Pawan Jury BhilwaraRj

जी एस टी की कार्यशाला से विधायक यह कहकर उठकर चले गए कि --- "हमें ये सब टेक्स का चक्कर समझ नहीं आता। हमें जहां बोलोगे वहां ठप्पा लगा देंगे" !!!
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विधायक एवं सांसदों का काम क्या है ? उनका काम है संसद एवं विधानसभा में बैठकर ऐसे क़ानून बनाना जिससे देश की समस्याओ का समाधान हो। बुरे क़ानून देश एवं देश वासियों की कमर तोड़ कर रख देते है जबकि अच्छे क़ानून अच्छे प्रशासन की रचना करके अच्छा देश बनाते है। इन लोगो को सिर्फ इसीलिए चुना जाता है इसके अलावा इनके जिम्मे कोई भी काम नहीं है। इसीलिए चुनाव होते है, इसीलिए संसद एवं विधानसभा भवन बनाए गए है, इसीलिए इन्हें वेतन-भत्ते-सुविधाएं-विशेषाधिकार आदि मिले हुए है। ताकि ये उन कानूनों का अध्ययन करके उनका समर्थन करे जिससे देश को फायदा होगा और उन कानूनों को खारिज करे जिससे देश को नुक्सान होता है। मतलब आप यह कह सकते है कि, इन्हें हम सिर्फ एक काम के लिए ही चुनते और पालते है --- क़ानून पढना और सदन में बैठकर अच्छे क़ानून पास करना।
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लेकिन ये लोग कानूनों को समझने के अलावा बाकि सारे काम करते है। और इन "सारे" कामो को करने के कारण इन्हें अव्वल तो क़ानून पढने और समझने के लिए वक्त ही नहीं बचता और अगर बचता भी है तो इनकी रुचि कानूनों को पढने व समझने में नहीं होती।
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और क्या है ये "सारे" काम जो इन्हें भयंकर रूप से व्यस्त रखते है ?
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इन्हें प्रशासनिक अधिकारियों, ठेकेदारों आदि से हफ्ता वसूलना होता है। अपने आदमियों को अच्छी जगह पर फिट करवाना होता है ताकि उनके माध्यम से पैसा खिंचा जा सके। इन्हें सभाओं में जाकर फूल मालाएं पहननी होती है, भासण देने होते है, शिलन्यास/लोकार्पण करने होते है, और इन सब गतिविधियों के फोटो अखबारों में छपवाने होते है। ताकि जलवा बना रहे। इन्हें उन उद्योग्पतियों से पैसा खींचना होता है जिन्हें ये पद पर रहते हुए मदद कर रहे है। फिर इन्हें परिवार के साथ विदेश यात्राएं करनी होती है। टीवी पर आकर मटर गश्ती करनी होती है। और इन सब कामो की थकान उतारने के लिए सदन में बैठकर ऊँघना होता है। और सबसे बड़े और दो जरूरी काम जो इन्हें करने होते है --- १) इन्हें पद का दुरूपयोग करके कमाए गए अपने धन को छुपे हुए ढंग से निवेश ( ठिकाने लगाना ) करना होता है। २) अगले चुनाव में टिकेट लेने के लिए अगले पूरे 5 वर्ष तक "ऊपर" सेटिंग बनाने की कोशिस करते रहने होती है। क्योंकि यदि टिकेट नहीं मिला तो राजनीति ख़त्म हो जायेगी।
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इन सभी कामो में पूरी तरह से डूबे रहने के कारण हमारे सांसद, विधायक एवं मंत्री भी कानूनों को समझने में माथापच्ची नहीं करते। फिर वे किसी क़ानून का समर्थन या विरोध किस आधार पर करते है ?
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१) किसी क़ानून के आने से जिस लोबी को फायदा होता है वे इन्हें पैसा पहुंचा देते है। और ये अमुक क़ानून का समर्थन कर देते है। इसी तरह से किसी क़ानून को पास न करने के लिए इन्हें यदि पैसा पहुंचा दिया जाता है तो ये लोग अमुक क़ानून का विरोध करने लग जाते है। उदाहरण के लिए जब कोंग्रेस शासन में थी तो सभी अधिकाँश मंत्रियों को "टू चाइल्ड पॉलिसी" क़ानून न लाने के लिए पैसा दिया जाता था। सत्ता में आने के बाद सउदी अरब से आने वाले इस हफ्ते पर बीजेपी सांसदों/मंत्रियो ने कब्ज़ा कर लिया है। अत: आज बीजेपी के सांसद इस क़ानून को लाने का विरोध कर रहे है।
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२) नेताओं की राजनीति टिकेट मिलने तक ही सीमित होती है। टिकेट कटा और राजनीति खत्म। टिकेट देने के लिए पार्लियामेंट्री बोर्ड, पीएम, संघ के शीर्ष नेताओं और मुख्यमंत्री आदि को साधकर रखना होता है। इसीलिए ये पूरे पांच वर्ष तक इसी जुगत में लगे रहते है कि आलाकमानों को किसी तरह खुश रखकर उनसे सेटिंग बनाकर रखी जाए। क्योंकि वे इन्हें प्रमोट करके मंत्री आदि में बनवा सकते है। तो ये आलाकमान लोग विभिन्न लोबियों से पैसा खाकर किसी क़ानून पर सहमती देते है और सांसदों/विधायको को अमुक क़ानून का समर्थन करने को कहते है। और ये अमुक क़ानून का समर्थन या विरोध कर देते है।
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३) एक तीसरी वजह मोदी साहेब का इकबाल है। मोदी साहेब मिडिया में सकारात्मक प्रचार पाने और अपने पद पर बने रहने के लिए बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिको एवं मिशनरीज पर बुरी तरह से निर्भर है। टिकेट देने से लेकर मंत्री बनाना या सभी तरह के फैसले लेने में मोदी साहेब एक मात्र निर्णायक है। और मोदी साहेब पूरी तरह से विदेशी धनिकों एवं मिशनरीज पर टिके हुए है। अत: मोदी साहेब सीधे बहुराष्ट्रीय कम्पनियों एवं मिशनरीज से सीधे घूस(*) खाते है और बदले में उन्हें फायदा पहुँचाने वाले कानूनों को पास करते है। और मोदी साहेब के आदेश पर सभी सांसद/विधायक चुपचाप उनके निर्देशों का पालन करते है। यदि सांसद/विधायक मोदी साहेब के किसी निर्देश की अवज्ञा करेंगे तो सोशल मिडिया पर स्थित मोदी सेना अमुक विधायक/सांसदों के परखच्चे उड़ा देगी। चांटे भी खाने पड़ सकते है और अगली बार टिकेट नही मिलेगा वो अलग से।
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(*) मोदी साहेब भ्रष्ट है। पर वे घूस में नकदी नहीं लेते। वे किसी का काम करने के एवज में मिडिया हाउसेस को पेमेंट करने को कहते है। मिडिया हाउस पेमेंट लेकर मोदी साहेब को सकारात्मक प्रसारण देकर उनके वोट बढ़ा देता है )
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जो हालात आज है ठीक यही हालात इंदिरा जी के समय में थे। उनका शासन एवं जनता पर कठोर नियन्त्रण था और वे जो भी फैसले लेती थी सांसद/विधायक आँख मूँद कर उसका पालन करते थे। किन्तु इंदिरा जी के पास वास्तविक जनाधार था तथा वे चुनाव जीतने और पद पर बने रहने के लिए किसी पर निर्भर नहीं थी। लेकिन 1991 से ऍफ़डीआई की आवक से हालात बदलने शुरू हुए और आज भारत आर्थिक, सामरिक दृष्टी से पूरी तरह से बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के नियन्त्रण में है, तथा सबसे बदतर पहलू यह है कि भारत का पूरा मिडिया ( इलेक्ट्रोनिक, प्रिंट व सोशल ) बहुराष्ट्रीय कम्पनियों एवं मिशनरीज के नियन्त्रण में होने के कारण हमारे मुख्य निति नियंता ( मुराद मोदी साहेब से है ) अपनी छवि बनाये रखने के लिए और चुनाव जीतने के लिए पूरी तरह से विदेशी धनिकों की पकड़ में आ चुके है।
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तो अव्वल तो हमारे विधायको/सांसदों को इस बात को जानने समझने में रुचि व अवकाश नहीं है कि जीएसटी में "मिसिंग ट्रेडर प्रोब्लम" होने के कारण भारत की लाखों छोटी-मझौली स्थनीय इकाइयां बंद हो जायेगी, और जिन इक्के दुक्को को यह समझने में रुचि है या उन्हें इस बारे में जानकारी है वे यह जानते है कि मोदी साहेब ने जी एस टी का समर्थन कर दिया है तो हम इसका विरोध कौनसी ताकत की दवाई खाकर करेंगे। और व्यवहारिक बिंदु यह है कि, वे इस बात को समझते है कि छोटी-मझौली इकाइयों के बाजार से बाहर हो जाने से उनको कोई जाती नुक्सान नहीं हो जाने वाला है, लेकिन मोदी साहेब चुनावों में वोट खींचकर उन्हें जीता देंगे, अत: बेहतर है कि कौन से क़ानून देश के लिए अच्छा है और कौनसा बुरा इसे समझने में अपना खून न जलाया जाए।
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और जहाँ तक मोदी साहेब की बात है मिशनरीज एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियां उन्हें वोट दिलाती है , जो कि पी एम् की कुर्सी पर बने रहने के लिए आवश्यक है। और पी एम् बने रहना सबसे जरुरी बात है। अत: वे पी एम बने रहने के लिए जी एस टी जैसे कानूनों का समर्थन करते है।
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और ये हालात सिर्फ बीजेपी के सांसदों/विधायको के नहीं है। कोंग्रेस और आम आदमी पार्टी के विधायको/सांसदों की भी यही दशा है। तो ऐसी परिस्थिति में यदि हम सोनिया-मोदी-केजरीवाल के अंध भगतो से यह उम्मीद करें कि वे देश की समस्याओं के समाधान के लिए आवश्यक कानूनों का समर्थन करेंगे तो यह उनके साथ ज्यादती होगी। क्योकि क़ानून का चौकस समर्थन करने के लिए पहले उसे पढना और समझना होता है। लेकिन उनका सिद्धांत है कि हमारे नेता ने पढ़ लिया मतलब हमने पढ़ लिया , हमारे नेता ने समर्थन कर दिया तो मान को हमको समर्थन करना ही है !!
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समाधान - कार्यकर्ताओ को चाहिए कि वे देश की सम्स्स्याओ के समाधान के लिए आवश्यक कानूनों का अध्ययन करे और उनका समर्थन करे। वे अपने सांसद/विधायक/प्रधानमत्री को ये क़ानून ट्विट द्वारा भेजे और इन्हें गेजेट में प्रकाशित करने की मांग करे। यदि कार्यकर्ता कानूनों को पढने और कानूनों की मांग करने में अपना समय एवं श्रम लगाने लगेंगे तो सांसद/विधायक/प्रधानमंत्री आदि पर क़ानून आधारित विमर्श करने का दबाव बनेगा। यदि देश में अच्छे कानूनों पर विमर्श शुरू हो जाता है तो स्वत: ही देश की समस्याओं का समाधान करने वाले क़ानून देश में लागू हो जायेंगे।

. @वेल्थ टेक्स ग्रुप

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