Rahul Mehta Gandhinagar LsCandidate

जापान के प्र. मं. की पत्नी का धर्म भारत पर क्या प्रभाव डाल सकता है?
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नमो अमेरिकी संभ्रांत वर्ग एवं मिशनरियों को रोकने हेतु राटूरि, ज्यूरी सिस्टम, संपत्ति कर आदि कानूनों को भारत में लाने की जगह जापान पर भरोसा करना चाहते हैं। मैंने भारत रक्षक डॉट कॉम (bharat-rakshak . com ) पर जरिता नाम से एक पोस्टर देखा, जिससे मुझे कुछ संकेत मिले और मैंने जापान के प्र. मं. तथा उनकी पत्नी से सम्बंधित विकी पेजों को देखा। कृपया मुझे बताएं कि आपने इनसे सम्बंधित सर्च में क्या पाया?
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जापान के प्र. मं. की पत्नी कैथोलिक है। (इस हकीकत को सबके सामने लाने के लिए मैं जरिता का आभारी हूँ) । कुछ लोग कहते हैं कि वह जन्म से ही कैथोलिक है, जबकि कुछ कहते हैं कि उसने 20 वर्ष की अवस्था में धर्म परिवर्तन किया। तथा बाद में उसने एक ऐसे व्यक्ति से विवाह किया जिसका एक उज्जवल राजनीतिक भविष्य था, तथा जो आगे चलकर प्र. मं. बन गया। अब वह 51 साल की है, तथा उसके कोई बच्चा नही है- न तो स्वयं का न ही गोद लिया हुआ। प्रायः जो लोग बच्चे नही रखने का फैसला लेते हैं वे हमेशा तो नही, किन्तु अक्सर मिशनरी विचारधाराओं वाले होते हैं। अतः जापान के प्र. मं. की पत्नी भी मिशनरी विचारधारा रखती हैं, इसकी प्रबल संभावना है।
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यदि वे मिशनरी विचारधारा रखती हैं तो संभव है कि उन्होंने शिंजो अबे को इसलिए चुना क्योंकि शिंजो अबे एक होनहार राजनीतिज्ञ के रूप में उभर रहा था जिसका उपयोग कर के वह अपने मिशनरी लक्ष्यों को पूरा कर सकती है। अतः शिंजो अबे भी जापानी लोगों को शिंटोवादी हाव भाव के साथ मूर्ख बनाते हुए छिपे तौर पर मिशनरी समर्थक हो सकता है। यदि वह इतना ही शिंटोवादी होता तो एक कैथोलक से विवाह क्यों करता?
यूएस व बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मालिकों ने शिंजो अबे को जापान की राजनीति में उभरने में इसी कारण से मदद की। शिंजो अबे जितनी अधिक ऊंचाई पर जायेगा, उसकी पत्नी सम्पूर्ण विश्व में मिशनरी विचारों का प्रसार करने में उतनी अधिक प्रभावशाली भूमिका निभा पायेगी।
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अब यदि शिंजो अबे यूएस व बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मालिकों का सहयोग चाहता है तो यूएस व बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मालिक उससे तथा उसकी पत्नी से यह अपेक्षा रख सकते हैं कि वे भारत में मिशनरी को समर्थन दें। शिंजो अबे जापान में तो मिशनरियों को समर्थन नही दे सकता, क्योंकि ऐसी कोशिश भी करने से उसे प्राप्त होने वाले मतों के प्रतिशत में भारी कमी आ सकती है। किन्तु भारत में मिशनरियों की मदद करने पर उसे मतों के प्रतिशत के कम होने का कोई खतरा नही।
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एक बात तो मेरे सामने स्पष्ट है--- जापान के प्र. मं. की पत्नी भारत में मिशनरियों की मदद करना चाहती है। अतः वह तथा यूएस व बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मालिक शिंजो अबे को प्रभावित कर उन्हें भारत में मिशनरियों की मदद करने हेतु तैयार करने की हरसंभव कोशिश करेंगे।
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अब देखने की बात यह है कि जापान के प्र. मं. तथा यूएस व बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मालिक किस तरह से प्रभाव डाल सकते हैं। एक पुरानी कहावत है "एक तरफ सारी खुदाई, एक तरफ जोरू का भाई", अर्थात यदि एक तरफ पूरी दुनिया, यहाँ तक कि ईश्वर भी हों, और दूसरी तरफ बीवी का भाई हो तो व्यक्ति अपनी बीवी के भाई का ही समर्थन करेगा। अब मिशनरियों को जापान के प्र. मं. की पत्नी का भाई मान लें, अर्थात जापान के प्र. मं. का साला (ब्रदर इन लॉ), तो सारी कहानी स्पष्ट हो जाएगी।
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धर्मनिरपेक्ष तर्क है कि शीर्ष नेताओं के धार्मिक मान्यताओं को मुद्दा नही बनाया जाना चाहिए।
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हम शीघ्र ही सभ्यताओं के बीच टकराव के प्रत्यक्षदर्शी बनेंगे। सभी देशों में प्रजातंत्र कमजोर पड़ता जा रहा है तथा यह संभ्रांत वर्ग तथा उनके सहयोगी शीर्ष नेताओं द्वारा संचालित कुलीनतंत्र में बदलता जा रहा है। ये संभ्रांत व्यक्ति अपने कंपनी के कर्मचारियों तथा सेना को प्रेरित करने के लिए धर्म का उपयोग करना चाहते हैं। अतः संभ्रांत वर्ग तथा शीर्ष नेताओं की धार्मिक मान्यताएं हमारे लिए एक प्रमुख मुद्दा है। अतः हम कार्यकर्ताओं को चाहिए कि इन संभ्रांत व्यक्तियों तथा शीर्ष नेताओं की धार्मिक मान्यताओं की सार्वजनिक रूप से चर्चा करें।
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समाधान:
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जापानी कंपनियों पर निर्भरता छोड़कर हमें भारतीय प्रशासनिक सुधारों पर निर्भर होना चाहिए I भारतीय कंपनियों के विकास तथा अधिक भ्रष्ट मामलों में ज्यूरी सिस्टम, राटूरि, संपत्ति कर, सार्वजनिक रूप से नार्को टेस्ट आदि पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
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