Pawan Jury BhilwaraRj

कैसे मोदी साहेब के निर्देश पर वरुण 'घांडी' जैसे महाधूर्त राईट टू रिकॉल मूवमेंट को तोड़ने का प्रयास कर रहे है ?
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"राजनैतिक पार्टियाँ जो समाधान सुझाती है, वे समस्याओं से भी बदतर होते है" -- ट्रोटोवस्की
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जैसे जैसे राईट टू रिकॉल मूवमेंट आगे बढ़ रहा है स्थापित पार्टियों के नेताओ और धनिक वर्ग में बेचेनी बढ़ रही है। वे इसे तोड़ने के लिए नए नए पैंतरे निकाल रहे है। इसी क्रम में मोदी साहेब ने वरुण घांडी को आदेश दिया है कि वे राईट टू रिकॉल के समर्थको को बीजेपी से चिपकाने के लिए एक दो कौड़ी के राईट टू रिकॉल ड्राफ्ट का समर्थन करें।
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भारत में विभिन्न पदों पर बैठे नेताओं और अधिकारियों में व्याप्त भ्रष्टाचार का कारण यह है कि, भारत के नागरिको के पास अपने प्रतिनिधियों को चुनने का तो अधिकार है किन्तु उन्हें नौकरी से निकालने का अधिकार नहीं है। इसीलिए एक बार चुन लिए जाने के बाद नेता अपने मतदाताओं की और पलट कर भी नहीं देखता। इस समस्या का समाधान यह है कि भारत के मतदाताओं को यह अधिकार दिया जाए कि यदि कोई प्रतिनिधि चुन लिए जाने के बाद भ्रष्ट आचरण करता है तो नागरिक मताधिकार का प्रयोग करके उन्हें नौकरी से निकाल सके।
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लेकिन रिकॉल करने की इस व्यवस्था में प्रक्रिया सबसे महत्त्वपूर्ण है। यदि प्रक्रिया कमजोर हुई तो राईट टू रिकॉल कानूनों के आने के बावजूद प्रशासन में कोई बदलाव नहीं आएगा, किन्तु यदि प्रकिया बेहतर हुई तो शासन में व्याप्त भ्रष्टाचार कुछ ही महीनो में गायब हो जाएगा।
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राईट टू रिकॉल ग्रुप अकेला ऐसा संगठन है जिसने राईट टू रिकॉल कानूनों के लिए प्रक्रियाएं प्रस्तावित की है, और हम इन प्रक्रियाओ का नागरिको में प्रचार कर रहे है। अब वरुण घांडी भी राईट टू रिकॉल प्रक्रियाओ के समर्थक बनकर सामने आये है। लेकिन उनकी मंशा इन कानूनों की मांग को तोड़ने की है। अत: उन्होंने ऐसी प्रक्रिया दी है जिसके लागू होने से व्यवस्था में कोई परिवर्तन नहीं आएगा।
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नीचे हमारे द्वारा प्रस्तावित प्रक्रिया और वरुण घांडी द्वारा प्रस्तावित प्रक्रिया के बीच तुलनात्मक विवरण रखा गया है। इस तुलना को पढकर एक मतदाता के रूप में आप स्वंय जान सकते है कि वरुण घांडी कितने कमीने, कितने नीच और कितने बड़े धूर्त व्यक्ति है।
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१.
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वरुण घांडी का प्रस्ताव है कि ---- "किसी प्रतिनिधि को चुने जाने के 2 वर्ष के बाद ही रिकाल किया जा सकता है, उससे पहले नहीं" !!!
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मतलब वरुण चाहते है कि जिस तरह आज विधायको को आज की व्यवस्था में अगले 5 वर्ष तक शासन करने का बापी पट्टा दे दिया जाता है, उसमें 3 वर्ष की कटौती की जाए। दो साल तक चाहे कोई विधायक/सांसद कितना भी उत्पात करे उसे रिकाल नहीं किया जाना चाहिए।
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जबकि हमने जो प्रक्रिया दी है उसमे प्रतिनिधि को किसी भी दिन रिकॉल किया जा सकता है। चुनाव जीतने के 6 महीने बाद भी, 1 महीने बाद भी, यहाँ तक कि अगले दिन भी। जब भी मतदाता चाहे वे रिकाल कर सकते है। यदि विधायक/सांसद चुन लिए जाने के अगले दिन ही जन-विरोधी फैसले लेने लगता है तो उसे तुरंत रिकाल किया जाना चाहिए। 2 साल इन्तजार करने की कोई तुक नहीं।
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व्यवहारिक पहलू यह है कि यदि विधायक को किसी भी दिन रिकाल किया जा सकेगा तो ही वह ईमानदारी से कार्य करेगा, तथा उसे रिकाल करने की नौबत ही नहीं आएगी। यदि उसे 2 साल की छूट दे दी गयी तो वह अगले दो वर्ष तक भ्रष्ट आचरण करेगा।
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२.
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वरुण घांडी का प्रस्ताव है कि --- "जन प्रतिनिधियों को वापस बुलाने की प्रक्रिया उस क्षेत्र के कुल मतदाताओं की संख्या के एक चौथाई मतदाताओं के हस्तक्षार के साथ लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष याचिका दायर करके शुरू की जा सकती है। हस्ताक्षर की प्रमाणिकता की जांच करके लोकसभा अध्यक्ष उक्त याचिका को पुष्टि के लिए चुनाव आयोग के समक्ष भेजेंगे।

आयोग हस्ताक्षरों की पुष्टि करेगा और सांसद या विधायक के क्षेत्र में 10 स्थानों पर मतदान कराएगा। अगर तीन चौथाई मत जन प्रतिनिधि को वापस बुलाने के लिए पड़े तब उक्त सदस्य को वापस बुलाया जाएगा !!!"
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किसी संसदीय क्षेत्र में 15-16 लाख तक मतदाता होते है। इनका एक चौथाई 4 लाख होता है। मतलब वरुण के अनुसार रिकॉल की प्रक्रिया शुरू करने के लिए पहले 4 लाख मतदाताओ के हस्ताक्षर इकट्ठा करने होंगे। और फिर 4 लाख हस्ताक्षरों का यह पोथा लोकसभा अध्यक्ष को भेजना होगा, तथा लोकसभा अध्यक्ष इन हस्ताक्षरों की "प्रमाणिकता" की जाँच करेंगे। वरुण यह बात जानते है कि भारत सरकार के पास नागरिको के हस्ताक्षर के कोई नमूने नहीं है। अत: ऐसे हस्ताक्षरों की प्रमाणिकता की जांच कभी नहीं की जा सकती। और इस तरह लोकसभा अध्यक्ष इस याचिका को खारिज कर देगा या उसे अगले 3 वर्ष तक लंबित बनाए रखेगा।

और यदि लोकसभा अध्यक्ष इस याचिका को प्रमाणिक घोषित कर भी देता है तो चुनाव आयोग रिकाल के लिए जो चुनाव करवाएगा उसमे यह जरुरी होगा कि कम से कम 75% मतदाता अमुक सांसद के खिलाफ मतदान करे !! भारत में वोटिंग प्रतिशत ही लगभग 60-70 रहता है। ऐसी स्थिति में किसी उम्मीदवार के खिलाफ 75% मतदान की शर्त लगाना एक खुराफात है।
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जबकि हमने जो प्रक्रिया दी है उसमें कोई मतदाता किसी भी दिन पटवारी की कचहरी में जाकर या अपने रजिस्टर्ड मोबाइल नम्बर से sms करके अपना अनुमोदन रद्द करके अन्य किसी उम्मीदवार को दे सकता है। और यदि क्षेत्र के कुल मतदाताओ के 51% अनुमोदन किसी अन्य उम्मीदवार को प्राप्त हो जाते है तो मौजूदा सांसद नौकरी से निकाल दिया जाएगा और 51% अनुमोदन प्राप्त उम्मीदवार सांसद बनेगा।
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इस तरह आप देख सकते है कि हमारे द्वारा प्रस्तावित प्रक्रिया ज्यादा लोकतांत्रिक ज्यादा प्रभावी और ज्यादा सरल है। जबकि वरुण घांडी ने जो प्रक्रिया दी है वह जटिल है तथा इस प्रक्रिया द्वारा व्यवहारिक रूप से रिकाल किया जाना कभी संभव नहीं होगा। मतलब, शरीर में कैल्शियम की कमी दूर करने के लिए वरुण घांडी दूध की जगह चूने का पानी पिलाने का प्रयास कर रहे है। और वे यह उम्मीद भी कर रहे है कि जनता चूने के इस घोल को दूध के धोखे में पी जाए।
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इसी तरह की नौटंकी वरुण से पहले अन्ना और केजरीवाल गेंग भी रच चुकी है। उन्होंने भी राइट टू रिकॉल की मूवमेंट को तोड़ने के लिए इसका मौखिक समर्थन किया किन्तु इसका ड्राफ्ट कभी नहीं दिया। और मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने राईट टू रिकॉल कानूनों को कभी पास नहीं किया, बल्कि हमेशा इनका विरोध किया। और अब अन्ना-केजरीवाल टीम से भी ज्यादा कमीने वरुण जैसे लोग राईट टू रिकॉल क़ानून के नाम पर जनता की आँखों में धुल झोंकने की कोशिश कर रहे है।
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इसके पीछे इनकी निति यह है कि, एक कमजोर राईट टू रिकॉल क़ानून के ड्राफ्ट को लागू किया जाए, ताकि यह साबित किया जा सके कि राईट टू रिकॉल एक अप्रभावी व्यवस्था है और इन कानूनों के आने से कोई बदलाव नहीं आता है।
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और सबसे महत्त्वपूर्ण यह कि इस तरह का पाखंड रचने के लिए वरुण घांडी को निर्देश मोदी साहेब ने दिए है। क्योंकि मोदी साहेब की अनुमति बिना राईट यह आडम्बर रचे, वरुण घांडी की ऐसी हैसियत नहीं है।
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समाधान - जैसे जैसे राईट टू रिकॉल, जूरी सिस्टम आदि कानूनों की मांग खडी होगी, इसे तोड़ने के लिए ऊँचे कद के नेता और धनिक वर्ग इस तरह की साजिश करेंगे। इसीलिए कार्यकताओं को चाहिए कि वे "राईट टू रिकॉल" लेबल की जगह इसकी प्रक्रिया पर ध्यान दे। यदि प्रस्तावित प्रक्रिया यानि ड्राफ्ट बेहतर होगा तो ही क़ानून अच्छे परिणाम देगा, अन्यथा एक बेकार प्रकिया लागू होने से शासन में कोई परिवर्तन नहीं आएगा।
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हमारे द्वारा प्रस्तावित एक बेहतर राईट टू रिकॉल सांसद का ड्राफ्ट इस लिंक पर देखा जा सकता है --- https://www.facebook.com/pawan.jury/posts/860633484054889
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कपटी वरुण घांडी द्वारा प्रस्तावित फर्जी राईट टू रिकॉल की प्रक्रिया --- https://goo.gl/FP0YUW
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वरुण गांधी को ट्वीट करके कहे कि उनके द्वारा प्रस्तावित प्रक्रिया फर्जी है। अतः यदि देश में मजबूत राइट टू रिकॉल प्रक्रिया चाहते है तो इस लिंक में दर्ज क़ानून को संसद में प्रस्तुत करें।

ट्वीट का नमूना -
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@pmoindia @varungandhi80, please put this draft in parliament given in - https://www.facebook.com/pawan.jury/posts/860633484054889
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