Rahul Mehta Gandhinagar LsCandidate

बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मालिकों द्वारा नेताओं को अपने नियंत्रण में रखने का तरीका यह है कि वे उन्हें अपनी पूरी जिंदगी की कमाई को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के शेयरों में निवेश करने को बाध्य करते हैं। भाजपा नेताओं तथा उनके प्रायोजकों जैसे- अडानी/ अम्बानी आदि का अधिकांश पैसा डिपाजिट आदि के माध्यम से बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मालिकों के नियंत्रण में है।
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किन्तु बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मालिक एके का उपयोग एक अतिरिक्त हथियार के तौर पर कर रहे हैं, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि नमो एफडीआई, मॉरीशस रुट, सेरोगेट मदर आदि कानूनों को समर्थन देने के अपने समझौते पर कायम रहें। किसी भी सूरत में यदि नमो अत्यधिक राष्ट्रवादी प्रवृत्ति का प्रदर्शन करते हैं तो बिकाऊ मीडिया एके को अत्यधिक सकारात्मक कवरेज देने लगेगा, तथा नमो को बुरा दिखायेगा। नमो को बुरा दिखाने के लिए मात्र एक मुद्दा ही काफी है- गैस की कीमतों में वृद्धि का मुद्दा।
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सारांश यह है कि जिस प्रकार सोनिया बहुराष्ट्रीय कंपनियों/ वेटिकन के हाथों की कठपुतली रही, ठीक उसी प्रकार एके भी एक कठपुतली ही हैं।
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बहुराष्ट्रीय कंपनियों के नियंत्रण की इस समस्या का समाधान सरकार को वास्तविक रूप से मजबूत बनाना है- अर्थात मॉरीशस रुट समाप्त करना, एफडीआई, सेज़ आदि के द्वारा करों में अनैतिक छूट को समाप्त करना, न्यायालयों में सुधार, भ्रष्टाचार दूर करने के लिए वास्तविक कदम उठाना (न कि लोकपाल व जनलोकपाल जैसे अनुपयोगी विचार प्रस्तुत करना), प्रधान मंत्री, मुख्य मंत्री, उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश आदि सभी पदों पर राइट टू रिकॉल लागू करना आदि। जब तक सरकार और न्यायालय समस्याग्रस्त हैं, नमो को बिकाऊ मीडिया द्वारा मिलने वाला कवरेज उन्हें जीत तो अवश्य दिला सकता है, किन्तु हमें बहुराष्ट्रीय कंपनियों के नियंत्रण से आजादी नही दिल सकता।
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मैं समझ सकता हूँ कि क्यों कई नमो- भक्त सिर्फ कठपुतली= एके से उलझते हैं, किन्तु बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मालिकों जैसे उनके मदारियों का सामना नहीं करना चाहते। इसका कारण यह है कि यदि वे इस बहुराष्ट्रीय कंपनियों के नियंत्रण की बात को स्वीकार कर लें तो इससे भाजपा की छवि भी ख़राब होगी, चूंकि वह भी अब भारत में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सभी एजेंडों को स्वीकार कर रही है।