Pawan Jury BhilwaraRj

तीन साल --- योजनाएं Vs क़ानून
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घाव पुराना होकर जब सड़ने लगता है कुशल चिकित्सक इस पर चीरा लगा देते है, ताकि मवाद बाहर आ सके। यदि सर्जरी नहीं की जायेगी तो घाव अंदर ही अंदर सड़ता रहेगा और अंग काटने की नौबत आ जायेगी। व्यवस्था की सडांध को ख़त्म करने के लिए कानूनों में बदलाव की जरुरत है, योजनाएं सिर्फ लीपा पोती करके यह भ्रम खड़ा करती है कि कुछ "प्रयास" किया जा रहा है।
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स्वच्छ भारत अभियान, रोजगार के लिए स्टार्ट अप इण्डिया, डिजिटल इण्डिया, स्किल डेवलेपमेंट। घर उपलब्ध करवाने के लिए आवास योजना, बिजली के लिए ज्योति योजना, कृषि के लिए स्वस्थ मृदा कार्ड योजना, शहरीकरण के लिए अमृत योजना, गंगा साफ़ करने के लिए नमामि गंगा योजना, सांसद आदर्श ग्राम योजना .... ..... सूची बेहद लम्बी है। जितने दिन सरकार ने शासन किया है उतनी ही योजनाएं लांच कर दी है। कांग्रेस को भी समस्या के समाधान के लिए क़ानून बनाने की जगह योजनाओ से प्रेम था, मोदी साहेब ने भी अपना अधिकाँश इसी नीति में खपाया है।
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योजनाओ एवं कानूनों में क्या अंतर है और कौन सा उपाय बेहतर तरीके से समस्या को सुलझाता है ?
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एक उदाहरण लेते है -- जमीने महंगी है, इसीलिए दूकान और कारखाने लगाने की लागत बढ़ जाती है तथा कई लोग महंगी जमीन होने के कारण इससे पूरी तरह से वंचित हो जाते है। जमीने महंगी होने के कारण ही आज देश की आबादी का बड़ा हिस्सा खुद के लिए एक घर बनाने से वंचित है। जमीन की लागत ज्यादा जबकि मकान बनाने में खर्च कम आता है। जिन जिन ने अपना घर बनाया है वे आपको बताएँगे कि उन्होंने अपने जीवन में जितना बचाया उसमे से अधिकाँश घर बनाने में ही लग गया। महंगाई एवं गरीबी का कारण भी जमीन की ऊँची कीमते है।
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जमीनों की कीमते आसमान इसीलिए छू रही है क्योंकि भारत में किसी भी व्यक्ति को असीमित भूमि खरीदने की "करमुक्त" छूट है। इस वजह से जमीन खरीदना एक अच्छा निवेश बन गया है। अत: भ्रष्ट जज, भ्रष्ट अधिकारी, भ्रष्ट नेता एवं धनिक वर्ग अपने धन का निवेश जमीनों के संचय में करते है। क्रय शक्ति अधिक होने के कारण एक बेहद छोटे वर्ग ने देश की जमीनों का एक बहुत बड़ा हिस्सा अपने कब्जे में ले लिया है, और ये वर्ग इन जमीनों का इस्तेमाल उत्पादकता बढाने में भी नहीं करता। वे बस रुपया कमाते है और जमीने खरीद कर पटक देते है। यदि जमीनों की बढती कीमतों को काबू कर दिया जाए तो भारत में बेरोजगारी, गरीबी एवं आवास की समस्या हल की जा सकती है।
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यदि भारत में "वेल्थ टेक्स" के क़ानून को लागू कर दिया जाता है तो जमीनों की कीमतों में लगभग पांच से दस गुना तक की कमी आ जायेगी। जमीनों की कीमतें गिरने से रोजगार शुरू करना एवं घर बनाना आसान हो जाएगा, उत्पादकता में वृद्धि होगी, लागत में कमी आयगी, जिससे महंगाई एवं गरीबी कम होगी। इस तरह महज एक क़ानून लाकर इन सभी समस्याओं का स्थायी समाधान किया जा सकता है। कोंग्रेस ने हमेशा से ही वेल्थ टेक्स का विरोध किया है, और मोदी साहेब ने भी इसे लागू करने से इनकार कर दिया। वेल्थ टेक्स लागू करने की जगह मोदी साहेब ने रोजगार, गरीबी, आवास, आदि समस्याओं को फौरी तौर पर हल करने के लिए लगभग 2 दर्जन योजनाएं लांच कर दी !!
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आखिर सरकारे क़ानून लाने की जगह योजनाए लांच करने में इतनी रुचि क्यों दिखाती है ?
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दरअसल क़ानून लागू करने के लिए कोई बजट नहीं बनाना होता है। ड्राफ्ट गेजेट में छापने या संसद में पास करने से यह लागू हो जाता है। यदि किसी क़ानून का निष्पादन करने के लिए कुछ नए पदों का सृजन करना होता है तो ये अमुक पद सृजित कर दिए जाते है। किन्तु इस प्रक्रिया में भी पैसा बनाने का अवसर नहीं होता। जबकि योजना बनाने के लिए सबसे पहले एक बजट बनाना होता है। फिर उस योजना को कार्यान्वित करने के लिए सम्बंधित मंत्रालय को वह बजट हस्तांतरित कर दिया जाता है। अब योजना जितनी बड़ी होगी बजट भी उतना ही ज्यादा होगा और मंत्री अमुक बजट को खर्च करने की नीति बनांते समय इसी आदर्श को सामने रखेगा कि उसको ज्यादा से ज्यादा कमाई हो सके।
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उदाहरण के लिए स्किल इण्डिया योजना के लिए इस वर्ष 17 हजार करोड़ का बजट रखा गया है !! इन 17 हजार करोड़ को कांट्रेक्ट, विज्ञापन एवं अनुदान आदि देने में इस तरीके से खर्च किया जाता है कि अधिकतम पैसा मंत्रालय एवं प्रशासनिक अधिकारियो की जेब में चला जाए। स्किल इण्डिया के तहत एनजीओ चलाने वाले कुछ कार्यकर्ताओ ने बताया कि एक व्यक्ति को प्रशिक्षण देने के लिए सरकार से 5000 रूपये रिलीज होते है किन्तु उन तक सिर्फ 1000 ही पहुँचता है। क्योंकि शेष पैसा मंत्रालय से लेकर अन्य अधिकारियो में बंट जाता है। ये सभी योजनाएं भ्रष्टाचार करने के लिए रची जाती है, और सरकारे कानूनी रूप से इन योजनाओं से अवैध पैसा कमाती है। सभी मंत्रियो ने अपने अपने मंत्रालय के लिए ऐसी योजनाए चलाकर रखी है।
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इसी तरह राईट टू रिकॉल मेयर-सरपंच व नगर परिषद्के स्टाफ पर ज्यूरी सिस्टम लागू करके देश को वास्तविक एवं स्थायी रूप से स्वच्छ किया जा सकता था। किन्तु मोदी साहेब ने इसके लिए क़ानून बनाने की जगह स्वच्छ भारत अभियान नाम की योजना चलाने में रुचि दिखायी। स्वच्छ भारत अभियान का बजट 9000 करोड साल का है। और मेरी ही जानकारी में ऐसे दो मामले है जिसमे लोगो ने शौचालय बनाने के लिए स्वच्छ भारत मिशन के तहत दी जाने वाली राशी उठायी, किन्तु उन्होंने शौचालय कभी नहीं बनाया। क्योंकि उनके पास शौचालय पहले से ही बना हुआ था। उन्होंने 2005 में निर्मित शौचालय को 2015 में निर्मित बताया एवं पैसा उठा लिया !!! उन्हें हालांकि चवन्नी ही मिली, क्योंकि शेष पैसा बीच के एवं ऊपर बैठे लोग खा गए !! और इसके बजट का एक बड़ा हिस्सा मीडिया को विज्ञापन के रूप में दी जाने वाली घूस के रूप में चला गया। कुछ योजनाएं सिर्फ मिडिया के लिए ही बनाई जाती है। इनका वास्तविक कोई महत्त्व नहीं होता, और न ही जरूरत होती है। किन्तु इन योजनाओं के माध्यम से बजट बना लिया जाता है और मीडिया को योजना के "प्रचार" के नाम पर घूस दी जाती है।
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मोदी साहेब के 3 साला कार्यकाल में सब तरफ सिर्फ योजनाए ही तैरती नजर आती है। इन सभी योजनाओं से किसी भी समस्या का स्थायी समाधान निकलकर नहीं आता बल्कि कानूनों को लागू न करने के कारण स्थिति और भी बदतर होती जा रही है। शेष, जो क़ानून मोदी साहेब ने लागू किये है उनमे से ज्यादातर समस्याओं को और भी बढ़ाते है। उदाहरण के लिए हाल ही में मोदी साहेब ने गोद लेने के क़ानून में जो बदलाव किया उसकी वजह से दम्पत्ति द्वारा बच्चे को चुनने की प्रक्रिया समाप्त कर दी गयी है। इस वजह से अब संपन्न दम्पत्ति यदि किसी बच्चे को गोद लेना चाहता है तो उसे ऊँचे दाम चुकाने होंगे। इसी तरह से मोदी साहेब नोटबंदी की जो योजना लेकर आये उसकी वजह से भ्रष्टाचार में में 1% की भी कमी नहीं आयी, यह बात वक्त निकलने के साथ पूरी तरह स्पष्ट होती जा रही है।
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तीन साल जा चुके है, मोदी साहेब के पास 2 वर्ष शेष है। बेहतर होगा कि वे स्टंट करने की जगह समस्याओं का वास्तविक समाधान करने के लिए आवश्यक कानूनों को लागू करने में रुचि दिखाए।
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"वेल्थ टेक्स ग्रुप"
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