Pawan Jury BhilwaraRj
संदेह -- 'भारत में ज्यादातर वोटर ऐसे हैं जो राजनीतिक पार्टीओं के कट्टर भगत होते हैं, उनकी पार्टी का कोई नेता चाहे अच्छा काम करे या बुरा काम करे, वोह अपनी पार्टी के अलावा किसी और को वोट नहीं देते'
ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि जिस देश में वोटर बिना सही गलत को देखे अपनी पार्टीगत निष्ठा से वोट देता हो उस देश में क्या Right to Recall जैसा कानून आ सकता है, अगर आ भी जाए तोह क्या यह व्यवहारिक हो सकता है ?
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स्पष्टीकरण --- राईट टू रिकॉल कानूनो के आने से पार्टी सिस्टम टूट जाएगा। चुनाव व्यक्ति आधारित हो जाएंगे और मतदाताओ को योग्यता के आधार पर ही वोट करना होगा। उदाहरण के लिए पीएम को सीधे चुनने और हटाने का अधिकार जनता के पास होने से किसी योग्य व्यक्ति को पीएम बनाने के लिए अपने क्षेत्र के किसी निकम्मे सांसद को चुनने की बाध्यता खत्म हो जायेगी।
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सरकार के गठन के बाद यदि कोई सांसद या मंत्री बुरे फैसले लेगा तो जनता उसे हटाकर दूसरे व्यक्ति को नौकरी दे देगी, इससे प्रतिद्वंदी पार्टियों की मिलीजुली सरकारे अस्तित्व में आएँगी। पूरी संभावना है कि आपको मोदी सरकार में केजरीवाल और जयराम रमेश मंत्री के रूप में काम करते मिले। पार्टियां गड्ड-मड्ड हो जायेगी और सिर्फ काबिल व्यक्ति ही पदो पर रहेंगे, अत: सरकार भी पार्टियों की जगह व्यक्तियों की होगी। कामचोर प्रत्याशी सिर्फ पार्टियों में बने रहेंगे और सरकार से निष्कासित हो जाएंगे।
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पार्टी-तंत्र टिकेट देने की व्यवस्था के कारण जड़े जमाए बैठा है, लेकिन राईट टू रिकॉल आने से टिकेट हासिल करने मात्र से बढ़त बना लेना मुश्किल हो जाएगा, जिससे योग्य प्रत्याशियों की पार्टी तंत्र पर निर्भरता कम होगी।
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