Pawan Jury BhilwaraRj
संदेह --- 'राइट टू रिकॉल' भले ही जनता के लिए लाभदायक हो लेकिन यह राजनेताओं के लिए खतरे की घंटी है। कोई नेता नहीं चाहेगा कि 'राइट टू रिकॉल' का कानून बने। 'राइट टू रिकॉल' लागू करने के लिए 1951 के जन प्रतिनिधित्व कानून में बदलाव करना होगा। इसके लिए सबसे अहम बात है राजनीतिक दलों में आम सहमति। सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस तो साफ तौर पर इस बिल के खिलाफ है। वहीं भाजपा ने भी इस बिल के बारे में कुछ साफ रुख तय नहीं किया है। अन्य दलों के विचार भी इस मुद्दे पर बंटे हैं। पूर्व चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी का भी मानना है कि राइट टू रिकॉल से बार-बार चुनाव की नौबत आ सकती है, यही नहीं चुनाव खर्च भी बढ़ेगा। हालांकि वे मानते हैं कि इस कानून से जनता को बेहतर प्रतिनिधि मिल सकता है।
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स्पष्टीकरण --- हमारे द्वारा प्रस्तावित राईट टू रिकॉल कानूनी ड्राफ्ट देश के किसी भी क़ानून का उलंघ्घन नहीं करता, और न ही किसी जनप्रतिनिधि क़ानून में किसी प्रकार के संशोधन की आवश्यकता है।
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'साफ तौर पर यह राजनेताओं के लिए खतरे की घंटी है'। तब आप राजनेताओ से राइट टू रिकॉल का समर्थन करने की उम्मीद क्यों कर रहे है। यह कुछ ऐसा ही है कि, गब्बर ठाकुर से कहे कि अपने हाथ कटवाकर मेरे अड्डे पर भिजवा देना। खुद के हाथ कोई काटकर नहीं देता। कोई भी राजनैतिक पार्टी राईट टू रिकॉल का समर्थन कभी नहीं करेगी। अब यह जनता को तय करना है कि उन्हें भ्रष्ट नेताओ को रिकॉल करने का राईट चाहिए या नहीं।
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इससे चुनाव का खर्च बढ़ेगा नहीं बल्कि घटेगा , क्योंकि मतदाता प्रत्येक अनुमोदन के लिए 1 से 3 रुपये का भुगतान कर रहा है।
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