Pawan Jury BhilwaraRj

मोदी साहेब भी उतने ही भ्रष्ट व्यक्ति है जितने की अन्य नेता है।
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जनप्रतिनिधि क़ानून 1951 की धारा 29c कहती है कि --- "किसी राजनैतिक दल को यदि चंदे में रूप में किसी व्यक्ति से 20,000 रूपये तक की राशि नकद के रूप में प्राप्त होती है तो राजनैतिक पार्टी को इस राशि का स्त्रोत बताने की आवश्यकता नहीं है"।
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मतलब, यदि कोई राजनीतिक पार्टी यह दावा करती है कि उन्हें चंदे के रूप में 5000 नागरिको के माध्यम से 10 करोड़ की नकदी प्राप्त हुयी है, तो उन्हें यह बताने की भी जरूरत नहीं है कि ये 5000 लोग कौन है, तथा इनके नाम पते क्या है !!!
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इस धारा ने यह सुनिश्चित किया कि 8 नवम्बर को लागू किये गए विमुद्रीकरण के बाद भी राजनैतिक पार्टियां जितना मर्जी हो उतने पुराने नोट अपने खाते में जमा करा सके। इस तरह सभी पार्टियों ने काले धन को सफ़ेद करने का काम किया। और यह पूरी तरह से कानूनी था। और जब आयकर विभाग मायावती से 100 करोड़ का हिसाब पूछेगा तो मायावती बताएगी कि उन्हें यह चन्दा 50 हजार लोगो ने नकदी के रूप में दिया है, और प्रत्येक नागरिक ने 20 हजार रूपये दिए !!! और मायावती को उन 50 हजार लोगो के नाम भी बताने की आवश्यकता नहीं है।
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तो जब भारत के प्रत्येक व्यक्ति को सिर्फ 4 हजार रूपये बदलवाने की छूट दी गयी थी, ( वो भी अपना पहचान पत्र दिखाने के बाद ) तो फिर राजनीतिक पार्टियों को यह विशेषाधिकार क्यों दिया गया ? क्या मोदी साहेब को इस क़ानून के बारे में जानकारी नहीं थी ?
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मोदी साहेब पिछले 30 साल से राजनीतिक जीवन में है और पिछले 15 वर्षो से पार्टी चला रहे है। लेकिन उन्होंने जनप्रतिनिधि क़ानून 1951 की धारा 29c में किसी भी प्रकार का संशोधन करने से इनकार कर दिया।
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यदि वे इसमें संशोधन कर देते तो विमुद्रीकरण की गाज उनकी बिरादरी के लोगो पर भी पड़ती और उन्हें नुकसान होता। और वे ऐसा कतई नहीं चाहते थे।
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https://indiankanoon.org/doc/163284660/
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