Pawan Jury BhilwaraRj
1) ओलम्पिक में महिला प्रतिभागियों ने देश के लिए पदक जीता है, लेकिन ध्वनित कुछ इस तरह हो रहा है, जैसे भारत के सभी पुरुषों को इस उपलब्धि पर शर्मिंदा होना चाहिए !!
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2) मनोरंजन क्षेत्र जैसे नृत्य, गायन, अभिनय, खेल आदि के प्रतिभागियों को मीडिया द्वारा ज़रूरत से ज़्यादा प्रसारण और प्रोत्साहन दिए जाने से भारत के मानविक और आर्थिक संसाधनों का अपव्यय हो रहा है ।
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यदि महिलाएँ देश के लिए कोई उपलब्धि हासिल कर ले तो लिंग भेद का कलेवर चढ़ा कर इसे भी राष्ट्रीय शर्म में बदल देने की कला सारी दुनिया में सिर्फ़ हमारे देश के बुद्धिजीवियों को ही आती है ।
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मीडिया और कु-बुद्धिजीवियों का यही पेशा है । वे जो सुना, दिखा और पढ़ा रहे है, लोग उसी की जुगाली कर रहे है ।
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पिछले 4-5 दिनो से यह साबित करने में पूरी ताक़त लगायी जा रही है कि, "संधू और साक्षी महिलाएँ है" । वे भारतीय नही है । वे "भारतीय महिलायें" है । बावजूद इसके वे पदक जीत गयी है । और इसीलिए भारत के नागरिकों को शर्म से डूब मरना चाहिए ।
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लिंग भेद के आधार पर अलगाव बढ़ाने का सबसे अच्छा तरीक़ा यह है कि, महिलाओं से भारतीयता की पहचान छीन कर उन्हें सिर्फ़ महिला के तौर पर पेश करो । इससे अपने आप ही पुरुष और महिलाओं के दो खेमे बन जाएँगे । फिर आप आसानी से नारीवाद के नाम पर देश में घृणा, कुंठा, वैमनस्य, हिक़ारत, नैतिक उपदेश, या जो भी आप फैलाना चाहे फैला सकते है ।
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लेकिन ये नारिवादी उपदेशक कभी उन कानूनो की माँग नही करते जिससे स्त्रियों का सशक्तिकरण हो । इनकी रूचि सिर्फ़ समस्या को भावनात्मक रूप से उभाड़कर माहौल खड़ा करने में होती है । ये उपदेशक कभी उन क़ानूनो का समर्थन नही करेंगे जिससे बलात्संग और भ्रूण जाँच के आरोपियों का ज्यूरी द्वारा सार्वजनिक नार्को टेस्ट किया जा सके । इनका काम समस्या हल करना नही बल्कि पूरे विश्व को यह बताना है कि भारत के सारे पुरुष सुनियोजित तरीक़ों से भारत की महिलाओं का दमन करने में लगे है । जो कि बिलकुल झूठी और अतिशियोक्ति पूर्ण बात है ।
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भ्रूण हत्या रोकने और स्त्रियों के उत्पीड़न में कमी लाने के लिए हमें ज्यूरी सिस्टम, राइट टू रिकाल कानूनो की ज़रूरत है । इन क़ानूनो के गेजेट में प्रकाशित होने से स्त्रियों की प्रगति में बाधा देने वाली घटनाओं पर रोक लगेगी और महिलाओं का सशक्तिकरण होगा ।
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इसीलिए यदि आप स्त्री सशक्तिकरण की परवाह करते है तो समाधान के लिए उन वांछनीय कानूनो की माँग करें जिससे वास्तविक और सकारात्मक परिवर्तन लाया जा सके । शेष भारत को कोसने से महिला सशक्तिकरण होने की जगह अलगाव और राष्ट्रीय शर्मिंदगी में ही इज़ाफ़ा होगा
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हम तकनीक में बुरी तरह से पिछड़ रहे है । क्योंकि हम शिक्षा और गणित विज्ञान के क्षेत्र में पिछड़ रहे है । तकनीक न जुटा पाने के कारण हम महत्त्वपूर्ण तकनीकी क्षेत्रों में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों पर बुरी तरह से निर्भर है । इसी वजह से हम स्वदेशी हथियारों के निर्माण में पिछड़ गए है और आयातित हथियारों पर देश चला रहे है । किसी देश के लिए पराए देश के हथियारों पर निर्भर होना वाक़ई डराने वाली बात है ।
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यह नुक़सान दो तरफ़ से हो रहा है :
१) कक्षा 8 तक फैल न करने जैसे कानूनो को लागू करके हमारे गणित-विज्ञान के आधार को तोड़ा जा रहा है, तथा बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के दबाव में सभी राजनैतिक दल उन कानूनो का विरोध कर रहे है जिससे भारत में तकनीक आधारित शिक्षा का आधार मजबूत किया जा सके ।
२) प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया खेल प्रतिभाओं और मनोरंजन क्षेत्र में करतब दिखाने वाले युवाओं को ज़रूरत से ज़्यादा प्रोत्साहन दे रहा है । इससे शिक्षा प्रतिभाओं का पलायन मनोरंजन क्षेत्र में होने से देश के मानव संसाधन का अपव्यय हो रहा है ।
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मौजूदा दौर में अनुत्पादक और मनोरंजन क्षेत्र के प्रतिभागियों को पैड मीडिया द्वारा बहुत ज़्यादा प्रसारण दिया जा रहा है । मीडिया में एफडीआइ होने से पिछले १० वर्षों में यह प्रवृति बढ़ गयी है । इन पेशों से जुड़ी चमक दमक बच्चों और किशोरों को अपनी और खींच रही है ।
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कला की अपनी एक जगह है, और इसे संरक्षित भी किया जाना चाहिए और इसे प्रोत्साहित भी किया जाना चाहिए । लेकिन हमें इसे हद से ज़्यादा तवज्जो देने से बचना चाहिए । आजकल छोटे पर्दे पर नाच-गाने के अलावा विभिन्न करतब दिखाने के फूहड़ कार्यक्रमों की बाढ़ सी आयी हुयी है । किशोर-बालक इन कार्यक्रमों में मुँह में से आग निकालते है, अपने शरीर को विभिन्न कोणों में मरोड़ते है, अलाप उठाते है, बंदर-भालुओं की आवाज़ें निकालते है । ठीक है, किसी व्यक्ति में कोई दर्शनीय करतब है तो यह कौतुहल जगाता ही है । लेकिन इन्हें टेलेंट की संज्ञा और प्रतिभागी को हद से ज़्यादा प्रचार देने से अन्य किशोर भी ख्याति लाभ के लिए यही सब करने की और आकर्षित होते है ।
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गीत, संगीत, नृत्य, खेल, अभिनय तथा अन्य सभी कलाएँ भी मनोरंजन क्षेत्र के अंतर्गत है । इनमे उत्पादकता शून्य है । रचनात्मकता और आविष्कार नही होने से एक और बाज़ार इसका भुगतान नही करता जिससे 1000 में से 998 प्रतिभागियों को कोई वित्तीय सुरक्षा नही मिलती तथा दूसरी तरफ़ प्रतिभाओं के मनोरंजन क्षेत्र में चले जाने से तकनीकी क्षेत्र में प्रतिभाओं की कमी आती है और देश की उत्पादकता गिर जाती है ।
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अपने आस पास नज़र घुमाइए, आपने जो कपड़ा पहना है उसे बनाने के लिए पावरलूम की ज़रूरत है, रोटी का आटा मशीन से पीसा जाता है, इंजन, कम्प्यूटर, दवाइयाँ आदि से लेकर हर वो चीज़ जिनका आप सुबह से शाम इस्तेमाल करते है, इंजीनियर्स की देन है । यदि गणित-विज्ञान की शिक्षा न होती तो डॉक्टर्स-इंजीनियर्स नही होते । और इनके न होने से वह कुछ भी नही होता जो आज आप अपने आस पास देख रहे है ।
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किसी देश में जितने ज़्यादा बच्चे गणित-विज्ञान की और आकर्षित होंगे और जितना ज़्यादा इनका स्तर सुधरेगा, अमुक देश उतना ही प्रोदयोगिकिय विकास करेगा । गणित-विज्ञान के विकास से ही देश में तकनीकी आत्म निर्भरता आएगी और हम ख़ुद के हथियारों का उत्पादन करने में सक्षम होंगे ।
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लेकिन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिक नही चाहते कि देश की प्रतिभाओं का एक बड़ा वर्ग ख़ास तौर पर गणित-विज्ञान की शिक्षा की और आकर्षित हो । इसीलिए मनोरंजन और खेल क्षेत्र की प्रतिभाओं को असीमित प्रसारण देकर अन्य छात्रों को भी इन्ही क्षेत्रों में "भाग्य आज़माने" के लिए प्रेरित किया जाता है । अभिभावक भी इस समग्र प्रभाव के शिकार होकर बच्चों में कोई न कोई "टेलेंट" ढूँढ निकालते है और उन्हें मनोरंजन-खेल क्षेत्र में ठेल देते है । इस तरह प्रतिभाओं का एक वर्ग अपने सबसे क़ीमती समय और ऊर्जा का इस्तेमाल अनुत्पादक हुनर को सीखने में खपा देता है । वे इस तथ्य को जान नही पाते कि मनोरंजन क्षेत्र में या तो तख़्त है या तख़्ता । और तख़्त पर एक दो व्यक्तियों को ही खड़े होने का स्थान मिलता है । शेष सभी को तख़्ता ही नसीब होगा ।लेकिन तख़्त पर खड़े होने वालों को इतना प्अधिक महिमामंडित कर दिया जाता है, इतने इनामों-ईक़रामो की बौछार की जाती है कि युवाओं की आँखें चौंधिया जाती है व लाखों किशोर इस अंधी दौड़ में शामिल हो जाते है ।
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इस पर विचार करना मौजूँ होगा कि, यदि कलाम, काकोड़कर, भाभा और साराभाई जैसी प्रतिभाओं ने यदि विज्ञान गणित की किताबों की जगह क्रिकेट या बेडमिनटन का बल्ला थाम लिया होता तो हमें कितनी क्षति होती । इसीलिए "थ्री इडियट्स" जैसी फ़िल्मों के माध्यम से यह संदेश दिया जाता है कि, "आपको यदि इंजीनियरिंग समझ नही आ रही तो इसे समझने की कोशिश करने की जगह आपको वाइल्ड लाइफ़ फ़ोटोग्राफ़र बन जाना चाहिए" या छात्र जीवन में भी वही करना चाहिए जो करने का आपका दिल करे !!! और इसीलिए प्रशासनिक सेवाओं जैसी अनुत्पादक और अपेक्षाकृत कमतर सेवाओं के टोपर्स को मीडिया में असीमित कवरेज दिया जाता है, जबकि तकनीकी शिक्षा के टोपर्स की तब भी अवहेलना की जाती है, जबकि देश को मज़बूत बनाने में सर्वाधिक योगदान इन्ही का होता है ।
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हालाँकि देश को चलाने के लिए सभी प्रकार के पेशेवरों की ज़रूरत होती है, अतः उनकी भूमिका को नज़रअन्दाज़ नही किया जाना चाहिए । लेकिन हमें इस बात को समझना बहुत ज़रूरी है कि मनोरंजन क्षेत्र का योगदान राष्ट्र निर्माण में लगभग शून्य ही है, जबकि गणित-विज्ञान तथा तकनीक ही राष्ट्र की शक्ति का आधार बनाती है । लेकिन जब नगण्य महत्त्व के सीगे को सर्वाधिक और सबसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्र को सबसे कम महत्त्व मिलता है तो संतुलन बिगड़ जाता है ।
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मेरा बिन्दु यह है कि, फ़िलहाल हमारी हालत बहुत ख़राब है । हमें देश में वो ढाँचा खड़ा करना है जिससे हम, अव्वल तो लाखों-करोड़ों छात्रों को गणित विज्ञान की शिक्षा की और आकर्षित कर सके, तथा उन कानूनो को देश में लागू करवा सके जिससे भारत में गणित-विज्ञान का ढाँचा मजबूत हो । इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ने से हमें करोड़ों की संख्या में वे इंजीनियर्स प्राप्त होंगे जो देश में तकनीकी विकास और प्रोदयोगिकिय उत्पादकता को गति दे सके । और साथ ही हमें उन कानूनो की ज़रूरत है जिससे हम देश में व्याप्त ग़रीबी, बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार आदि समस्याओं को ख़त्म कर सके। और तब कहीं जाकर हमें वो शासन व्यवस्था हासिल होगी जिससे हम अपने बूते आधुनिक जटिल हथियारों का उत्पादन कर सके । हम अमेरिका-ब्रिटेन-फ़्रान्स-रूस और चीन नही है, कि हम खेल में इन्हें पछाड़ने पर शक्ति लगाए। ये देश ख़ुद को तकनीक के क्षेत्र में इतना आत्मनिर्भर बना चुके है कि इनकी सेनाएँ आत्मनिर्भर है । हमें लम्बा फ़ासला तय करना है, और लक्ष्य काफ़ी ऊँचे है । ऐसे में यदि हम अपने मानविक-आर्थिक संसाधन मनोरंजन क्षेत्र में झोंक देंगे तो शायद खेल में भले जीत जायें लेकिन असली युद्ध में हार जाएँगे ।
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हालाँकि वास्तविकता यह है कि, यदि हमें खेल के क्षेत्र में भी उत्कृष्टता हासिल करनी है तो रास्ता अच्छे कानूनो की और से ही जाता है । आज ज़्यादातर खेल कौशल से ज़्यादा तकनीक पर निर्भर हो चुके है । जिस देश के पास जितनी अच्छी तकनीक और वित्तीय संसाधन है उसके बेहतर प्रदर्शन की सम्भावना भी उतनी ही ज़्यादा है । इसके अलावा अंतर्राष्ट्रिय स्तर पर सर्वश्रेष्ठ एथलीट तैयार करने के लिए बड़े पैमाने पर खेल के बुनियादी ढाँचे पर निवेश करना होता है । जिस देश में आधी आबादी ग़रीबी से त्रस्त हो और हम सड़कों, नालियों, बिजली, पानी की लाइनों जैसी बुनियादी समस्याओं से झूझ रहे हो उस देश में खेल के क्षेत्र में इस तरह का निवेश करना सम्भव भी नही है और बुद्धिमानी भी नही है । ऐसे हालात में भी कुछ खिलाड़ी तमाम बाधाओं को पार करते हुए स्थान बना लेते है तो यह उनके व्यक्तिगत प्रयासों का नतीजा है । व्यवस्था का नही ।
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क्रिकेट की बात अलग है । क्रिकेट को खेल की श्रेणी में नही रखा जा सकता । क्योंकि यह कला से बढ़कर एक व्यवसाय है, और बाज़ार इसके लिए भुगतान करता है । यदि सिने सितारे और क्रिकेटर नही होंगे तो शीतल पेय कम्पनियों को युवा वर्ग को यह समझाने में बड़ी दिक़्क़त आएगी कि, "आख़िर इस बोतल में ऐसा क्या है कि व्यक्ति को इसे पीना चाहिए" !!
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मेरा ऐतराज़ मनोरंजन क्षेत्र को प्रोत्साहन देने से नही है । लेकिन हमें इस बात को समझने की ज़रूरत है कि मीडिया के माध्यम से समग्र प्रभाव इस तरह से बनाया जा रहा कि देश के छात्रों और अभिभावको में मनोरंजन क्षेत्र की और दौड़ लगाने की प्रवृति बढ़ रही है । और यह स्थिति हमें नुक़सान पहुँचा रही है । तो मेरा सभी नागरिकों और कार्यकर्ताओं से आग्रह है कि, वे पदकों का उत्सव मनाने के साथ ही देश में उन कानूनो की माँग भी करें जिनसे हमारे देश में गणित-विज्ञान का ढाँचा मजबूत हो और ज़्यादा से ज़्यादा छात्र तकनीकी और उत्पादक क्षेत्र में कैरियर बनाने की दिशा में प्रेरित हो ।
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किन कानूनो की सहायता से हम ज़्यादा से ज़्यादा छात्रों को गणित-विज्ञान की शिक्षा की और आकर्षित करके देश की उत्पादकता बढ़ा सकते है ?
मेरा प्रस्ताव है कि, राइट टू रिकॉल दूरदर्शन चेयरमेन, राइट टू रिकॉल शिक्षा अधिकारी और ज्यूरी सिस्टम क़ानून प्रक्रिया को लागू करके ऐसा किया जा सकता है । इन कानूनो के ड्राफ़्ट देखने के लिए मेरे कवर पिक्चर पर क्लिक करें तथा डिस्क्रिप्शन में दर्ज किए गए लिंक को पढ़े ।
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ओलम्पिक में भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए पदक जीतने वाले सभी खिलाड़ियों को बधाई ।
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