Rahul Mehta Gandhinagar LsCandidate

एके मात्र 10000 रू. की जमानत की राशि भी नही जमा कर रहे, यह एक नाटक है। नमो द्वारा संसद भवन के फर्श पर माथा टेकना तथा संसद में रोना भी एक नाटक ही था। कांग्रेस तो 100% नाटक है- बताने पर एक लम्बी सूची बन जाएगी। हम यह उम्मीद कर सकते हैं कि स्वामी रामदेव जी द्वारा 3 जून 2011 को लगभग 11 बजे रात में मॉरीशस रुट समाप्त करने की मांग करना एक नाटक नही था। ऐसे नाटक बुरे क्यों हैं? और हम कार्यकर्ताओं को क्यों और कैसे इन्हें ख़त्म करना चाहिए? और यदि सब कुछ नाटक है तो वास्तविकता क्या है?
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मात्र अच्छे कानून ड्राफ्ट ही वास्तविकता हैं, जो कि भारत की निर्माण क्षमता बढ़ा सकते हैं तथा यह वास्तविकता दूर- दूर तक दिखाई नही दे रही।
नाटक कोई वास्तविक समस्या नही है-- किन्तु मैं ऐसे अनेकों कार्यकर्ताओं को देख रहा हूँ जो न सिर्फ इस नाटक को वास्तविकता समझते हैं, बल्कि वे अपना सारा समय भी इन नाटकों की प्रशंसा करने में व्यतीत कर रहे है।
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इस प्रकार के नाटक में बुरा क्या है? --- ऐसे नाटक तभी सफल होते हैं जब बिकाऊ मिडिया अभिनेता को समर्थन दे !! यदि.बिकाऊ मीडिया अभिनेता को समर्थन नही देती, तो वह इस नाटक को इतने नकारात्मक रूप में पेश कर सकती है कि लोगों को यह नाटक लगे तथा यह फ्लॉप शो हो जायेगा। अब बिकाऊ मीडिया इस प्रकार के नाटक को हिट बनाने के लिए मोटी फीस की मांग करती है। और इससे राजनीति तथा राष्ट्र बिकाऊ मीडिया के मालिकों पर और अधिक निर्भर होता जायेगा। अर्थात इस प्रकार के प्रत्येक नाटक के साथ राष्ट्र और अधिक कमजोर होता जाता है, तथा बिकाऊ मीडिया के मालिक अधिक सशक्त होते जाते हैं। इसलिए मेरे विचार से हम कार्यकर्ताओं को इस प्रकार के नाटकों का पटाक्षेप करने की कोशिश करनी चाहिए।
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हम अपना अत्यधिक समय नाटकों में व्यर्थ कर रहे है। पूरा जनलोकपाल आंदोलन महज एक नाटक था- अन्ना द्वारा प्रस्तावित जनलोकपाल जिसमें राइट टू रिकॉल जनलोकपाल का कोई प्रावधान नही था, उससे राष्ट्र को फायदे की जगह नुकसान ज्यादा होगा। फिर हमने सभी राजनीतिक दलों में दसियों नाटक देखे-- रैलियां, बिके हुए साक्षात्कार और इनमें क्या- क्या नहीं शामिल है।
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अगला नाटक 26 मई को नमो के अतिखर्चीले शपथ ग्रहण समारोह में आ सकता है। गैर जरूरी खर्चों की एक सीमा होनी चाहिए। मैं अनिवार्य खर्चों, जैसे सुरक्षा का समर्थन करता हूँ। हम एक और प्र. मं. की हत्या लाल बहादुर शास्त्री, देवी इंदिरा अम्मा, राजीव गांधी आदि की तरह नहीं होने देना चाहते। ऐसा खर्चीला समारोह राजनीति को बिकाऊ मीडिया पर और अधिक निर्भर बनाएगा। क्योंकि यदि बिकाऊ मीडिया इन खर्चों को नकारात्मक तरीके से प्रस्तुत करे तो इससे शासन में अस्थिता आएगी।
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इन नाटकों का एक अन्य नकारात्मक पहलू यह है कि इससे कार्यकर्ताओं तथा मतदाताओं का कीमती समय बर्बाद होता है। वह समय जो यह समझने में लगाया जाना चाहिए था कि कौन सा कानून ड्राफ्ट समस्याओं का समाधान कर सकता है, इस प्रकार के नाटक देखने और उनकी तारीफ करने में खर्च हो जाता है। यह सब आनंद प्रदान कर सकता है, यदि हमारे शत्रु राष्ट्रों जैसे यूएसए, चीन आदि के कार्यकर्ता तथा मतदाता भी अपना समय इसी प्रकार व्यर्थ कर रहे होते, किन्तु ऐसा नही है। अतः हमारा इस प्रकार समय व्यर्थ करना तथा उनके द्वारा अपना समय कम नष्ट करना हमारे विनाश का कारक बन सकता है।
एके के जमानत का मुद्दा देखें तो हम पाते है कि इसकी जगह यदि एके ने सबूत दिए होते, अथवा गडकरी जैसे नेताओं का भ्रष्टाचार रोकने के लिए कानून ड्राफ्ट दिया होता तो नागरिकों का ज्यादा भला होता। इसी प्रकार 26 मई को होने वाला भव्य शपथ ग्रहण समारोह देखे तो हम पाते हैं कि पैसे खर्च करने के इससे अच्छे कई उपयोगी तरीके हैं।
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समाधान:
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हम कार्यकर्ता इस प्रकार के 10000 रू. के जमानत राशि के नाटक या संसद भवन में रोने के नाटक आदि का पटाक्षेप कैसे करें? हम स्वयं भी इसे नाटक कहें तथा यह सचमुच नाटक है यह सूचना अधिकतम लोगों तक फैलाएं। जब ज्यादा से ज्यादा लोग इसे नाटक समझेंगे तो शीर्ष नेता की ऐसी हरकतें करने की प्रवृत्ति कम होती जाएगी।
अतः मेरा आपसे आग्रह है कि यह सबको बताएं कि यह सब नाटक है, नाटक करना गलत है, तथा इनपर विराम लगना चाहिए। ताकि वास्तविकता के लिए अधिक समय मिले।