Rahul Mehta Gandhinagar LsCandidate

भाजपा, आआप तथा कांग्रेस के चुनाव घोषणापत्रों में समानताएं :

1. तीनों ही पार्टियां विदेशी कंपनियों को एफडीआई (FDI) के माध्यम से मिलनेवाली छूट का समर्थन करती हैं जिसके कारण भारत में विदेशी कंपनियों को आय कर तथा कई अन्य कर नही चुकाने पड़ते। तथा ये तीनों पार्टियां इस बुरे कानून को बरक़रार रखने पर जोर देती हैं।

2. काशी विश्वनाथ देवालय तथा कृष्ण जन्मभूमि देवालय के मुद्दे पर तीनों हीं घोषणापत्र मौन हैं।

3. तीनो पार्टियां बातें तो बड़ी बड़ी करती हैं लेकिन उन्हें लागू करने के लिए कोई कानून ड्राफ्ट नही देतीं। आआप ने लोकपाल ड्राफ्ट प्रस्तावित किया, जो कि दंडात्मक शक्तियों के केंद्रीकरण का बदतर रूप प्रस्तुत करता है , तथा यह एक ऐसा ड्राफ्ट है जो भारत को चांदी प्लेट में रखकर बड़ी आसानी से विदेशी ताकतों के हाथों में सौंप देगा। तथा किसी अन्य मुद्दे पर आआप ने कोई ड्राफ्ट नही दिया। भाजपा तथा कांग्रेस के पास भी कोई ड्राफ्ट नही है।

4. तीनो घोषणापत्र बांग्लादेशियों को देश से निकालने का प्रश्न टाल जाते हैं।

5. ये सभी घोषणापत्र जनसँख्या नियंत्रण तथा उभरते हुए लोकतान्त्रिक असमानताओं पर भी चुप हैं।

6. ये घोषणापत्र कहते हैं "कर नियमों का सरलीकरण होना चाहिए", किन्तु इसे विस्तार से स्पष्ट नहीं करते।

7. तीनो घोषणापत्र उच्चतम तथा उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों, निचली अदालतों के न्यायाधीशों, पुलिस आदि में भाई भतीजावाद तथा भ्रष्टाचार की द्रुतगामी वृद्धि को कम करने के बारे में भी चुप हैं।

8. तीनो ही घोषणापत्र महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों को अनदेखा कर रहे हैं, चूँकि बाल अपराध कानून (जुवेनाइल लॉ) के अनुसार 18 वर्ष से कम उम्र में अपराध करने पर 3 साल से ज्यादा की सजा नही मिल सकती, चाहे कितनी भी बार अपराध किया हो अथवा अपराध कितना भी गंभीर प्रकृति का हो। संयोग से यह कानून 2001 ई. में भाजपा ने ही बनाया था, किन्तु कांग्रेस तथा आआप ने भी कभी इसका विरोध नही किया।

9. हालांकि इनमें कुछ अंतर भी है, किन्तु तीनो की बाते समान रूप से चिंताजनक हैं। उदाहरण के लिए भाजपा का घोषणापत्र रक्षा क्षेत्र में FDI का समर्थन करता है, जिससे कि भारतीय हथियार व्यवसाय विदेशी कंपनियों की दया पर निर्भर हो जायेगा। वहीँ कांग्रेस तथा आआप के पास हथियार निर्माण को बढ़ावा देने के लिए कोई प्रस्ताव ही नही है।
इन तीनों पार्टियों ने अपना चुनाव घोषणापत्र बिलकुल आखिर में दिया, नामांकन की प्रक्रिया शुरू होने के कुछ ही दिनों पहले।

घोषणापत्र हमेशा से बेकार तो माने ही जाते रहे हैं, किन्तु इस चुनाव ने तो घोषणापत्रों की अनुपयोगिता की सारी हदें ही पार कर लीं।