Rahul Mehta Gandhinagar LsCandidate

Hindi translation of chap-6 of the article "कौन से कानून ड्राफ्ट मंदिरों के प्रशासन में सुधार ला कर सभी हिन्दू सम्प्रदायों को सिख धर्म की तरह सशक्त बना सकते हैं?"

Chap- 6. किस प्रकार आर्यसमाज द्वारा अपेक्षाकृत अच्छी व्यवस्था देने के बावजूद विकास अवरूद्ध हो गया?

(pls post comments at the end of main article ONLY . comments posted here will be deleted. The main article is --- what law-drafts can make all sects of Hinduism as powerful as Sikhism . The fukk article is at facebook . com / note.php ? note_id = 10151479439181922 )

For link to translation of chap-1 to chap-3 pls see above link. This post has translation of chap-3. Trnslation is done by a friend of mine

आर्य समाज में मंदिर के ट्रस्टियों का कार्यकाल आजीवन नहीं होता। उनका कार्यकाल कुछ वर्षों का होता है और उस अवधि के पूरा होने पर उनकी जगह नए ट्रस्टी आ जाते हैं जो कि जरूरी नही कि उनके नजदीकी रिश्तेदार हों। ये ट्रस्टी सम्मानित व्यवसायी, उद्द्योगपति तथा बुद्धिजीवि होते हैं। जानेवाले ट्रस्टी हीं नए ट्रस्टी का निर्णय करते हैं। यह ठीक उसी प्रकार का होता है जिस प्रकार से प्रोटेस्टेंट चर्चों की व्यवस्था होती है। मेरे विचार से मंदिर प्रमुख की नियुक्ति के लिए सिखों द्वारा अपनायी गयी पध्धति अपेक्षाकृत अधिक उत्तम है, किन्तु आर्य समाज का तरीका भी उत्तराधिकार एवं आजीवन कार्यकाल से तो कई गुना कम बुरा है। कुछ समय के अंतराल पर चक्रीय क्रम से ट्रस्टियों के बदलते रहने से यहाँ धन संग्रह की प्रवृत्ति नहीं होती , अतः दान में मिले धन का उपयोग सामुदायिक सशक्तिकरण सम्बन्धी कार्यों में होता है।

आर्य समाज द्वारा अपनायी गयी प्रणाली का अनुकरण सभी मंदिरों द्वारा किया जा सकता था। किन्तु वास्तव में ऐसा नहीं हो सका। क्योंकि मंदिर प्रबंधन की यह पद्धति धार्मिक विश्वास के साथ अत्यधिक अंतर्संबंधित हो गयी थी। यदि अन्य हिन्दूओं के समक्ष मात्र मंदिर प्रबंधन का यह तरीका रखा जाता तो वे इसे स्वीकार कर सकते थे। किन्तु ऐसा लगता है कि इस पद्धति को धार्मिक विश्वास के साथ जोड़कर प्रस्तुत किया गया। तथा इनके कुछ विश्वास अन्य हिन्दूओं के लिए स्वीकार्य नहीं थे, जैसे- मूर्तिपूजा का विरोध। अतः इनकी मंदिर व्यवस्था की प्रणाली भी नहीं अपनायी गयी।