Pawan Jury BhilwaraRj

ऑन लाइन पेमेंट करने के लिए डेबिट कार्ड/क्रेडिट कार्ड या नेट बैंकिंग का प्रयोग किया जाता है। इस पेमेंट को प्रोसेस करने के लिए "पेमेंट गेटवे" का इस्तेमाल होता है। भारत में 90% पेमेंट गेटवे कंपनियां विदेशी है।
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जब आप कोई ऑनलाइन पेमेंट करते है तो पहले आपका मर्चेंट जैसे ओला, उबेर, गो आईबीबो, मेक माय ट्रिप, अमेजन, फ्लिपकार्ट आदि पेमेंट रिक्वेस्ट "गेटवे कंपनी" को भेजता है, गेटवे कंपनी इसकी एप्रूवल आपके बैंक को भेजती है। बैंक द्वारा क्लियरेंस आने पर मर्चेंट आपको सेवा या उत्पाद की डिलीवरी दे देता है। इस तरह से सभी प्रकार के ऑनलाइन ट्रांसेक्शन और आपके डेबिट/क्रेडिट कार्ड का डेटा इन गेटवे कंपनियों के पास होता है।
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स्मार्ट फोन में सभी एप्लिकेशंस और ट्रांसेक्शन आदि का आधार आपकी मेल आई डी है। सभी मेल सर्विसेस विदेशी कंपनियां है और आपका सभी डेटा इनके पास ऑटोमेटिक संगृहीत होता है। आपके फोटो, वीडियो से लेकर मैसज, फोन बुक आदि तक।
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ज्यादातर सोशल मिडिया प्लेटफॉर्म जैसे व्हाट्स एप, फेसबुक आदि विदेशी कंपनियां है, और इनके पास आपका डेटा संगृहीत रहता है।
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आपके फोन को ऑपरेट करने वाला एंड्रॉइड और आई ओ एस आदि ऑपरेटिंग सिस्टम भी विदेशी कंपनियों द्वारा निर्मित है, और आपके प्रत्येक क्लिक का डेटा इनके पास संगृहीत रहता है। गूगल और एप्पल जब भी चाहे आपके फोन के ऑपरेटिंग सिस्टम को ऑफ़ करके फोन डेड कर सकते है।
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मुझे इस बारे में कोई तकनिकी जानकारी नहीं है कि कैसे भारत के करोडो डेबिट कार्ड्स को हैक किया गया है, या तकनिकी चूक कहाँ हुयी। लेकिन इतना तो साफ़ नजर आता है कि भारत के पूरे इंटरनेट वर्ल्ड पर विदेशी कंपनियों का कब्ज़ा है। तो बिना हैकिंग के ही हम पहले से ही हैकरों के हवाले है। और इस क्षेत्र में जो डिजिटल कंपनियां हमें भारतीय नजर आती है वे भी तकनिकी सहायता के लिए विदेशी कंपनियों अर टिकी हुयी है। वे जब चाहे हमें 24 घंटे में आदिम युग में पहुंचा सकते है। और वे ऐसा न करे इसके लिए हमें ऊँची कीमत चुकानी पड़ रही है।
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उदाहरण के लिए, हाल ही में देश के 100 रेलवे स्टेशनों पर वाई फाई लगाने का ठेका भारत ने गूगल को दे दिया। जबकि ये काम हम आसानी से अपने बूते बीएसएनएल द्वारा कर सकते है। और गूगल इन स्टेशनों पर डाइरेक्ट एक्सेस नहीं दे रहा है। इसके लिए आपको अपना फोन नंबर डाल कर ओटीपी का प्रयोग करना होता है। ये स्टेशन प्रतिदिन लगभग 2 करोड़ उपभोक्ताओं को वाई फाई सर्विस देंगे। लेकिन यदि गूगल चाहेगा तो इन्हें किसी भी समय बंद कर सकेगा।
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मतलब हम ऐसे दौर में प्रवेश कर रहे है जहाँ पूरा भारत अमेरिका/बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सर्विलांस में होगा। और वे जब चाहेंगे सिर्फ एक बटन दबाकर भारत को रोक देंगे।
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समाधान :
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हमें उन कानूनों की जरुरत है जिससे हम डिजिटल सेक्टर में आत्मनिर्भर हो सके। ज्यूरी सिस्टम, वेल्थ टेक्स, टीसीपी, राईट टू रिकॉल आदि कानूनों की सहायता से हम भारत की स्वदेशी इकाइयों को वे अवसर मुहैया करा सकते है जिससे हम तकनिकी विकास करके गूगल, फेसबुक और एप्पल जैसी अपनी खुद की कंपनियां खड़ी कर सके। चाइनीज फटाको और झालरो के बहिष्कार का मौसम दिवाली के अगले दिन ही चला जाने वाला है। इसीलिए बेहतर है कि हम लगातार बड़े होते जा रहे खतरे पर अपना ध्यान लगाएं।
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