Pawan Jury BhilwaraRj
क्रिकेट :
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१. मैच फ़िक्स हो या न हो, दोनो ही सूरत में क्रिकेट एक लाभदायक खेल नही है । अतः इसे खेल की सभी श्रेणियों से निकाल देना चाहिए ।
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२. सरकारी स्कूल एवं कोलेजों में क्रिकेट प्रतियोगिताओं पर प्रतिबंध लगाया जाए ।
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३. सरकार क्रिकेट संगठनों को किसी भी प्रकार की टेक्स रियायते न दे । और इन्हें खेल मैदान के लिए एक इंच भी भूमि आवंटित नही करे ।
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४. क्रिकेट जब खेल की श्रेणी से बाहर हो जाएगा तो क्रिकेट खेलने वालों को अर्जुन, पद्म, भारत रत्न पुरस्कार मिलने और क्रिकेट खेलने की एवज़ में सरकारी नौकरी मिलने के रास्ते ख़ुद ही बंद हो जाएँगे ।
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५. सरकारी संगठन, अर्ध सरकारी संगठन एवं सरकार द्वारा पोषित किसी भी संगठन पर क्रिकेट प्रतियोगिताए आयोजित करवाने या टीम उतारने पर प्रतिबंध लगे ।
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६. जब क्रिकेट खेल की श्रेणी में नही रहेगा तो दिल्ली दूरदर्शन एवं आकाशवाणी क्रिकेट की ख़बरों एवं इसकी कमेंट्री का प्रसारण भी नही करेंगे । यदि तब भी करते है तो सरकार इन पर प्रतिबंध लगाए ।
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७. ज़ीसटी की अधिकतम कर सीमा 28% है, अतः क्रिकेट की बोल, बेट, पैड आदि सभी पर 28% कर लगाया जाए । ( वैसे इस पर एक १०% का अलग से टेक्स "समय बर्बाद मनोरंजन कर" नाम से भी लगाया जा सकता है । पर मैं ऐसे कर को सपोर्ट नही करता )
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८. सरकार मैच फ़िक्सिंग को क़ानूनी कर सकती है । मतलब यदि कोई व्यक्ति यह आरोप लगाता है कि अमुक मैच फ़िक्स था, तो इस आरोप पर कोई एफ आइ आर नही दर्ज की जाएगी ।
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इतना होने से क्रिकेट से देश व युवाओं को होने वाले नुक़सान की अच्छी ख़ासी भरपायी हो जाएगी । शेष जिन्हें क्रिकेट खेलना एवं देखना है वे निजी संसाधनों से अपना खेल सकते है । सरकार दख़ल नही करेगी । मतलब जिन्हें क्रिकेट खेलना व देखना है और जिन्हें दिखाना एवं खिलाना है वे ख़ुद के संसाधन ख़र्च करे देश पर बोझ न डाले ।
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Added later :
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आउटडोर खेल शारीरिक मेहनत एवं चुस्ती के लिए खेले जाते है । इन्हें किसी भी स्तर पर खेलने से शारीरिक व्यायाम होता है ।
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बास्केट बॉल, हैंड बॉल, बॉली बाल आदि खेलो में ५ से सात खिलाड़ी होते है । ३-३ खिलाड़ी भी हो तो खेल शुरू हो जाता है । ३० मिनिट से एक घंटे में इतना पसीना निकल जाता है कि पूरा व्यायाम हो जाता है । यदि टूर्नामेंट हो तो ४५ मिनिट से १ घंटे की समयावधि में मैच भी ख़त्म हो लेता है और खिलाड़ी व दर्शक दोनो फ़्री हो जाते है । इन खेलो की सामग्री में सिर्फ़ एक गेंद और एक नेट लगता है । और कुछ नही लगता ।
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हॉकी एवं फ़ुटबाल में ११ खिलाड़ी होते है । किंतु मैच की अवधि ९० मिनिट ही होती है । खेल के लिए सिर्फ़ एक गेंद या स्टिक लगती है । बारिश आने से भी खेल चलता रहता है । खेल रोकना नही होता ।
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टेस्ट मैच ५ दिन का होता है । दो खिलाड़ी बेटिंग करते है तब तक उसकी टीम के शेष १२ खिलाड़ी दिन भर बैठे रहते है । ग्राउंड में ४ खिलाड़ी बॉल फेंकते है और शेष ७ ग्राउंड में खड़े रहते है । बॉल उनकी तरफ़ आती है तो उठकर फेंक देते है । और सब से भारी आदमी दर्शक है । ये लोग टीवी के सामने ५ दिन तक बैठकर इन्हें देखते रहते है !!! वन डे खेल में ये सर्कस पूरे दिन चलता है । और ट्वेंटी-ट्वेंटी तो ख़ैर शुद्ध रूप से सट्टा है । ये तो क्रिकेट भी नही है ।
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क्रिकेट की लेदर बॉल शायद ५०० से १००० रुपए की आती है । किंतु ३ दिन में या दिन भर खेलने से एक ही दिन में उधड़ जाती है । बेट ५००० से लेकर लाखों तक का आता है । पैड, ग़्लवस, हेल्मट, सब मिलाओ तो १०-२० हज़ार रुपए एक खिलाड़ी को लग जाते है । और ये खेल पेप्सी और कोक बेचने के सिवा कुछ करता नही ।
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ग्राउंड भी फिर इन्हें बेहद बड़ा चाहिए । उसकी घास को सही रखने को पूरा गाँव पानी पिए जितना पानी एक ग्राउंड पी जाता है । पेप्सी गरमी में बिकती है तो खेल भी गरमी में होता है तो ग्राउंड भी बहुत पानी माँगता है ।
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क्रिकेट देखने वाले बच्चों में एक भयंकर हेबिट डेवलप हो जाती है । पहले तो वे घंटो मैच देखेंगे, और जैसे ही मैच ख़त्म हुआ वे तुरंत बैट बोल लेकर खेलने निकल जाते है । गली में पार्कों में, घर पे, छत पे जगह जगह टिंगर आपको प्लास्टिक और रबर की गेंद से खेलते मिलेंगे । १० क़दम का पिच बना लेते है और तीन चार के झुंड में बेट से बोल पिटते रहते है । न गेंद लेने दौड़ना, न भागना न कूदना । टोटल टाइम वेस्ट !!! और कई अभिभावक भी इन्हें प्रोत्साहन देते है -- मतलब वे भी इसकी लपेट में है ।
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