Pawan Jury BhilwaraRj

'EVM पर नूरा कुश्ती'
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से वोटिंग के बूथ वाइज़ आँकड़े ज़ाहिर करने के विषय पर अपना रूख स्पष्ट करने को कहा है। जबकि EVM के चलते केंद्र सरकार, चुनाव आयोग, विधि मंत्रालय और खुद सुप्रीम कोर्ट भी इस विषय को लटकाए रखने के पक्ष में ।
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भारत में EVM का प्रयोग 1988 में उपचुनाव के दौरान प्रायोगिक तौर पे शुरू किया गया ,1996 के लोकसभा चुनावों में 12 सीट पर EVM के माध्यम से चुनाव हुए । ये वाजपेयी थे जिन्होंने बड़े पैमाने पर EVM के इस्तेमाल की वकालत की, फलस्वरूप 1998 के आम चुनाव में सभी 543 लोकसभा सीट पर EVM के माध्यम से मतदान हुआ ।
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1998 से पहले मतपत्रो के माध्यम से वोटिंग होती थी। गणना के दौरान अक्रमत: ढंग से किन्ही 3 मत पेटियों के मतपत्रो को मिलाने के उपरांत गणना की जाती थी । इस विधि से की गयी गणना से बूथ वाईज़ वोटिंग को चिन्हित करना मुमकिन नहीं था । लेकिन EVM के आने से स्थिति पलट गयी ।
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अब चूंकि हर बूथ पर एक EVM रखी जाती है अत: हर बूथ की वोटिंग के आंकड़े चिन्हित EVM में दर्ज़ रहते है ।
गणना के दौरान उम्मीदवारो के पोलिंग एजेंट, जोनल मजिस्ट्रेट मौजूद रहते है । 2010 तक चुनाव आयोग बूथ वाइज़ आँकड़े अधिकृत रूप से ज़ाहिर नहीं करता था, किन्तु अनाधिकृत रूप से सभी पार्टियों और उम्मीदवारों के पास यह आंकड़े उपलब्ध हो जाते थे ।
वर्ष 2010 से RTI के अधीन चुनाव आयोग ने बूथ वाइज़ आंकड़ो का खुलासा करना शुरू किया, और आंकड़े सहज उपलब्ध होने लगे ।
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1. यदि EVM से गणना विधि में टोटलाईज़र का प्रयोग किया जाता है, तो मत गणना के दौरान हेराफेरी की संभावना बढ़ जायेगी, जो कि एक संधिग्द विकल्प है ।
2. यदि बूथ वाइज़ वोटिंग के आंकड़े RTI के दायरे से बाहर रखे जाते है, तो सीएम, पीएम या उम्मीदवार के लिए यह मुश्किल कार्य नही है कि वे जिला कलेक्टर से यह जानकारी हासिल कर ले ।
ज्ञातव्य है कि चुनाव आयोग आंकड़ो को एक वर्ष तक संग्रहित रखता है ।
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सारांश यह कि जब तक निर्वाचन प्रक्रिया में EVM का प्रयोग जारी रहेगा, बूथ वाइज़ आंकड़ो को राजनेतिक दलों की पहुंच से बाहर नही रखा जा सकता । इस परिस्थिति में मेरा मत है कि हमें EVM को निर्वाचन प्रक्रिया से हटा कर फिर से मतपत्र की और लौट आना चाहिए । अन्य नागरिको को जैसा उचित लगे, वो वैसी राय स्थिर करने के लिए स्वतंत्र है ।
चूंकि सुप्रीम कोर्ट और अन्य राजनेतिक दल पूर्व में EVM का समर्थन कर चुके है, इसलिए उनके लिए यह फैसला लेना उतना आसान नहीं है ।
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तबेले में हलचल तब से शुरू हुयी, जब से राजनेतिक दलों ने कम वोट देने वाले क्षेत्रो के नागरिको से बदला भंजाना शुरू किया । बूथ वाइज़ आंकड़ो से अमुक पार्टी को यह सुनिश्चित जानकारी मिल जाती है कि अमुक क्षेत्र के नागरिको ने मुझे पर्याप्त मात्रा में वोट नही किया है, अत: तुष्टि करण और दमन के लिए इस पैमाने को आधार बनाया जाने लगा ।
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2010 में दायर की गयी एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से बूथ वाइज़ आंकड़ो के प्रकाशन पर अपना रूख स्पष्ट करने के लिए कहा । सरकार ने इस विषय पर चुनाव आयोग को राय देने के लिए लिखा, चुनाव आयोग को लगा कि इस सम्बन्ध में क़ानून मंत्रालय से जवाब लेना चाहिए अत: चुनाव आयोग ने क़ानून मंत्रालय से इस सम्बन्ध में राय देने को कहा, क़ानून मंत्रालय ने इस सम्बन्ध में विधि आयोग को लिखा, और विधि आयोग अब तक इस मुद्दे पर कोई राय स्थिर नहीं कर सका है ।
अब सितम्बर 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने फिर से सरकार से इस विषय पर जवाब देने के लिए कहा है ।
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यहाँ सुप्रीम कोर्ट की भूमिका संदिग्ध हो जाती है, कोर्ट को सवाल पूछना बंद करना चाहिए और स्वंय जवाब देना चाहिए ।
स्पष्ट है कि सभी संस्थाएं इस विषय को अधर में लटकाए रखना चाहती है । यदि विधि आयोग वर्षो तक जवाब नही देता है और सरकार इस विषय को टालती नज़र आ रही है, तो सुप्रीम कोर्ट इस विषय पर अपना रुख स्पष्ट करने से क्यों बच रही है ?
यदि कोर्ट चाहे तो इस सम्बन्ध में फैसला देकर प्रकरण का पटाक्षेप कर सकती है ।
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जहां तक मोदी सरकार का प्रश्न है कि नमो को सत्ता संभाले सिर्फ 100 दिन हुए है, ठीक है । लेकिन यह ठीक नही है कि नमो का जन्म 100 दिन पहले ही हुआ है । पिछले 13 वर्ष से जो व्यक्ति किसी प्रदेश का मुख्यमंत्री रहा हो , उसके लिए इस मुद्दे पर राय स्थिर करने के लिए, क्या 100 दिन काफी नहीं है ?
UPA अपने अनिर्णय की 10 साला पारी खेल चुका, लेकिन नमो तो तेजी से फैसले लेने के लिए जाने जाते है, तो उन्हें खुद पहल करके कोर्ट में सरकार का पक्ष स्पष्ट कर देना चाहिए ।
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बहरहाल मूल विषय बूथ वाइज़ मतों के आंकड़ो का प्रकाशन नहीं है। मूल विषय है कि EVM सुरक्षित नहीं है, इन्हें हेक किया जा सकता है और रिमोट के प्रयोग से इनमे दर्ज मतों में हेरा फेरी की जा सकती है ।
ज्ञातव्य है कि कई विकसित देशो ने EVM का प्रयोग आंशिक या पूर्ण रूप से, इनके असुरक्षित होने के आधार पर बंद कर दिया है ।
जहाँ तक भारत में निर्मित EVM का सवाल है, ये EVM और भी ज्यादा असुरक्षित है, इस तथ्य को तकनीशियन के.हरिप्रसाद ने केमरे के सामने सिद्ध किया है । (यू ट्यूब पर विडिओ देखें )
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समाधान : निर्वाचन प्रक्रिया से EVM को निकाल देना चाहिए, तथा कागज़ के मत पत्र का प्रयोग फिर से किया जाना चाहिए ।
प्रजा अधीन राजा ने निर्वाचन प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए, EVM को हटाने तथा अन्य सुधारों के लिए कानूनी ड्राफ्ट्स का प्रस्ताव किया है ।
जिन्हें आप इस लिंक डाउनलोड कर सकते है -
tinyurl . com/rm58 ( अध्याय - 40 )

प्रजा अधीन राजा @ pk