Pawan Jury BhilwaraRj
विमुद्रीकरण ; सार --- यदि कोई व्यक्ति यह नहीं देख सकता कि भारत में बहुराष्ट्रीय कंपनियों और विदेशी अभिजनो का नियंत्रण लगातार बढ़ रहा है तो उसे नोटबंदी में सिर्फ फायदा ही फायदा नजर आएगा और जो भारत में विदेशियो के बढ़ते वर्चस्व को एक समस्या के रूप में देखता है तो उसे यह साफ़ नजर आएगा कि यह फैसला देश को सब तरफ से तबाही ही देगा। सभी प्रकार से तबाही। भारी तबाही।
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और इसी वजह से अरविन्द गांधी ने इस विषय पर बोलने से मना कर दिया कि नोटबंदी से विदेशी वर्ग को कितना फायदा होगा। इसकी जगह वे "2000 के नोटों के आने से भ्रष्टाचार बढ़ेगा" जैसे चिल्लर मुद्दों को उठा रहे है। और वे ऐसा क्यों न करे। आखिर वे भी सोनिया और मोदी साहेब की तरह एफडीआई के पक्के समर्थक है।
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तात्कालिक नुक्सान ---- उन लोगो को छोड़ते हुए जो ५००/१००० रूपये प्रतिदिन की दर से कतार में लगे है व जिन्होंने दूसरे लोगो के २ लाख रूपये अपने खाते में जमा करवाकर १ लाख ८० हजार पुनः लौटाने का तय कर लिया है --- शेष सभी घाटे में रहेंगे। सरकार को वैट और टोल में घाटा होगा, उत्पादन इकाइयो को घाटा होगा, श्रमिको को घाटा होगा, और भी अन्य वर्गो को इसी तरह से नुक्सान उठाना होगा।
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दीर्घकालिक फायदे ---
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(1) सरकार को लगभग ३ से ६ लाख करोड़ की नकदी का अतिरिक्त लाभ होगा तथा आयकर से आय होगी।
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(2) इस योजना के सबसे बड़े लाभार्थी एफडीआई यानि विदेशी निवेशक है --- वे बहुत कम दामो में जमीने आदि खरीद सकेंगे और सेज हथिया सकेंगे।
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(3) देश के उत्पादक वर्ग जैसे डॉक्टर्स, कारखाना मालिक, व्यवसायी आदि के पास अन एकाउंटेड केश कई मामलो में उन्हें भ्र्ष्ट मंत्रियों, पुलिस/प्रशासनिक अधिकारियों, जजो और पेड मिडिया कर्मियों से निपटने में सहायता करता है। उनमे से प्रत्येक को २०-३०% का नुक्सान हुआ है। इससे उनकी घूस देने की शक्ति घटेगी। इससे भ्रष्ट मंत्री, जज, पुलिस अधिकारी, मीडियाकर्मी आदि पैसा खाने के लिए विदेशी धनिको की तरफ दौड़ लगाएंगे, नतीजतन स्थानीय इकाइयों को घाटा उठाना पड़ेगा।
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(4) देश में जितना कुल काला धन है, इसका सिर्फ ३-४% ही नकदी के रूप में है। सबसे ज्यादा काला धन जमीनों में निवेशित है, और विदेशी धनिको, मिशनरीज ने नामी ढंग से यह जमीने ट्रस्टो के माध्यम से हथिया रखी है, तथा उनके पास काफी कम संपत्ति बेनामी है। लेकिन यदि आप किसी औसत फेक्ट्री मालिक या कारोबारी को देखेंगे तो उसके पास जो संपत्ति है उसका एक बड़ा भाग नकदी के रूप में है और जमीन में उसने अपेक्षाकृत काफी कम निवेश किया हुआ है। चूंकि मिशनरीज और विदेशी धनिको के पास नामी जमीने है अतः जब बेनामी प्रोपर्टी पर कार्यवाही की जायेगी -- जैसा की कहा जा रहा है -- तो उन्हें किसी समस्या का सामना नहीं करना पड़ेगा, जबकि भारतीय धनिको और कारोबारियों को फिर से भारी घाटा होगा।
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कुल मिलाकर जिन लोगो को विदेशी धनिको के बढ़ते प्रभाव से कोई समस्या नहीं है उन्हें नोटबंदी के कई फायदे नजर आएंगे और वे इस फैसले से पैदा होने वाले दीर्घकालिक दुष्प्रभाव का आकलन नही कर सकेंगे।
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लेकिन जो देश में विदेशी धनिको के बढ़ते प्रभाव और इस खतरे को देख सकते है वे काले धन की समस्या के निवारण के लिए भू स्वामित्व के लेखों को सार्वजनिक करने, संपत्ति कर आरोपित करने, जमीनों के लेनदेन में क्रमिक नीलामी प्रक्रिया लागू करने और वैट, जीएसटी, एक्साईज आदि करो को हटाने प्राथमिकता देंगे। नोटबंदी के तमाशे को नहीं।
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