Pawan Jury BhilwaraRj

उत्तर प्रदेश की किसी संसदीय सीट के चुनाव परिणामो पर विचार कीजिये। मान लीजिये कि इस सीट पर कुल मतदाताओ की संख्या 20 लाख है तथा मतदान प्रतिशत 70 रहता है। उम्मीदवारों में निम्नांकित तरीके से मत विभाजन होता है --
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१. सपा+कोंगेस - 5 लाख
२. बीजेपी - 4 लाख 50 हजार
३. बसपा - 3 लाख
४. इनेलो - १ लाख ( इन्डियन नेशनल लोकदल )
५ . अन्य - 50 हजार

कुल 14 लाख वोट गिरते है और सपा+कोंग्रेस का उम्मीदवार विजयी रहता है।
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अब यदि केंद्र में सत्ताधारी पार्टी सपा के सांसद को पद से हटाना चाहती है तो उसे किस तरह की प्रक्रिया चाहिए ?
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फिरोज वरुण गांधी द्वारा प्रस्तावित राईट टू रिकॉल सांसद का क़ानून ऐसी ही प्रक्रिया उपलब्ध करवाता है।
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वरुण द्वारा सुझाये गए क़ानून की धारा 78C. (1) कहती है कि -- "यदि किसी क्षेत्र का मतदाता सांसद को रिकॉल करना चाहता है तो उसे एक रिकॉल याचिका दायर करनी होगी। यह आवश्यक है कि इस याचिका में उस संसदीय क्षेत्र के कुल मतदाताओ के कम से कम 25% मतदाताओ के हस्ताक्षर होने चाहिए।"
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बीजेपी+बसपा+इनेलो के कार्यकर्ता अपने कार्यकर्ताओ और नेटवर्क का इस्तेमाल करके 10 से 20 हजार नागरिको के वास्तविक हस्ताक्षर इकट्ठे करेंगे और बाकी के 4 लाख 80 हजार हस्ताक्षर खुद ही करके यह याचिका लोकसभा अध्यक्ष को भेज देंगे। चूंकि स्पीकर सत्ता धारी पार्टी का आदमी होता है अत: वह इस याचिका को स्वीकार करके चुनाव आयोग को भेज देगा। चुनाव आयुक्त की नियुक्ति भी केंद्र सरकार करती है अत: चुनाव आयुक्त इस याचिका के आधार पर रिकॉल पोल करवा देगा।
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वरुण द्वारा सुझाये गए क़ानून की धारा कहती है कि -- "यदि रिकॉल-पोल में पदासीन सांसद को उतने वोटो के कम से कम 75% वोट मिल जाते है जितने वोट अमुक सांसद को पिछले चुनाव में मिले थे, तो रिकॉल पोल को सफल माना जाएगा"
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वरुण द्वारा प्रस्तावित क़ानून के अनुसार रिकाल पोल में सिर्फ वे ही वोट करेंगे जो मौजूदा सांसद को रिकॉल करना चाहते है, तथा evm पर सिर्फ मौजूदा सांसद का नाम दर्ज होगा। मतलब जो उम्मीदवार वर्तमान सांसद को बनाए रखना चाहते है उन्हें रिकाल पोल में वोट करने का अवसर नहीं दिया गया है। तथा अन्य उम्मीदवार को भी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने का मौका नहीं मिलेगा।
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अब चूंकि वर्तमान सांसद को पिछले चुनाव में 5 लाख वोट मिले थे, अत: यह स्पष्ट है कि शेष 9 लाख मतदाताओ ने वर्तमान सांसद को वोट नहीं किया था। लेकिन सपा+कोंग्रेस के सांसद को रिकाल करने के लिए सिर्फ 4 लाख वोट ही चाहिए। अब मान लीजिये कि अमुक क्षेत्र के 8 लाख मतदाता वर्तमान सांसद को पद पर बनाए रखना चाहते है। किन्तु इन्हें वोट करने का अवसर नहीं मिलेगा। क्योंकि वरुण के क़ानून में रिकाल पोल में वोट वही मतदाता कर सकता है जो सांसद को हटाना चाहता है। अत: बीजेपी और बसपा के वोटर मिलकर यदि 4 लाख की वोटिंग कर देते है तो सांसद रिकाल हो जाएगा।
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इस तरह से वरुण गांधी द्वारा प्रस्तावित क़ानून का उपयोग करके सत्ताधारी पार्टी किसी भी सांसद को रिकाल कर सकती है। तब भी जब सांसद ईमानदारी से कार्य कर रहा हो और जनता उसे पद पर बनाए रखना चाहती है।
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समाधान - कार्यकताओ को चाहिये कि वे सिर्फ "राईट टू रिकॉल" लेबल का प्रचार करने की जगह प्रस्तावित ड्राफ्ट व प्रक्रिया पढ़ें। यदि अधिक से अधिक कार्यकर्ता ड्राफ्ट पढने लगेंगे तो वरुण गांधी जैसे कपटी नेता नागरिको की आँखों में धूल झोंकने के ऐसे प्रयास नहीं करेंगे।
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राईट टू रिकॉल कुछ नहीं है। यदि क़ानून की प्रक्रिया कमजोर होगी तो फायदा होने की जगह उलटे नुकसान होगा, व राईट टू रिकाल का सिद्धांत बदनाम हो जायेंगे। और यही नेता और धनिक वर्ग चाहते है।
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वरुण गांधी द्वारा प्रस्तावित राईट टू रिकॉल सांसद का एक नकारात्मक क़ानून ड्राफ्ट -
https://www.facebook.com/groups/LawDrafts/1693095370990175/
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राईट टू रिकॉल द्वारा प्रस्तावित राईट टू रिकॉल सांसद का एक सकारात्मक क़ानून ड्राफ्ट -
https://www.facebook.com/pawan.jury/posts/1205223182929249
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