूप से पूजक था और आज भी पूजक है। पिछले 67 सालो में संघ ने कभी भी महादुरात्मा गांधी को राष्ट्रपिता के अलंकरण से च्युत करने की मांग नहीं की। कभी भी भारतीय मुद्रा से गांधी की तस्वीर हटाने की मांग भी नहीं रखी। उन्हें बस इस बात में रुचि रही कि कैसे गांधी को मुस्लिम समर्थक बताकर बीजेपी के खाते में वोट खींचे जाए। संघ आज भी गांधी को राष्ट्रपिता बनाये रखने का समर्थन करता है, लेकिन अपने स्वयंसेवकों को गांधी को कोसने के लिए निर्देश देता है, ताकि गांधी विरोधियों के वोट बटोरे जा सके।
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मोहन गांधी को लेकर मेरे और संघ के रूख की तुलना :
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मैं मोहन दास को हिन्दू विरोधी के साथ ही मानवता विरोधी भी मानता हूँ और मांग करता हूँ कि मोहन दास से 'राष्ट्रपिता' का अलंकरण छीना जाए, उसे किसी भी सरकारी दस्तावेज और अधिकृत सम्बोधनों में महात्मा कह के नहीं पुकारा जाए, तथा भारतीय मुद्रा से उसके चित्र हटाएं जाए। मैं अहिंसामूर्ती महात्मा सुभाष चन्द्र बोस को राष्ट्रपिता घोषित करने और मुद्राओं पर क्रांतिकारियों के चित्र छापने का समर्थन करता हूँ।
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संघ का शीर्ष नेतृत्व महादुरात्मा गांधी का पूरी तरह से समर्थन करता है और उन्हें महात्मा की संज्ञा देता है। जबकि संघ के स्वंयसेवक मोहन दास गांधी को जबानी विरोध करते है लेकिन महादुरात्मा गांधी के राष्ट्रपिता अलंकरण को बनाये रखने और नोटों पर उसके फोटो जारी रखने का समर्थन करते है !!
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इस प्रकार के चरित्र को हिंदी में 'दोहरा मापदंड' और खड़ी बोली में 'दोगलापन' कहा जाता है।
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मेरा मानना है कि, कोई नीति सही-गलत या अच्छी-बुरी हो सकती है और उस पर बहस की जा सकती है, लेकिन दोगली नीति किसी 'बुरी नीति' से भी बदतर होती है।
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