Rahul Mehta Gandhinagar LsCandidate
1. नर्मदा डैम की ऊंचाई बढ़ाना एक अच्छा कदम है।
2. नर्मदा डैम- जितनी देर, उतना कम
3. पवित्र नदी गंगा की सफाई का बढ़ाचढ़ाकर प्रचार।
4. विद्युत ऊर्जा उत्पादन में वृद्धि के लिए हमें नेताओं की प्रशंसा करने की आवश्यकता नही है।
5. एलटीसी घोटाला-- राज्यसभा में सांसदों का समर्थन प्राप्त करने का घटिया तरीका।
6. नितिन गडकरी कहते हैं कि वे 100,000 कि. मी. के हाइवे पर 200 करोड़ पेड़ लगाएंगे। मंत्रीजी को एक कैलकुलेटर की आवश्यकता है। :)
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1. नर्मदा डैम की ऊंचाई बढ़ाना
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250,000 लोगों का विस्थापन एक अतिश्योक्तिपूर्ण अनुमान हो सकता है। किन्तु यदि 250,000 अत्यंत गरीब व्यक्ति विस्थापित होते हैं, तो प्रतिव्यक्ति प्रतिमाह 1000 रूपये की क्षतिपूर्ति की राशि आजीवन देनी उचित होगी। इसका कुल खर्च 25 करोड़ रूपये प्रति माह, 300 करोड़ रूपये प्रति वर्ष, तथा अगले 30 वर्षों में 9000 करोड़ रूपये से अधिक नही आएगा। इसमें उनकी नष्ट हुई अचल संपत्ति का मूल्य भी जोड़ लें। तो भी डैम से प्राप्त होनेवाले पानी और बिजली का मूल्य इससे कई गुना अधिक होगा। आपको प्रतिव्यक्ति प्रतिमाह 1000 रूपये की राशि कम लग सकती है, किन्तु जो सचमुच एक गरीब व्यक्ति है उसके लिए यह बड़ी रकम है।
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अब समस्या यह है--- जो लोग वहां सचमुच रह रहे थे, उनकी सही- सही सूची उपलब्ध नही है। अतः संभव है कि ऐसे कई लोग सूची से गायब हों जो वहां रह रहे थे, वहीँ ऐसे बहुत से व्यक्ति इसमें शामिल हो जाएँ जो वहां नही रहते थे। प्रायः क्षतिपूर्ति के रूप में हर महीने एक निश्चित रकम न देकर एक बड़ी रकम एकमुश्त दी जाती है। इतनी बड़ी राशि प्राप्त करने से पहले रिश्वत भी देनी पड़ती है। इस प्रकार असली समस्या विस्थापन नही, बल्कि सम्बंधित रिकॉर्ड की कमी और भ्रष्टाचार है। साथ ही अंततः व्यक्ति को जो राशि मिलती है वह शादी आदि जरूरी कामों में खत्म हो जाती है, और पूरी जिंदगी वह व्यक्ति बेसहारा मजदूर बन कर रह जाता है। इसलिए एकमुश्त बड़ी राशि की जगह हर माह एक निश्चित नकद राशि देना ज्यादा अच्छा होगा।
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डैम बिजली का सर्वाधिक सस्ता श्रोत है, जो कि सौर ऊर्जा से भी सस्ता है। चीन के हम से आगे होने का एक कारण वहां की सस्ती बिजली है। और इसका कारण है कि चीन एक बड़ी मात्र में विद्युत हाइड्रो से प्राप्त करता है। डैम से बिजली प्राप्त करने में प्रदूषण भी कम होता है।
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2. नर्मदा डैम- जितनी देर, उतना कम
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1940 के दशक के मध्य में गुजरात के प्रसिद्ध सिविल इंजीनियर भाइकाका ने नर्मदा डैम का प्रस्ताव रखा। 1956 ई. में इसकी नीव रखी गयी, तथा डैम का प्रोजेक्ट 1964 ई. तक पूरा भी हो जाता। किन्तु विदेशियों ने न्यायाधीशों, न्यायाधिकरणों के प्रमुखों आदि को खरीद लिया ताकि वे निराधार कारणों का बहाना बनाकर एक के बाद दूसरा स्टे आर्डर लगाते जाएँ, और यह डैम बन नही पाये। डैम की ऊंचाई स्वीकृत होने के बावजूद कम होती गयी, यहाँ तक कि भाइकाका ने 1940 के दशक में जितनी ऊंचाई प्रस्तावित की थी अब यह उससे लगभग 15% कम है। अर्थात 1940 के दशक में इससे काफी ऊँचा डैम बनाया जाना संभव था। जहाँ हमें इस डैम का निर्माण कार्य वर्षों तक रोक कर रखने के लिए न्यायपालिका को दोषी ठहराना चाहिए तथा इस समस्या का समाधान ढूंढना चाहिए, वहीँ हम इसे मंजूरी मिलने का जश्न मना रहे हैं, जैसे कोई वास्तविक युद्ध जीत लिया हो।
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3. नदी की स्वच्छता का बढ़ाचढ़ाकर प्रचार
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तालाब, ग्लेशियर आदि श्रोतों से नदी में आने वाला जल हमेशा स्वच्छ होता है। अतः नदी को स्वच्छ बनाये रखना आसान है--- बस उसमे गंदगी या कूड़ा न डालें!! सीवर के पानी या फैक्टरियों से निकलने वाले पानी को नदी में बहाने से पहले उसे साफ़ कर लें।
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यदि हम नदियों में गन्दा पानी न बहाएं, तो नदियां हमेशा साफ़ रहेंगी। एक बार गन्दा पानी नदी में डालने पर वह तब तक साफ़ नही हो सकती जब तक वह पानी समुद्र में जाकर न मिल जाये, और इसमें हफ़्तों का समय लग सकता है। यदि हम प्रतिदिन गन्दा पानी नदी में बहाते रहें तो वह नदी कभी भी स्वच्छ नही रखी जा सकती। यदि हम नदी में गन्दा पानी बहाना बंद कर दें तो कुछ ही हफ़्तों में वह नदी साफ़ हो जाएगी। इसका अर्थ यह हुआ कि नदी की सफाई की नही जा सकती, बल्कि इसका मतलब सिर्फ सीवर की सफाई है!! इस परियोजना का नाम होना चाहिए- "[नगर] सीवर जल स्वच्छता परियोजना", यहाँ नगर की जगह उस नगर/ शहर का नाम होना चाहिए जो उस नदी के किनारे बसा है।
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इसकी सभी वित्तीय एवं प्रशासनिक जिम्मेदारियां उस शहर की होनी चाहिए। फैक्ट्री के पानी को साफ़ करने की वित्तीय एवं प्रशासनिक जिम्मेदारियां उस फैक्टरी के मालिक की होनी चाहिए। सरकार की भूमिका बस यह होनी चाहिए कि वह नदियों में रसायनयुक्त पानी बहाने वालों को सजा दे।
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सारांश यह है कि पिछले 30 वर्षों से "सीवर स्वच्छता परियोजनाओं" को बढ़ा चढ़ा कर "पवित्र नदी स्वच्छता परियोजनाओं" के नाम से प्रचारित किया जा रहा है, मानो नदियों के उद्गम श्रोत ही दूषित हैं और नदी के जल को साफ़ किया जा रहा हो!!! और अब तो इस बढे चढ़े प्रचार का और भी वृहत रूप हम देख रहे हैं--- हजारों करोड़ रूपये की परियोजनाएं, एक नया मंत्रालय, विदेशी कम्पनियाँ, और क्या क्या नहीं हो रहा!! यह सब बस सीवर की गन्दगी को साफ़ करने के लिए हो रहा है जिसके लिए उपयोग होने वाली तकनीक सौ साल पुरानी है, तथा रसायनों को हटाया जायेगा जिसकी तकनीक भी दशकों पुरानी है।
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4. विद्युत ऊर्जा उत्पादन में वृद्धि के लिए हमें नेताओं की प्रशंसा करने की आवश्यकता नही है।
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पिछले दस सालों में विद्युत ऊर्जा में वृद्धि के लिए सरकार और नेताओं की प्रशंसा करने की प्रवृत्ति हमें छोड़नी होगी। यह ऐसा ही है जैसे भारत में सेलफोन का उपयोग बढ़ने के लिए हम नेताओं और धीरूभाई अम्बानी की प्रशंसा करें, जबकि इसका कारण है कि अमेरिकियों ने इन सेलफोनों को बनाया, और चीन ने इसे सस्ता बनाया।
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इसी प्रकार, भारत में पिछले दस सालों में विद्युत ऊर्जा में वृद्धि होने का कारण यह है कि सौर ऊर्जा उत्पादन की लागत कम हुई है। इसका कारण है कि अमेरिकियों ने सौर पैनलों को और अधिक उन्नत बनाया तथा चीन ने इसे सस्ता बनाया। कोयला प्लांटों की लागत भी कम हुई क्योंकि उपकरणों की कीमते कम हुई तथा इन्हे इंस्टॉल करने का कौशल भी बहुत लोगो के पास आया।
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इस प्रकार सरकार और नेताओं की प्रशंसा को देखकर मुझे 1990 का दशक याद आता है। उस समय भारत के सॉफ्टवेयर निर्यात, एसटीडी बूथों आदि में वृद्धि के लिए कुछ लोग पीवी नरसिम्हाराव और मनमोहन सिंह की तारीफ किया करते थे।
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5. एलटीसी घोटाला-- "सीबीआई का दुरूपयोग राज्यसभा में सांसदों के वोट के लिए" करने की किताब में एक और नया अध्याय
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6 सांसदों का एलटीसी घोटाला मात्र कुछ लाख रूपये तक का है। सभी सांसदों को मिला दे तो भी यह राशि एक करोड़ पार नही करती। अतः नमो के इन सांसदों के पीछे पड़ने का कारण वस्तुतः घोटाला तो नही हो सकता, बल्कि इसके पीछे उद्देश्य है राजयसभा में अपनी मर्जी के कानून पारित करने के लिए समर्थन हेतु सांसदों पर दबाव डालना। यदि लक्ष्य वास्तव में "घोटाला मुक्त भारत" होता तो नमो इन छोटे चूजो का पीछा करने में समय नष्ट करने की जगह सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय, पूर्व मंत्रियों, आईएएस, आईपीएस आदि बड़े हाथियों के पीछे पड़ते। यूपीए को सांसदों का समर्थन सीबीआई के माध्यम से प्राप्त हुआ था। और वही घटिया छलपूर्ण तरीके अब भी जारी हैं। नमो के पास एक अच्छा बहाना है- "कांग्रेस ने भी तो 60 साल तक यही किया है।"
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अतः इस तरह का छल यदि नमो सांसदों पर आजमाते हैं तो ज्यादा आपत्ति मैं नही करूंगा। चूँकि 1950 के दशक से ही सभी सांसद एक दुसरे के खिलाफ इसी प्रकार के गलत तरीके इस्तेमाल करते आये हैं। साथ ही पीड़ित सांसद पीआईएल दायर कर सकते हैं। किन्तु मैं उम्मीद करता हूँ कि सीबीआई/ आईटी के ऐसे घटिया तरीकों को नमो निजी तौर पर व्यक्तियों पर लागू नही करेंगे, और ऐसा करना चाहिए भी नही। आम जनता में इतनी ताकत नही होती कि वह इस प्रकार के तरीके आजमाए।
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6. कृपया गूगल पर Nitin Gadakari Tree Highway सर्च करें। उन्होंने कहा है कि उनकी योजना राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे 200 करोड़ पेड़ लगाने की है। इन राजमार्गों की लम्बाई लगभग 93000 कि. मी.= लगभग 1 लाख कि. मी. है। यदि दो पेड़ों के बीच दूरी 5 मीटर होगी, तो 1 कि. मी. में लगभग 1000/5 = 200 पेड़ लगाये जा सकते हैं।
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इस प्रकार 1 लाख कि. मी. में लगभग 200 लाख पेड़= लगभग 2 करोड़ पेड़ लगाये जा सकते हैं। इस प्रकार राजमार्ग के दोनों तरफ अधिकतम 4 करोड़ पेड़ लगाये जा सकते हैं, वह भी तब जब राष्ट्रीय राजमार्गों का कोई भाग बिना वृक्षों के खाली न छोड़ा जाये।
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अब मान लीजिये राजमार्ग के साथ साथ लंबवत कई पंक्तियों में पेड़ लगाये जाएँ, तो गडकरी द्वारा प्रस्तावित संख्या तक पहुँचने के लिए दोनों तरफ कम से कम 50 पंक्तियों में पेड़ लगाने होंगे। इसमें सड़क के दोनों तरफ 250 मीटर जमीन की आवश्यकता होगी। राजमार्गों के दोनों तरफ सरकार के पास इतनी जमीन नही है!!
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अतः मंत्रीजी को एक कैलकुलेटर की आवश्यकता है। :)
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--- राहुल चिमनभाई मेहता, राइट टू रिकॉल ग्रुप, 15- जून -2014.
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