Pawan Jury BhilwaraRj

चुनाव लड़ने की मौजूदा व्यवस्था में कुछ प्रस्तावित संशोधन :
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(1) प्रत्याशी को नामांकन दाखिल करने के लिए प्रस्तावको की आवश्यकता को रद्द किया जाना चाहिए।
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(2) यदि प्रत्याशी अपना शपथपत्र चुनाव के छह माह पूर्व प्रस्तुत करना चाहे तो वह ऐसा कर सकेगा, तथा चुनाव आयोग या जिला कलेक्टर मौजूद नियमो के अनुसार इस नामांकन को खारिज या स्वीकार करेगा। इस व्यवस्था के आने से किसी उम्मीदवार को चुनावो की घोषणा होने के बाद फिर से शपथपत्र प्रस्तुत नहीं करना होगा।
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(3) सभी राजनैतिक दलो को अपनी संपत्ति का ब्योरा प्रस्तुत करना होगा।
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(4) एक बार नामंकन भरने के बाद उसे वापिस नहीं किया जा सकेगा।
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(5) कोई भी राजनैतिक दल अपने प्रत्याशियों की सूची वरीयता क्रम में चुनाव के छह महीने पहले या नामांकन शुरू होने के पहले किसी भी दिन चुनाव आयोग के सामने प्रस्तुत कर सकेगा, तथा उम्मीदवार यह इंगित कर सकेगा कि वह क्रमशः किस पार्टी से चुनाव लड़ने का इच्छुक है।
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(6) चुनाव लड़ने के लिए जमानत राशि इस प्रकार होगी :
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(6a) न्यूनतम = Rs 50000
(6b) अधिकतम = Rs 10 लाख
(6c) उम्मीदवार द्वारा प्रस्तुत किये गए शपथपत्र में दर्ज संपत्ति का 1% एवं उसके द्वारा घोषित की गयी उसकी औसत आय का 5% या उसके द्वारा प्रस्तुत किये गए पिछले 3 वर्ष के आयकर रिटर्न का योग। लेकिन यह राशि 10 लाख से अधिक नहीं होगी।
(6d) इसके अतिरिक्त राजनैतिक दल की संपत्ति का (1/543 * 2%) जोड़ते हुए। किन्तु अधिकतम सीमा 10 लाख ही होगी।
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(7) प्रत्याशियों को अपने चुनावी खर्चो का ब्योरा चुनाव खत्म होने के बाद एक साथ देना होगा न कि चुनाव के दौरान।
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(8) प्रत्याशी अपनी गतिविधि का प्रतिवेदन मोबाईल एप के जरिये भेज सकेंगे तथा उन्हें रिटर्निंग ऑफिसर के सामने हस्ताक्षर करने के लिए व्यक्तिशः रूप से उपस्थित नहीं होना होगा।
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जो व्यक्ति चुनाव लड़ चुके है, वे इस बात के महत्त्व समझ सकते है कि प्रस्तावको की अनिवार्यता न होना प्रत्याशियों को कितनी राहत पहुंचाता है, किन्तु जिन्होंने कभी चुनाव नहीं लड़ा वे इस बात को कभी नहीं समझ पाएंगे कि चुनाव लड़ने की प्रक्रिया में प्रस्तावको के न होने की आवश्यकता क्यों है। इसी तरह से जिन्होंने कभी चुनाव नहीं लड़ा है वे इस बात को नहीं समझ सकेंगे कि क्यों चुनावी खर्चो का ब्योरा सिर्फ एक ही बार माँगा जाना चाहिए न कि चुनावो के दौरान एक से अधिक बार !! और क्यों सभाओ आदि की सूचना मोबाइल एप द्वारा ही दी जानी चाहिए।
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कुल मिलाकर, जो कार्यकर्ता चुनाव लड़ रहे है, वे ही जमीनी समस्याओ को समझ सकेंगे, तथा जो कभी चुनावी समर में नहीं उतरेंगे वे वास्तविक समस्याओ से अनभिज्ञ बने रहेंगे।
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