Pawan Jury BhilwaraRj
Ravi Kumar Parashar:
कृपया बटुकेश्वर दत्त पर गूगल करें आज उनकी जयंती है।
महात्मा बटुकेश्वर दत्त का जन्म 1910 में 18 नवंबर को हुआ था और उन्होंने दसवीं कक्षा तक की पढ़ाई पी.पी.एन. हाई स्कूल,कानपुर से पूरी की थी। उस समय दसवीं पास करना, एक अच्छी नौकरी पाने के लिए काफी थी। लेकिन दत्त ने आजादी के आंदोलन से जुड़ने का फैसला किया। दत्त भगत सिंह के साथी थे। दोनों ने 1929 में असेंबली में बम फेंके, जिसके लिए दत्त को फांसी हो सकती थी। लेकिन उनको फांसी नहीं हुई बल्कि उनको आजीवन/पूरे जीवन की कैद हुई क्योंकि उस मामले में किसी को मारना मकसद नहीं पाया गया। भगत सिंह को सांडर्स को मारने के कारण फांसी दी गई। दत्त पर भी मुकदमा चला था सांडर्स को मारने के लिए, लेकिन दत्त सांडर्स को मारने में शामिल नहीं थे, इसलिए उन्हें इस मामले में सजा नहीं हुई। दत्त को काला पानी भेज दिया गया जहां उन्हें टी.बी. रोग हुआ और उन्हें 1940 में छोड़ दिया गया। फिर उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया, इसके लिए उन्हें 3 साल की सजा हुई। आजादी के बाद उन्होंने शादी की। हाई-स्कूल की शिक्षा के बावजूद, जो उस समय एक अच्छी नौकरी पाने के लिए काफी थी, उन्हें सब्जियां बेचकर जीवन चलाना पड़ा!! 1964 में लगभग गुमनामी में उनकी मौत हुई |
एक कच्चा/नौसिखिया पाठक यह पूछ सकता है कि ”यह सच नहीं हो सकता, क्योंकि उन्हें तो स्वतंत्रता सेनानी पेंशन मिलती होगी।'स्वतंत्रता सेनानी पेंशन' 1971 से पहले शुरु नहीं हुई थी और दत्त 1964 में खत्म हो गए थे। यह योजना इतनी देर से क्यों शुरु हुई?
बहुत से स्वतंत्रता सेनानियों ने अपना शरीर और मन का स्वास्थ्य, जमीन इत्यादि खो दिया था और कई अपाहिज भी हो गए थे। लेकिन नेहरु और सरदार पटेल ने स्वतंत्रता सेनानियों को कोई भी पेंशन देने से इनकार कर दिया। क्योंकि यदि उन्हें पेंशन दी जाती, तो वे आर्थिक रूप से सुरक्षित महसूस करते और राजनीति में चले जाते जिससे कांग्रेस के वोट काटते। इसलिए स्वतंत्रता सेनानियों को 1971 तक कोई पेंशन नहीं मिली।
दत्त को अपने राजनीतिक जीवन में कोई सम्मान नहीं मिला क्योंकि उसे सम्मान और नाम देने से राजनीति में मंच मिल जाता, ऐसे में उस समय के सारे नेताओं ने मिडिया को बहुत जोर दिया होगा कि दत्त के नाम का प्रचार न करें। उनकी मिडिया में प्रशंसा नहीं हुई, क्योंकि यदि उसकी प्रशंसा/तारीफ हुई होती, तो एक प्रश्न उठता कि ”क्या कर रहे हो उसके लिए अभी?” सामान्य तरीके से कवि आदि मरे हुए शहीदों की तारीफ करना पसंद करते हैं, ना कि जिंदा बहादूर/वीरों की क्योंकि जिंदा वीरों की तारीफ करने से नेताओं का प्रभाव कम हो सकता है और प्रश्न उठ सकते हैं।
शहीदों की तुलना करना, कि कौन ज्यादा बड़ा है, न तो सही है और न अच्छा। लेकिन कुछ मायनों में, मैं दत्त को भगत सिंह से बड़ा मानता हूं। दत्त ने कुछ काफी मुश्किल परीक्षाएं पास की, जो महात्मा भगत सिंह को कभी झेलनी नहीं पड़ीं। 1950 के दशक में, यदि दत्त ने नेहरु के पांव छुए होते और कांग्रेस के साथ मिल गए होते, तो कांग्रेस उन्हें कम से कम विधायक बना देती और उनके नाम पर वोट बटोरती। कांग्रेसियों ने दत्त को कांग्रेस से जुड़ने के लिए कहा होगा ओर पैसे और पद का वायदा भी किया होगा, लेकिन दत्त बिके नहीं। एक 35 साल के व्यक्ति को बिकने के लालच को ना कहना ज्यादा मुश्किल है, बजाए 25 साल के युवक के। साथ ही एक 55 साल के व्यक्ति को बिकने के लालच को ना कहना ज्यादा मुश्किल है बजाए 45 साल के व्यक्ति के। हम यह कह सकते हैं कि महात्मा भगत सिंह भी कभी बिके नहीं थे, लेकिन भगत जी भाग्यशाली थे, कि उनको गरीब में होने और 55 साल की उम्र में बिकने के लालच जैसी परीक्षा नहीं देनी पड़ी। दत्त ने ऐसी परीक्षा दी और पास हो गए।
आलेख राईट टू रिकॉल पार्टी का घोषणा-पत्र पुस्तक से लिया गया है। Chapter no. 13.12, Page no. 239, डाउनलोड करें।
http://rahulmehta.com/301.h.htm