Pawan Jury BhilwaraRj

चिंटू : मास्टर जी, सिर्फ़ दो पदक मिले है ओलम्पिक में । हम एथलेटिक्स में इतने पिछड़े हुए क्यों है ?

मास्टर जी : कभी 400 मीटर का ट्रेक देखा है ? जिस पर एथलेटिक्स की सारी स्पर्धाएँ होती है ।
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चिंटू : नही । कहाँ देखने मिलेगा ?

मास्टर जी : टीवी पर या महानगरों में ही देखने मिलेगा । मध्यम आकार के शहरों में भी इक्का दुक्का ही है ।
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चिंटू : तो ?

मास्टर जी : तो क्या ? किताबें नही है तो पढ़ेगा किससे ? इसके लिए खेलों के बुनियादी ढाँचे में निवेश करना होता है । ट्रेक एंड फ़ील्ड, प्ले कोर्ट्स, खेल उपकरण व साजो सामान और फिर इनमें कोच वगेरह भी चाहिए । पूरे देश में । ज़्यादातर शहरों में । इससे निचले स्तर पर प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और खेल का स्तर सुधरेगा । तब जाकर मौक़ा बनेगा ।
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चिंटू : तो हमें ये सब बनाने पर निवेश करना चाहिए । लोग खेलेंगे तभी तो पदक आएँगे ।

मास्टर जी : देश के कई हिस्सों तक अभी बिजली के खम्भे और सड़क नही पहुँची है । शौचालय बन नही रहे क्योंकि पानी और गटर की लाइनें नही डली । रेलें क्षमता से दो गुना बोझ ढो रही है, क्योंकि रेलवे ट्रेक की कमी है । जाड़ों में हर बार हज़ारों अकड़ कर मर जाते है, क्योंकि उनके पास छत नही है । सिर्फ़ 12 लाख की सेना है हमारे पास । इसे 40 लाख तक पहुँचाना है । हथियारों के उत्पादन में निवेश करना है । सरकारी स्कूल-अस्पताल टूटे जा रहे है । इन्हें भी खड़ा करना है । ये सब पर झाड़ू फेरकर खेल में निवेश करें । यूँ ?
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चिंटू : नही । ये सब पहले ज़रूरी है । मैं तो इसीलिए कह रहा था, क्योंकि पदक नही आने से देश शर्मिन्दा होता है । तो इधर भी थोड़ा देखना चाहिए न ।

मास्टर जी : क़र्ज़ का ब्याज हमसे चुकाने नही हो रहा । दवाइयाँ, मोबाइल, कम्प्यूटर, हथियार से लेकर दालें तक हम आयात करते है । भूख से ही कितने मर जा रहे है । हिसाब नही है । तब हम शर्मिन्दा नही होते, पर खेल तमाशे में पिछड़ने पर हो जाते है !
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चिंटू : मास्टर जी, इसमें फ़िक्र करने की क्या बात है । समाधान है तो । ये सब समस्याएँ तो राइट टू रिकॉल, ज्यूरी सिस्टम के आने से साल-दो साल में ख़त्म हो जाएगी ।

मास्टर : तो जब ख़त्म हो जाएगी तब खेल कूद के बारे में भी सोचेंगे ।
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चिंटू : कोई शॉर्ट कट नही है क्या ख़ूब सारे पदक लाने का ?

मास्टर जी : है न । चीन, रूस अमेरिका से हज़ार-पाँच सो बेहतरीन एथलीटों को पैसों से तोलकर ले आइए । उन्हें भारत की नगरिकता भी दे दीजिए । उन्हें अभ्यास करने के लिए सभी सुविधाएँ व विश्वस्तरीय कोच आदि भी दीजिए । तो अगले ओलम्पिक में ये लोग भारत के लिए दस-बीस मेडल जीत लाएँगे ।
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चिंटू : मास्टर जी, ये तो मज़ाक़ की बात हो गयी ।
मास्टर जी : चिंटू, यह मज़ाक़ नही है । यह स्पोर्ट्स में एफडीआइ है । मेक इन इंडिया है । यह विकास का नया मॉडल है ।
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चिंटू : धन्य है !
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