Rahul Mehta Gandhinagar LsCandidate

1. ए.के. एक छद्म- समाधान (pseudo-solution) है, फिर भी उसे सुनामो (TsuNaMo) के बावजूद दिल्ली में 33% तथा पंजाब में लगभग 40% (?) मत क्यों प्राप्त हुए? क्योंकि भ्रष्टाचार अभी भी एक वृहत मुद्दा है, तथा मतदाता भाजपा को भ्रष्टाचार रोकने के लिए समाधान रहित मानते हैं। इसका मैं यह समाधान प्रस्तावित कर रहा हूँ कि कार्यकर्ता उन वास्तविक कानून ड्राफ्टों पर ध्यान केंद्रित करें जिनसे भ्रष्टाचार दूर हो सकता है। अन्यथा, यदि बिकाऊ मिडिया एके को काफी कवरेज दे, तथा नमो को नकारात्मक कवरेज दे तो सम्पूर्ण भारत में आआपा भाजपा से भी आगे निकल जाएगी।
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2. ऐसा प्रतीत होता है कि बिकाऊ मिडिया ने पंजाबी चैनलों पर एके को ज्यादा कवरेज दिया तथा सुनामो को कम कवरेज दिया। और इसीलिए आआपा को पंजाब में ज्यादा मत मिले।
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3. क्यों बहुत सारे लोग अभी भी एके द्वारा रचे गए नाटक को पसंद करते है, जैसे- 10000 रू. की जमानत की राशि जमा न करके कुछ दिन जेल में व्यतीत करना।
एके- 420 को दिसंबर- 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनावों में 30% मत मिले, जबकि मई- 2014 के लोकसभा चुनाव में सुनामो के बावजूद दिल्ली में 33% मत मिले। और पंजाब में, हालाँकि मेरे पास बिलकुल सही संख्या नही है, आआपा को भाजपा+ एसएडी की तुलना में अधिक या लगभग बराबर मत मिले, जो कि 40% के आस पास है। हालाँकि दिल्ली में भाजपा का मत प्रतिशत दिसंबर- 2013 से बढ़कर 46% हो गया, और इसलिए उसने सभी 7 सीटें जीत लीं। किन्तु आआपा द्वारा 33% मत प्राप्त करना भी कोई छोटी उपलब्धि नही है।
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आआपा द्वारा इतने अधिक मत प्राप्त करने की वजह यह है कि भाजपा को भ्रष्टाचार की समस्या से निबटने में अक्षम माना जाता है जो कि सही भी है। वहीं आआपा हालाँकि 100% नकली समाधान है, फिर भी उसे भ्रष्टाचार की समस्या का समाधान के रूप में पेश किया जाता है। और समस्या सिर्फ भ्रष्टाचार ही नही है--- घूसखोर बाबू आवेदक को काफी प्रताड़ना एवं पीड़ा भी देता है। कोई भी व्यक्ति जो भ्रष्टाचार तथा/ अथवा उस घूसखोर बाबू द्वारा दी गयी प्रताड़ना का शिकार रहा है, उसके मन में एके जैसे नकली समाधान के लिए भी जगह होगी, तथा वह एके के नाटक को भी वास्तविकता, आवश्यकता, तथा रास्ता बनाने के लिए जरूरी समझेगा। यहाँ तक कि नमो समर्थकों में भी कई एके समर्थक भी हैं जो "कुछ तो कर रहा है" कहकर एके की प्रशंसा करते हैं।
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कोई भी व्यक्ति जो गुजरात में रह चुका है, यही कहेगा कि नमो का शासनकाल अन्य राज्यों की तुलना में कम भ्रष्ट है, तथा पश्चिमी देशों के जितना कम भ्रष्ट तो दूर दूर तक नही है। दूसरी तरह से कहें तो बिकाऊ मिडिया ने गुजरात के अन्य राज्यों की तुलना में कम भ्रष्टाचार के नकारात्मक पहलुओं को भी बड़ी सफलता से प्रस्तुत किया है।
अतः सुनामो के बावजूद भाजपा नमो को भ्रष्टाचार के समाधान के रूप में पेश नही कर पाई। क्योंकि इस मुद्दे पर वाद विवाद करने से गुजरात पुलिस, शिक्षा आदि सम्बन्धी कई खराबियां सामने आ जाती। अतः भाजपा 24 घंटे बिजली, अपेक्षाकृत अच्छी. सड़कें, कानून व्यवस्था सम्बन्धी इस्लामपरक हिंसा में कमी आदि के जिक्र तक सीमित रही। इससे उ. प्र., प. बंगाल, असम आदि जैसे राज्यों के लोग बहुत प्रभावित हुए, जहाँ कि अत्यधिक इस्लामी हिंसा, बिजली की कमी, तथा बदहाल सड़कें हैं। किन्तु ये मुद्दे पंजाब, दिल्ली आदि में ज्यादा लोगों को प्रभावित नही कर पाये, क्योंकि पहले से ही वहां अच्छी सड़कें, बिजली की उत्तम व्यवस्था, तथा कम इस्लामी हिंसा है। अतः यहाँ आआपा अपने भ्रष्टाचार के नकली समाधान तथा बिकाऊ मिडिया के कवरेज के बल पर इतना भारी जनसमर्थन पाने में सफल रही।
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अपनी कलम के बल पर बिकाऊमिडिया आगामी सितम्बर- 2014 के दिल्ली चुनावों में भी भाजपा के 10% मत आआपा को दिलवा सकता है। तथा यहाँ तो "मोदी फॉर पीएम" की सुनामो भी नही होगी। इससे भाजपा के मतों की संख्या घटेगी। एके के नाटक को भारी पैमाने पर मिडिया कवरेज मिल सकता है। और इस प्रकार वे दिल्ली के विधानसभा चुनावों में शानदार विजय प्राप्त कर सकते हैं।
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इस कहानी से निम्नलिखित शिक्षा मिलती है-
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(1) यदि नमो के अंध भक्त भ्रष्टाचार तथा इससे होनेवाली प्रताड़ना को नजरअंदाज करते रहे तो आआपा को मिलने वाले मतों का प्रतिशत बढ़ेगा।
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(2) यदि नमो- भगत "बिकाऊ मीडिया मुक्त भारत" के लिए काम नहीं करेंगे तो नमो हों या भारत का कोई भी नेता, बिकाऊमिडिया के मालिकों की आज्ञा मानने को विवश होगा, और भारत रसातल में जाने लगेगा।
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मैं निम्नलिखित समाधान प्रस्तुत करता हूँ-
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1. नमो भगत वास्तविक भ्रष्टाचार विरोधी उपायों पर ध्यान केंद्रित करें, जैसे- राटूरि, ज्यूरी सिस्टम, संपत्ति कर, भ्रष्ट एवं गंभीर अपराधियों का सार्वजनिक रूप से नार्को टेस्ट, मॉरीशस रुट समाप्त करना, आदि। और उन्हें संसद का फर्श छूने, संसद में रोने, आदि जैसे नाटक करने में समय व्यर्थ नही करना चाहिए। आप स्वयं विचार करें कि नमो भगतों ने कितने घंटे इस रोने आदि के नाटक की चर्चा में खर्च किये। यदि इस समय का 1/10 वां भाग भी मॉरीशस रुट पर खर्च किया जाता तो अब तक सरकार इसे रद्द करने पर विवश हो जाती।
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2. यदि कार्यकर्ता ये कार्य नहीं करते तो बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ तथा मिशनरियां एके अथवा इसी प्रकार के किसी अन्य छद्म कार्यकर्ता को आगे बढ़ाते रहेंगी तथा एके का उपयोग नमो या किसी अन्य नेता को ब्लैकमेल करने तथा हर समझौता करने पर विवश करने में करते रहेंगी।
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3. भारत का कोई भी नेता चाहे वो नमो हो, लाल बहादुर शास्त्री, देवी इंदिरा अम्मा या एके, न तो ये राटूरि, ज्यूरी सिस्टम आदि जैसे कानून ड्राफ्ट लाये हैं और न ही कभी लाएंगे। यहाँ तक कि स्वयं कल्कि भी आ जाये तो भी ये कानून वह भारत में नही ला सकता। ये कानून सिर्फ और सिर्फ तभी आ सकते हैं यदि कार्यकर्ता बिना किसी नेता का मास्क या टोपी पहने सीधे इन कानूनों के लिए अभियान चलाये।