Pawan Jury BhilwaraRj
गन्ने का रस निचोड़ लेने के बाद छिलके कूड़े में फेंक दिए जाते है। आदित्यनाथ को स्टार चुनाव प्रचारक बनाकर उनके द्वारा खींचे जा सकने वाले वोटो का दोहन किया जा चुका है। अत: इस बात की संभावनाए काफी सिकुड़ी हुयी है कि योगी आदित्यनाथ को यूपी का सीएम बनाया जायेगा।
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जनाधार वाले ताकतवर नेता बहुराष्ट्रीय कम्पनियों व मिशनरीज की आँखों में खटकते है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिक मोदी साहेब के माध्यम से देश चला रहे है अत: उन्हें शेष नेता अपने मातहत कठपुतली चाहिए। जिनका कोई जनाधार न हो। जिन्हें जो कहा जाए वे चुपचाप करते चले जाए। रीढ़ विहीन नेता। मनोहर लाल खट्टर और फड़नवीस जैसे। बीजेपी को बहुमत मिला और मोदी साहेब ने इन पपीहों को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर टेप दिया। इनके भक्तो व प्रसंशको की संख्या लगभग जीरो है। इन्हें कल मोदी साहेब कुर्सी से हटा दे तो इनके पक्ष में खड़े होने के लिए न तो कार्यकर्ता है और न ही जनता। लेकिन आदित्यनाथ तो पपीहा नहीं है। उन्हें सीएम बनाने के बाद हटाया गया तो वे यूपी में आग लगा सकते है।
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शिवराज, वसुंधरा और रमन सिंह जैसे जनाधार वाले नेता मोदी साहेब के भरोसे चुनकर नहीं आते। इसीलिए इन्हें आसानी से काबू नहीं किया जा सकता। इन्हें काबू करने के लिए मोदी साहेब को व्यापम के फ़ाइले अपनी दराज में रखनी पड़ती है। वर्ना इनसे मोदी साहेब को कभी भी चुनौती मिल सकती है। जनाधार वाले नेता सीधे बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को रिपोर्ट करते है और जरुरत पड़ने पर बहुराष्ट्रीय कम्पनियां इनका इस्तेमाल मोदी साहेब को कंट्रोल करने के लिए भी कर सकती है।
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स्थिति - 1
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बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिको और मोदी साहेब की पहली पंसद स्मृति ईरानी रहेगी। वे एक आधार विहीन कमतर नेता है। उनका राजनीति से जितना राब्ता है पेड मिडिया की वजह से। पेड मिडिया पूरी तरह से बहुराष्ट्रीय कम्पनियों व मिशनरीज के नियंत्रण में है। अत: वे सीएम पद पर रहते हुए मोदी साहेब और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिको के लिए अनुशासित अभिनेत्री की तरह पेश आएगी। उनके पास निर्देशक बनने यानी प्रदेश की कमान हाथ लेने की कूव्वत नहीं है। फडनवीस और खट्टर की तरह। योगी आदित्यनाथ की हालत तब उमा भारती की तरह हो सकती है। स्मृति के पक्ष में कहा यह जाएगा कि 'कई दावेदार होने, सहमती न बनने और पार्टी में गुटबाजी को रोकने के लिए' निरापद उम्मीदवार को सीएम बनाया गया है। ( मनमोहन सिंह की तरह )
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स्थिति - 2
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चूंकि योगी आदित्यनाथ को पहले से सीएम उम्मीदवार घोषित नही किया गया है अत: यूपी का जनादेश उनके लिए नहीं बल्कि बीजेपी ( या मोदी साहेब ) के नाम पर होगा। इस तरह योगी आदित्यनाथ नैतिक आधार पर सीएम होने का दावा नहीं कर सकते। अब यह पार्लियामेंट्री बोर्ड यानी की मोदी साहेब या सीधे शब्दों में कहें तो बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिको व मिशनरीज के हाथो में है कि किसे सीएम बनाया जाता है।
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मोदी साहेब यह कतई नहीं चाहेंगे कि आदित्यनाथ उभर कर आयें। पर चूंकि योगी आदित्यनाथ भी मोदी साहेब की तरह भगवा-हिन्दुवाद-गायवाद-धर्म आदि मुद्दों पर लोकप्रिय विभाजनकारी नौटंकी रचने में सिद्धहस्त है अत: मोदी साहेब की घड़ी दबाकर रखने के लिए तथा हिन्दू धर्म को तोड़ने के लिए* वे बहुराष्ट्रीय कम्पनियों व मिशनरीज के काम आ सकते है। इस वजह से इस बात की संभावनाए बनती है कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिक व मिशनरीज योगी आदित्यनाथ को सीएम पद पर स्थापित कर दे।
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लेकिन समस्या यह है कि यदि योगी आदित्यनाथ सीएम बनते है तो उन्हें सीएम बनने के लिए बहुराष्ट्रीय कम्पनियों व मिशनरीज की सभी शर्तो को मानना होगा। इन शर्तो में से कुछ निम्न है ---
१) जैसा की वे आज कर रहे है वैसे ही वे आगे भी मोदी साहेब की तरह वे भारत में जनसख्या के बिगड़ते धार्मिक अंसतुलन को रोकने के लिए आवश्यक 'टू चाइल्ड पालिसी' क़ानून का विरोध करेंगे।
२) जैसा की वे आज कर रहे है वैसे ही वे आगे भी मोदी साहेब की तरह वे 2 करोड़ मुल्सिम बांग्लादेशी घुसपेठियो को देश से बाहर खदेड़ने के लिए आवश्यक कानूनों का विरोध करेंगे।
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३) जैसा की वे आज कर रहे है वैसे ही वे आगे भी मोदी साहेब की तरह वे अयोध्या में राम, मथुरा में कृष्ण व काशी में विश्वनाथ देवालय मंदिर निर्माण के लिए आवश्यक कानूनों का विरोध करेंगे।
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४) जैसा की वे आज कर रहे है वैसे ही वे आगे भी मोदी साहेब की तरह वे मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने का विरोध करेंगे और उन कानूनों का भी विरोध करेंगे जिससे हिन्दू धर्म के प्रशासन को सिक्ख धर्म को मजबूत बनानाय जा सके।
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५) जैसा की वे आज कर रहे है वैसे ही वे आगे भी मोदी साहेब की तरह वे गौ हत्या रोकने के लिए आवश्यक कानूनों का विरोध करेंगे।
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६) इसके अलावा वे उत्तर प्रदेश में मिशनरीज का रास्ता नहीं रोकेंगे तथा ऐसे किन्ही भी कानूनों को लागू नहीं करेंगे जिससे अदालतों, पुलिस आदि के प्रशासन में सुधार आये।
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७) तथा सबसे महत्त्वपूर्ण यह कि वे मोदी साहेब की तरह ही उत्तर प्रदेश का कतरा कतरा विदेशी कम्पनियों के हवाले करेंगे।
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यदि भाजपा को बहुमत मिल जाता है या वह बसपा से गठबंधन करके सरकार बनाने की स्थिति में आ जाती है और आदित्यनाथ इन तथा इसी तरह की अन्य शर्तो पर यदि सहमत हो जाते है, तो संभावनाएं है कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियां व मिशनरीज योगी आदित्यनाथ को सीएम बनाने की सहमती दे दे।
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(*) बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिक तथा मिशनरीज हिन्दू धर्म को तोड़ने के लिए उन नेताओ का ही इस्तेमाल करती है जिनकी छवि हिंदूवादी हो। इससे उनके कृत्यों के खिलाफ बोलने वालो की संख्या घट जाती है। यदि ऐसी हरकते कोई ऐसा नेता करेगा जिसकी "छवि" कट्टर हिंदूवादी की नहीं है तो बवाल हो सकता है।
उदाहरण के लिए :
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1) वर्ष 2013 में जयराम रमेश ने कहा था कि --"देवालय से पहले शौचालय बनने चाहिए", तो आरएसएस और हिन्दू वादी कार्यकर्ताओ ने बवाल कर दिया था। लेकिन जब यदि बात 2014 में मोदी साहेब ने कही तो सब खामोश रहे। क्योंकि मोदी साहेब तो "हिंदूवादी" है।
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2) वर्ष 2012 में चिदंबरम तिरुपति से सोना उठाना चाहते थे। किन्तु संघ और हिंदूवादी कार्यकर्ताओ ने बवाल कर दिया। फिर 2015 में मोदी साहेब ने मोदी साहेब ने तिरुपति से 2 टन सोना उठवा लिया तो किसी ने विरोध नहीं किया। क्योंकि मोदी साहेब हिंदूवादी है।
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3) कोंग्रेस ने जब कहा कि राम मंदिर का मामला अदालत में है तो किसी ने नहीं माना, क्योंकि वे उनकी छवि हिंदूवादी की नहीं है । लेकिन जब यही बात बीजेपी ने सत्ता में आकर कही तो सबके समझ आ गयी। टू चाइल्ड पॉलिसी, बांग्लादेशी घुसपेठ, मिशनरीज का बढ़ता प्रभाव, गौ हत्या आदि दर्जनों मामले है। नीति वही रहती है किन्तु बयान और उनकी स्वीकार्यता की परास बदल जाती है।
गौर करने पर इस तरह के सैकड़ो उदाहरण आप देख सकते है। और तब आप पायेंगे कि, यदि धर्म को तोडना है तो उसी धर्म के प्रचारको और नेताओं का इस्तेमाल किया जाता है।
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बहरहाल सरकार सपा+कोंग्रेस के बने या बीजेपी की। सीएम आदित्यनाथ बने या स्मृति या मौर्य। या फिर कोई अन्य। शासन में बदलाव आने की संभावनाएं लगभग शून्य इसीलिए है कि हमारे नेता और देश बहुराष्ट्रीय कंपनियों की गहरी पकड़ में है। जब तक हम इस पकड से आजाद होने के लिए आवश्यक कानूनों जैसे ज्यूरी सिस्टम, राइट तू रिकॉल, वेल्थ टेक्स आदि को लागू करवाने के लिए मांग खड़ी नहीं कर पाते कोई उल्लेखनीय बदलाव नहीं आएगा।
सबक यह है कि, हमें यह नहीं देखना चाहिए कि अमुक नेता क्या बयान दे रहा है या किसी रंग के वस्त्र पहन रहा है, तिलक लगा रहा है या नहीं, आदि आदि। क्योंकि इस प्रकार के सभी टोटके नेताओं द्वारा अपनी छवि बनाने के लिए किये जाते है। हमें इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि अमुक नेता मौजूदा व्यवस्था में सुधार के लिए किन कानूनों को लागू कर रहा है और किन कानूनों का प्रस्ताव कर रहा है। और सिर्फ तब ही आप यह जान पायेंगे कि किस नेता/पार्टी से आपको सकारात्मक परिवर्तन की उम्मीद रखनी चाहिए।
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