Pawan Jury BhilwaraRj
"इंस्टेंट रन ऑफ़ वोटिंग सिस्टम" आने से छोटे और निर्दलीय उम्मदीवारों की संख्या में इज़ाफ़ा होगा, और उन्हें ज्यादा वोट मिलने लगेंगे।
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मौजूदा वोटिंग सिस्टम में मतदाता निर्दलीय या छोटी पार्टियों के ज्यादातर उम्मीदवारों को "वोट काटने वाले" के रूप में देखते है, अतः अपना "वोट खराब होने" के भय से वे उन्हें वोट नहीं करते। इससे मुख्य मुकाबला बड़ी पार्टियों के ताकतवर उम्मीदवारों के बीच ही बना रहता है, और स्वतंत्र व छोटे उम्मीदवार चुनावी मैदान में उतरने से हतोत्साहित हो जाते है। यही वजह है कि सोनिया-मोदी और केजरीवाल की तिकड़ी इंस्टेंट रन ऑफ़ वोटिंग सिस्टम का विरोध कर रही है।
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भारत में लागू वर्तमान मतदान प्रणाली में कोई भी मतदाता किसी एक उम्मीदवार को ही वोट दे पाता है। लेकिन वरीय मतदान प्रणाली ( prefential voting system = instant runoff voting = IRV ) में मतदाता को अपनी पसंद के अनुसार एक से अधिक उम्मीदवारों को वरीयता क्रम में वोट करने की आजादी होती है।
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उदाहरण के लिए यदि चार उम्मीदवार 'अ', 'ब', 'स' और 'द' मैदान में है, तो आप हर उम्मीदवार के सामने अपनी पसंद दर्शाने वाला अंक दर्ज कर सकते है। यदि आप 'अ' को चुनना चाहते है तो आप 'अ' उम्मीदवार के सामने 1 अंक दर्ज कर सकते है। किन्तु यदि आपको लगता है कि यदि 'अ' चुनाव हार जाता है तो 'ब' को विधायक बनना चाहिए, तो आप ब के सामने 2 अंक दर्ज कर सकते है। इसी तरह आप क्रमश: स और द को 3 और 4 अंक दे सकते है। यदि आपके वोट के बावजूद 'अ' चुनाव हार जाता है, और किसी भी उम्मीदवार को बहुमत नहीं मिलता तो क्योंकि आपने 'ब' को अपनी दूसरी पसंद बताया था अत: आपका वोट ब को चला जाएगा।
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स्पष्टीकरण
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मान लीजिये किसी विधानसभा क्षेत्र में 6 उम्मीदवार मैदान में है, जिसमे से 3 बड़ी पार्टियों के और 1 छोटी पार्टी का है, तथा 1 निर्दलीय है।
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१) भाजपा - चुरई
२) सपा+कोंग्रेस - लोठिया
३) बसपा - कल्लू
४) लाजपा - श्याम
6) निर्दलीय - बलविंदर
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A) मौजूदा चुनाव प्रणाली
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मान लीजिये की इस विधानसभा क्षेत्र में 20% ( या 50 हजार ) मतदाता मानते है कि चुरई, कल्लू और लोठिया पूरी तरह से भ्रष्ट और निकम्मे व्यक्ति है, जबकि श्याम और बलविंदर अपेक्षाकृत काबिल उम्मीदवार है। अब एक मतदाता विश्वनाथ पर विचार कीजिये। विश्वनाथ सपा बसपा का विरोधी है या वह नहीं चाहता की कल्लू या लोठिया चुनाव जीत जाए। वह इन दोनों की तुलना में चुरई को बेहतर मानता है, लेकिन वह यह भी जानता है कि चुरई भी एक बदमाश और दोगला आदमी है। लेकिन वह कल्लू और लोठिया जैसे गुंडों से बचने के लिए चुरई को वोट देने के लिए बाध्य है।
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तो विश्वनाथ यह सोचेगा कि यदि मैंने श्याम या बलविंदर को वोट दिया तो चुरई का एक वोट कट जाएगा और लोठिया या कल्लू में से किसी एक उम्मीदवार के जीतने की सम्भावनाएं बढ़ जायेगी। इस वजह से विश्वनाथ लोठिया व कल्लू से भयभीत होकर बलविंदर को वोट देने की जगह चुरई को वोट कर देगा। इस तरह से मौजूदा चुनाव प्रणाली विश्वनाथ को बाध्य करती है कि वह अपना वोट बलविंदर जैसे काबिल आदमी को देने की जगह चुरई को दे दे।
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ठीक यही बात वे सभी 50 हजार मतदाता सोचेंगे जो चुरई, लोठिया या कल्लू से भयभीत है। जो लोग चुरई से भयभीत है, वे चुरई को हराने के लिए श्याम को वोट करने की जगह लोठिया या कल्लू को वोट कर देंगे और जो लोठिया या कल्लू से भयभीत है वे इन्हें हराने के लिए चुरई को वोट कर देंगे। इस तरह काबिल लेकिन छोटे उम्मीदवारों को वोट नहीं मिलेंगे और उनके चुनावो को भाग लेने की संख्या घटती चली जायेगी।
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B) इंस्टेंट रन ऑफ़ वोटिंग सिस्टम
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इस प्रणाली में मतदाता एक से अधिक उम्मीदवारों को अपनी पसंद के अनुसार वोट कर सकता है। तो यह व्यवस्था होने से विश्वनाथ जब मतदान करने जाएगा तो छोटे उम्मीदवार बलविंदर के सामने 1, तथा श्याम के आगे 2 अंक दर्ज कर देगा। लेकिन वो यह सोचेगा कि यदि ये दोनों चुनाव हार जाते है तो चुरई को जीतना चाहिए। अतः विश्वनाथ चुरई के आगे अंक 3 अंकित कर देगा। इस तरह से वह लोठिया और कल्लू के भय से मुक्त होकर बलविंदर और श्याम को वोट कर सकेगा, और लोठिया, कल्लू और चुरई से त्रस्त सभी 50 हजार मतदाता भी इसी तरीके से वोट करेंगे।
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लेकिन इस व्यवस्था के आने से छोटे और काबिल उम्मीदवार चुनावी मैदान में उतरने के लिए प्रोत्साहित होंगे, और बड़ी पार्टियों को के लिए प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ती जायेगी, और बड़ी पार्टियों का एकाधिकार खत्म हो जाएगा। सिर्फ यही वजह है कि सोनिया-मोदी-केजरीवाल इंस्टेट रन ऑफ़ वोटिंग सिस्टम का विरोध कर रहे है। वे चाहते है कि कम से कम कार्यकर्ता चुनावी मैदान में उतरकर उन्हें चुनौती दे। हाँ, जब तक कार्यकर्ता उनके वोट काटे बिना कितना भी विरोध करते रहे, उन्हें कोई ऐतराज नहीं। बल्कि इस तरह के पंगु विरोध को वे प्रोत्साहित करते है, ताकि लोकतंत्र का धोखा बना रहे। लेकिन यदि कार्यकर्ता चुनावी मैदान में उतरेंगे तो वे मतदाताओ को यह कह कर बरगलायेंगे कि ये उम्मीदवार हमारे वोट काटने के लिए खड़ा हुआ है। लेकिन साथ ही वे इंस्टेंट रन ऑफ़ वोटिंग सिस्टम का भी विरोध करेंगे ताकि छोटे कार्यकर्ता चुनावों में भाग न ले।
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व्यवस्था परिवर्तन में गंभीरता से रुचि रखने वाले सभी कार्यकताओं से हमारा आग्रह है कि यदि उनकी परिस्थिति अनुमति देती है तो उन्हें चुनावी मैदान में अवश्य उतरना चाहिए, ताकि उनके प्रस्तावों को मतदाता गंभीरता से ले। ज्यादातर कार्यकर्ता चुनाव लड़ने का साहस इसीलिए नहीं जुटा पाते क्योंकि उन्हें लगता है कि -- "मुझे कोई वोट नहीं देगा, अत: मैं चुनाव हार जाऊँगा"!! उन्हें यह समझना चाहिए कि मौजूदा राजनैतिक पार्टियों के शीर्ष पर बैठे नेताओं ने जानबूझकर ऐसी व्यवस्था थोपी हुई है जिससे छोटे उम्मीदवारों को वोट न मिले। इसीलिए उन्हें चुनाव जीतने के उद्देश्य से नहीं बल्कि अच्छे कानूनों का प्रचार करने के उद्देश्य से लड़ना चाहिए। साथ ही मतदाताओं को इस बारे में भी सूचित करना चाहिए कि वर्तमान मतदान प्रणाली छोटे उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने से हतोत्साहित करती है।
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जैसे जैसे ज्यादा से ज्यादा कार्यकर्ता चुनावी मैदान में उतरने लगेंगे वैसे वैसे चुनाव लड़ने के लिए अन्य कार्यकर्ताओं का हौसला भी बढ़ता जाएगा और मतदाताओं के लिए योग्य उम्मीदवारों के विकल्प उपलब्ध होंगे।
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इस प्रणाली के बारे में अधिक विवरण जानने के लिए निचे दिए गए लेख भी पढ़े :
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जातिवाद को कम करने के लिए इंस्टेंट रन ऑफ वोटिंग सिस्टम (आईआरवी) टू राउंड वोटिंग सिस्टम (टीआरवी) से बेहतर परिणाम देगा ---
https://www.facebook.com/pawan.jury/posts/847905751994329
वरीय मतदान प्रणाली या इंस्टेंट रनऑफ वोटिंग सिस्टम किस तरह जातीय आधार पर मतदान में कमी लाता है ? ---
https://www.facebook.com/pawan.jury/posts/838946086223629
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