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मोदी साहेब : देवी इंदिरा गांधी
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भारत में अब तक जितने प्रधानमंत्री हुए, देवी इंदिरा गांधी को निर्विवाद रूप से अब तक सर्वश्रेष्ठ प्रधानमंत्री माना जाता है। इमरजेंसी के लिए उन्होंने कभी माफ़ी नहीं मांगी, लेकिन उन करोडो भारतीयों ने उन्हें इमरजेंसी के लिए माफ़ किया जिन्होंने उन्हें शासन से च्युत कर दिया था, और महज 2 साल बाद सत्ता फिर से उनकी झोली में डाल दी। मोदी साहेब के कार्यकाल को 2 वर्ष बीत चुके है। अगले तीन वर्ष भी गाड़ी उसी दिशा में बढ़ेगी जो रास्ता वे गुजरे 2 साल में तय कर चुके है। जानिये, देवी इंदिरा गांधी और मोदी साहेब में क्या बुनियादी फर्क है।
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भारत की सत्ता को प्रभावित और नियंत्रित करने वाले प्रमुख अंग निम्नलिखित है :
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[A] - प्रभावी शक्ति पुंज
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१) देशी और विदेशी धनिक - यह सबसे ताकतवर लॉबी है। क्योंकि पूरी दुनिया पैसे की पीछे भागती है और किसी देश की 90% जनता के पास कुल जितना पैसा होता है उतना पैसा इन गिने चुने २% लोगो के पास है। सभी राजनितिक पार्टियों के नेता चुनाव लड़ते है और चुनाव लड़ने के लिए इनसे चंदे लेते है। चुनाव जीतने के बाद भी नेताओ को आय इन्ही वर्गों से होती है। कैसे ? मान लीजिए कि आपकी किसी मंत्री या मुख्य्मंत्री से पहचान है। लेकिन आप मंत्री के कुछ काम नहीं आ सकते, क्योंकि आपके पास मंत्री का रसूख इस्तेमाल करने के लिए संसाधन ही नहीं होते। इसीलिए आप उनके लिए अनुपयोगी है। लेकिन मंत्री यदि किसी उद्योगपति से गठजोड़ बना ले तो उद्योगपति मंत्री के वारे न्यारे कर सकता है, और मंत्री उद्योगपति के।
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देश के सभी देशी धनिको जैसे अम्बानी, अडानी, टाटा आदि को जोड़ा जाए तो इनकी ताकत और पैसा विदेशी धनिको के पासंग भी नहीं है। उदाहरण के लिए यदि रोकोफेलर, रोथ्स्चाइल्ड अम्बानी को रिलायंस बेचने को कहे तो अम्बानी मिनिट से पहले चेक लेकर रवाना हो जाएगा। क्योंकि वह जानता है कि उसने ऐसा नहीं किया तो वे अम्बानी से रिलायंस भी छीन लेंगे, उसे देश निकाला भी देंगे और बदले में एक फूटी कौड़ी भी नहीं मिलेगी।
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एजेंडा - सरकार ऐसे क़ानून बनाये जिनसे उन्हें अतिरिक्त लाभ मिले।
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देवी इंदिरा गांधी :

देवी इंदिरा गांधी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया, जिससे धनिक वर्ग नाराज ही नहीं हुआ बल्कि इंदिरा जी का दुश्मन हो गया। उन्होंने विदेशी कम्पनियों को भारत में कर मुक्त व्यापार करने की छूट देने से इंकार किया, पेटेंट के क़ानून को लागू करने से इंकार किया और भारत के किसी भी क्षेत्र में विदेशी निवेश की अनुमति नहीं दी। इससे विदेशी धनिक इंदिरा जी पर बुरी तरह भड़क गए।
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मोदी साहेब :

मोदी साहेब ने विदेशी कम्पनियों के लिए भारत के सभी क्षेत्रो को खोल दिया जिससे वे मोदी साहेब के मुरीद हो गए।
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२) मिडिया - नेता की गिज़ा जनसमर्थन है, और मिडिया किसी भी नेता की जनता में छवि बनाने और बिगाड़ने में मुख्य भूमिका निभाता है। उदाहरण के लिए जब राजनाथ और अमित शाह ने बयान दिया कि राम मंदिर बनाने के लिए हमारे पास राज्य सभा में बहुमत नहीं है तब कोई भी पत्रकार उनसे यह सवाल पूछ कर उन्हें नंगा कर सकता था कि -- किसी भी क़ानून को पास करने के लिए राज्य सभा में बहुमत की आवश्य्कता नहीं है। राम मंदिर निर्माण के क़ानून को मनी बिल के नाम से लोकसभा में पास किया जा सकता है। और मनी बिल को राज्य सभा में पास करने की जरुरत नहीं होती। इस तरह मिडिया 24 घंटे के अंदर किसी भी नेता की छवि जनता में गिरा सकता है।
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भारत का मिडिया मुख्य रूप से बहुराष्ट्रीय कम्पनियो के नियंत्रण में कार्य करता है। आंशिक नियंत्रण देशी धनिको का भी है।
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एजेंडा - अपने आकाओ यानि धनिको और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को लाभ पहुंचाने वाले कानूनों को देश में लागू करवाना ताकि इन्हे भी मोटी आय हो।
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देवी इंदिरा गांधी :

बहुराष्ट्रीय कम्पनियां और धनिक पहले से ही इंदिरा जी के खिलाफ थे, अत: उनके द्वारा संचालित मीडिया और भी ताकत से इंदिरा जी की खिलाफत करने लगा। आलम यह था कि यदि कहीं पर 2-5 लाख की चोरी भी हो जाती थी तो अखबारों में रिपोर्ट इस तरह से की जाती थी, जिससे सन्देश यह जाए कि इसमें भी दोष इंदिरा गांधी का है। इंदिरा जी ने इमरजेंसी* लगा कर मिडिया को सेंसर्ड कर दिया।
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मोदी साहेब ने देश के सभी क्षेत्रो को बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हवाले कर मिडिया को अपने पाले में कर लिया। आज ज्यादातर मिडिया हाउस आपको प्रधानमंत्री की योजनाओं का प्रचार करते नजर आते है। इस प्रकार मिडिया और उनके प्रायोजक मोदी साहेब के समर्थन में है।
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(*) मैं इमरजेंसी का समर्थक नहीं हूँ। इमरजेंसी लगाना इंदिरा जी की भूल थी। इस समस्या का समाधान करने के लिए दूरदर्शन/आल इण्डिया रेडियो को प्रजा अधीन किया जाना चाहिए था, दूरदर्शन को केंद्रीय और राज्यों के स्तर पर अखबार निकालने की अनुमति देनी चाहिए थी और ज्यूरी प्रक्रियांए लागू की जानी चाहिए थी। इससे दूरदर्शन पीएम के हाथ से निकल कर जनता के हाथ आ जाता और नागरिकों को सच्ची खबरें प्राप्त होती। अपने विशाल संसाधनों के बूते दूरदर्शन का प्रिंट संस्करण टाइम्स, हिन्दू, इन्डियन एक्सप्रेस आदि समूहों को पीट देता और भारत में स्वतंत्र मिडिया की स्थापना होती। किन्तु दुर्भाग्य से देवी इंदिरा गांधी ने राईट टू रिकॉल ज्यूरी सिस्टम की जगह आपातकाल यानी कि सत्ता केंद्र अपने हाथों में बनाये रखने को तरजीह दी।
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३) अदालतें - भारत में सुप्रीम कोर्ट के फैसले लोहे की लकीर है। प्रधानमंत्री, मुख्य्मंत्री आदि की अदालती फैसलों के आगे कोई हैसियत नहीं। क़ानून क्या कहता है यह बताने का अधिकार भी सुप्रीम कोर्ट के पास है। भारत के जज भी आदमी ही है। उन्हें जो मोटा पैसा देता है फैसला उनके हक़ में सुनाने से उन्हें कोई ताकत नहीं रोक सकती। पीएम सीएम आदि उनके सामने भुनगे है, वे फूंक मारकर इन्हे उडा सकते है। पैसा सबसे ज्यादा फिर से विदेशी धनिको के पास है। अत: अदालतें भी विदेशी धनिको की राय पर काम करती है।
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उदाहरण के लिए जयललिता से लेकर माया और लालू, आडवाणी से लेकर शाह और मोदी की फाइलें हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट के पास रखी हुयी है। जज इन पर फैसले नहीं देते। उन्हें अपनी दराज में रखे रखते है। जिस दिन किसी नेता ने कलाबाजी दिखाई उसी दिन फ़ाइल खोलकर समन भेज दिए जाते है। आप सोचिये कि, सुप्रीम कोर्ट यदि शाह या मोदी साहेब पर चल रहे मुकदमों की फाइलें खोलकर उन पर मुकदमा चलाने की अनुमति दे दें और फिर उनकी जमानत नहीं ले तो मोदी साहेब कहाँ जाकर अपील करेंगे। उन्हें तो आरोप तय होते ही इस्तीफा देना होगा। 24 घंटे में पीएम की कुर्सी से अपदस्थ। और इस तरह जेटली की लॉटरी लग जायेगी।
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एजेंडा - भारत में न्यायपालिका को नियंत्रण से मुक्त तथा सर्वोच्च बनाये रखना, ताकि नेता बिरादरी समेत सभी की गर्दन को अदालतों में फंसा कर रखा जा सके।
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देवी इंदिरा गांधी :

बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की नाराजगी के कारण अदालतें इंदिरा जी के खिलाफ हो गयी थी। यहाँ तक कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायधीश सिन्हा ने इंदिरा जी पर 6 साल तक चुनाव न लड़ने का प्रतिबन्ध लगाकर उन्हें पीएम के पद से हटाने का इंतजाम कर दिया था। लेकिन इंदिरा जी ने पलटवार किया। उन्होंने अदालतों में चुन चुन का अपने आदमी बिठाकर अदालतों की मुश्कें कस दी। इमरजेंसी* के दौरान हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के दरवाजों पर ताले लगवा दिए गए थे।
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मोदी साहेब :

भारत में जजों की नियुक्ति और स्थानांतरण जज ही करते है। नियुक्ति करने का फैसला लेने वाले इस राष्ट्रीय न्यायिक आयोग में मोदी साहेब सरकार का (मतलब खुद का) सिर्फ एक प्रतिनिधि घुसाने के लिए संविधान संशोधन लाये। सभी राजनैतिक पार्टियों ने इसे मंजूरी दी और संविधान संशोधन पास हो गया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के जजों ने इस संशोधन को खारिज कर दिया और सरकार को आइन्दा ऐसे उल जलूल क़ानून न बनाने की नसीहत दी। मोदी साहेब घुटनो पर आ गए और उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में बैठे 25 जजों के सामने पूर्णत समर्पण कर दिया। इस प्रकार न्यायिक सुधार करने की जगह मोदी साहेब ने जजों से समझौता कर लिया।
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(*) मैं अदालतों को सत्ता या जजों के हवाले करने के समर्थन में नहीं हूँ। मेरे विचार में दण्ड देने की शक्ति नागरिकों के अधीन करने के लिए ज्यूरी प्रक्रियाओं को लागू किया जाना चाहिए और साथ ही जजों को नौकरी से निकालने का अधिकार भी नागरिकों को दिया जाना चाहिए। यदि इंदिरा जी देश में तब राईट टू रिकॉल जज और ज्यूरी सिस्टम प्रक्रियांए लागू कर देती तो जनता खुद महीने दो महीने में इन भ्रष्ट जजों को ठिकाने लगा देती। लेकिन दुर्भाग्य से सब और से इतना घिर चुकी थी कि उन्होंने सत्ता पर मजबूत पकड़ बनाने के लिए आपातकाल का सहारा लिया
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४) सांसद : भारत मे संसदीय व्यवस्था है, अत: पीएम सांसद की कठपुतली होता है। किसी भी समय सांसद किसी भी पीएम को घर बिठा सकते है। चाहे वह मोदी साहब हो या देवी इंदिरा गांधी जितनी ताकतवर नेता।
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एजेंडा - भारत मे सांसद 'सिर्फ' तीन काम करते है। सिर्फ तीन।

अ) पार्टी के उन अाला अधिकारियों की 5 साल तक चापलूसी करना जिनके हाथ मे चुनावो के दौरान टिकट वितरण का अधिकार होता है। यदि वे टिकट हासिल नही कर सके तो उनका राजनीतिक कैरियर खत्म हो जाएगा। और टिकेट देने का अधिकार जनता के हाथ में नही है। जनता सिर्फ वोट दे सकती है। लेकिन जनता वोट उसे ही देगी जिसे पार्टी के आला अधिकारी टिकट देंगे।

ब) ऐसे व्यक्ति से चिपके रहना जिसके चेहरे को दिखा कर चुनाव जीता जा सके। उदाहरण के लिए मोदी साहेब के दम पर देश में 283 सांसद चुनाव जीत कर संसद में चले आये। इनमे से ज्यादातर की जमीनी और नैतिक हैसियत दो कौड़ी की है, और वे सिर्फ इसीलिए संसद में बैठे है, क्योंकि उन्हें टिकेट मिल गया और जनता ने मोदी साहेब के चेहरे को देखकर उन्हें वोट कर दिया। यही स्थिति देवी इंदिरा गांधी तथा अन्य लोकप्रिय चेहरों के साथ है। जब जनता के सामने किसी नेता का चेहरा गिर जाता है तो ये दुसरे लोकप्रिय चेहरे के पीछे लग जाते है। जब तक पीएम का जनता में इकबाल ऊँचा रहेगा सांसद उसके हिसाब से चलेंगे, लेकिन पीएम के लोकप्रिय न रहने से पीएम सांसदों के हिसाब में आ जाता है।

स) चुनाव जीतने के बाद अगले 5 साल तक पैसा बनाना ताकि चुनाव के झंझट से बचने के लिए पैसा देकर राज्य सभा की सीट झटकी जा सके। ज्ञातव्य है कि राज्यसभा सीट के लिए काफी ऊँचे दाम चुकाने होते है। यदि राज्य सभा से टिकेट न मिले तो लोकसभा टिकेट लेने के लिए और चुनाव जीतने के लिए भी खासी रकम खर्चे करनी होती है। इस तरह सांसद बने रहने के लिए नेताओं को दोनों हाथो से पैसा इकट्ठा करना होता है।
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देवी इंदिरा गांधी :
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इंदिरा जी को दो बार पार्टी में बगावत का सामना करना पड़ा। 1968 में जब इंदिरा जी पीएम थी तब कांग्रेस अध्यक्ष एस निजालिंगप्पा ने इंदिरा जी को पीएम पद से निष्कासित कर दिया था। पार्टी में टूट हो गयी और इंदिरा जी ने नयी पार्टी और नए चिन्ह के साथ चुनाव लड़ कर सत्ता में वापसी की। 1979 में फिर से पार्टी में टूटन हुई और इंदिरा जी ने फिर से नए चुनाव चिन्ह के साथ चुनाव लड़ा और फिर से विजयी हुयी।
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मोदी साहेब :
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इंदिरा जी की तुलना में मोदी साहेब का कार्यकाल अब तक बेहद संक्षिप्त रहा है अत: इस पहलू पर तुलना नहीं की जा सकती। हालांकि अब तक मोदी साहेब की निस्बत किसी प्रकार की बगावत दूर दूर तक नजर नहीं आती, और पार्टी के सांसदों पर मोदी साहेब का पूरा नियंत्रण है।
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५ ) अन्य देश - इन देशो में अमेरिका-ब्रिटेन, चीन-पाकिस्तान और रूस शामिल है।
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यह सबसे कठिन सीगा है। सामरिक और विदेश नीति फौजदारी दुनिया है। जिसकी लाठी उसकी भैंस। या तो दबाओ या दब जाओ। बीच का कोई मार्ग नहीं। जो देश यहां दबेगा, वह दबता चला जाएगा, और एक दिन कुचला जाएगा। यह भाषणों की दुनिया नहीं है। यहां हथियार बोलते है। किसी भी पीएम की ताकत का पता इसी क्षेत्र से चलता है।
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भारत का पीएम यदि चीन-पाकिस्तान से बनाकर या उन्हें दबाकर नहीं चले तो वे महीने दो महीने में भारत के प्रधानमंत्री को कुर्सी से बेदखल कर सकते है ! कैसे ? यदि कोई देश हथियारों के आयात पर निर्भर है तो अमुक देश को उन देशो के इशारों पर चलना होगा जो उसे हथियार देते है। भारत 1970 तक रूस के हथियारों पर निर्भर था और आज अमेरिका-ब्रिटेन पर निर्भर है। चीन अपने हथियार खुद बनाता है, और पाकिस्तान को हथियारों की आपूर्ति करता है। यदि भारत का पीएम चीन की मंशा पर काम नहीं करेगा तो चीन पाकिस्तान को ढेर सारे हथियार देगा और उन्हें भारत में सैकड़ो कसाब जैसे हमले करने को कहेगा या भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने का आदेश देगा। सिलसिलेवार आतंकी घटनाओं से पीएम के विरूद्ध जनाक्रोश बढ़ेगा और पीएम की नौकरी जायेगी। ज्ञातव्य है कि भारत की सीमा इतनी लम्बी है कि यदि हर महीने कसाब जैसे कई समूह भारत में हमले करने के लिए घुसते है तो भारत उनमे से कुछ समूहों को ही भारत को घुसने से रोक पाएगा। हमारे पास इतनी लम्बी सीमा की सुरक्षा करने की कोई व्यवस्था नहीं है।
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यदि चीन भारत पर हमला कर देता है तो भारत को हथियारों के लिए अमेरिका दौड़ लगानी पड़ेगी। अमेरिका भारत को हथियार देता है तो ठीक, वरना खेल ख़तम। हथियारों के क्षेत्र में सबसे बड़ी अंतर्राष्ट्रीय शक्ति अमेरिका है। अत: पीएम को हर हाल में अमेरिका के निर्देशों की पालना करनी ही होती है। अमेरिका पाकिस्तान को हथियार देकर दर्जनों कारगिल करवा सकता है, रुपये को हफ्ते दो हफ्ते में पाताल में पहुंचा सकता है, अर्थव्यवस्था के धुर्रे उड़ा सकता है, और भारत के साथ वह सब कुछ कर सकता है जिसे भारत सहने में सक्षम नहीं है।
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एजेंडा :
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1) पाकिस्तान - कश्मीर पर पूर्ण नियंत्रण हासिल करना, भारत में आतंकवाद फैलाना, मुगलिस्तान की रचना करना, भारत में मुस्लिम बांग्लादेशी घुसपेठियो को घुसाना तथा हर तरीके से भारत की नाक में दम करके रखना।
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2) चीन - अरुणाचल तथा पूर्वोत्तर को चीन का अंग बनाना, हिन्द महासागर में पूर्ण सैन्य नियंत्रण हासिल करना, भारत की अर्थव्यवस्था को पंगु बनाना ताकि अपने माल को भारत में खपाया जा सके।
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3) अमेरिका-ब्रिटेन - भारत को प्रौद्योगिकी और खास तौर पर हथियारों की प्रौद्योगिकी में पंगु बनाये रखने के लिए गणित-विज्ञानं की शिक्षा का ढांचा तोडना, कश्मीर समेत पूर्ण भारत पर आर्थिक व सैन्य नियंत्रण हासिल करना, भारत के बाजार का अपनी कम्पनियों द्वारा दोहन करना, भारत के खनिजों और प्राकृतिक संसाधनों को हड़पना, भारत को ईसाई देश बनाना, हिन्दू और मुस्लिम में अलगाव पैदा करके भारत-पाकिस्तान में परमाणु युद्ध करवाना, ताकि पाकिस्तान और भारत के परमाणु हथियारों को जब्त किया जा सके, भारत की जमीन, सैनिक और संसाधनों का इस्तेमाल चीन से युद्ध में करना।
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4) रूस : भारत को अमेरिका का गुलाम बनने से बचाना और भारत को अपने हथियारों का आयातक बनाये रखना, पर साथ ही भारत के चक्कर में अमेरिका से सीधे दुश्मनी मोल लेने से भी बचना।
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पांचो देशो का संयुक्त एजेंडा - भारत को किसी भी कीमत पर खुद के स्वदेशी आधुनिक हथियारों की प्रौद्योगिकी जुटाने से और हथियारों के निर्माण से रोकना, क्योंकि जो देश हथियारों के क्षेत्र में आत्मनिर्भर हो जाता है, उस पर न तो किसी देश का बस चलता है और न ही ऐसे देश पर कोई एजेंडा थोपा जा सकता है।
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देवी इंदिरा गांधी :

इस मोर्चे पर देवी इंदिरा गांधी ने असाधारण इच्छा शक्ति का परिचय दिया। उन्होंने हमला करके पकिस्तान के दो टुकड़े किये। इंदिरा जी के शासन काल में यदि भारतीय सैनिक टहलते हुए पाकिस्तानी सीमा को पार भी कर जाते थे तो पाकिस्तानी सैनिक खामोश रहते थे। उन्हें चुपचाप रहने के आदेश थे। पाकिस्तान जानता था कि इंदिरा जी पाकिस्तान पर फिर से हमला करने का बहाना ढून्ढ रही है। उल्लेखनीय है कि इंदिरा जी ने पाकिस्तान के 5 और बांग्लादेश के 3 टुकड़े करने और पाक अधिकृत कश्मीर को भारत का स्थायी अंग बनाने की योजना बनायी थी, लेकिन सूचना लीक हो गयी और उन्हें अमेरिका, रूस व चीन के संयुक्त दबाव में हमला स्थगित करना पड़ा।
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चूंकि तब भारत हथियारों के क्षेत्र में आत्म निर्भर नहीं था अत: उन्होंने बड़े पैमाने पर हथियारों का उत्पादन शुरू किया। तेजस लड़ाकू विमान, अर्जुन टैंक, परमाणु अस्त्र आदि उनके द्वारा ही शुरू किये गए प्रोजेक्ट थे। शताब्दी और राजधानी आदि द्रुत गति की ट्रेनें भी उन्ही की देन है। उन्होंने भारत में विदेशी कम्पनियों को व्यापार करने की अनुमति नहीं दी ओर पेटेंट के क़ानून और मॉरीशस रुट को लागू करने से इंकार कर दिया। इसके अलावा इंदिरा जी ने ही नागालैंड का भारत में विलय करके इसे भारत का अंग बनाया था।
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अमेरिका इंदिरा जी की सामरिक नीति से जल भुन गया था, और किसी भी कीमत पर उन्हें गिराना चाहता था। अमेरिका कभी भी नहीं चाहता कि भारत या कोई भी देश हथियारों के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बने, जबकि इंदिरा जी स्वदेशी हथियारों के निर्माण के क्षेत्र में तेजी से बढ़ती जा रही थी। लेकिन पाकिस्तान पर हमला अमेरिका से बर्दाश्त नहीं हुआ और उसने भारत पर हमला करने के लिए अपना नौ सेना बेडा रवाना कर दिया था। यदि एन मौके पर पाकिस्तान के समर्पण करने से युद्ध समाप्त नहीं हो गया होता और रूस ने भारत का सहयोग नहीं किया होता तो भारत पर अमेरिका का हमला तय था।
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आशय यह है कि, इंदिरा जी के शासन से अमेरिका, चीन और पाकिस्तान बेहद नाराज थे और उन्होंने इंदिरा जी को गिराने के लिए हर संभव प्रयास किये।
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मोदी साहेब :

मोदी साहेब ने पाकिस्तान को दबाने की जगह उनसे बनाने को चुना। आतंकवादी घटनाओं के बावजूद मोदी साहेब ने पाकिस्तान से क्रिकेट से लेकर सभी प्रकार के व्यापारिक-सांस्कृतिक सम्बन्ध और बातचीत की प्रक्रिया जारी रखी। अमेरिका, ब्रिटेन, चीन और फ्रांस की कम्पनियों को भारत में कर मुक्त व्यापार करने की अनुमति दी। स्वदेशी हथियारों का उत्पादन करने की जगह अमेरिका-ब्रिटेन की कम्पनियों को भारत में आकर हथियारों का निर्माण करने का न्योता दिया। यहां तक कि अमेरिकी फौजो को भारत में सैन्य अड्डे बनाने के लिए भी हरी झंडी दे दी।
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[B] अप्रभावी समूह
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१) विपक्ष - यदि सरकार के पास लोकसभा में बहुमत है तो विपक्ष सिर्फ पोपाट कर सकता है, और इससे सरकार के स्थायित्व और सेहत पर कोई प्रभाव नहीं आता। 5 साल तक विपक्ष सरकार के खिलाफ हवा बनाने हेतु प्रदर्शन, आलोचना वगैरह करता है, पर सभी को पता रहता है कि ये सड़कों पर आकर कितना भी नाचे सरकार को तकनिकी रूप से कोई खतरा नहीं है। इस तरह से विपक्ष 5 साल तक जनता को भड़काता रहता है और सत्ता पक्ष जनता को पुचकारता रहता है। विपक्ष घोषित रूप से पीएम के खिलाफ ही होता है।
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एजेंडा - ऊपरी तौर पर सरकार की हर कीमत पर आलोचना करना और उसे जनता में बदनाम करना, ताकि फिर से सत्ता में लौटा जा सके, लेकिन अंदरखाने सरकार से गठजोड़ बनाये रखना ताकि मुनाफा कमाया जा सके।
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देवी इंदिरा गांधी :

इंदिरा जी के मुकाबले में विपक्ष बेहद कमजोर था। और खिलाफ तो खैर था ही।
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मोदी साहेब :

मोदी साहेब के विपक्ष से अंदरखाने सम्बन्ध मधुर है, हालांकि सार्वजनिक रूप से उनमे खिलाफत दिखाई देती है। मोदी साहेब ने विपक्ष को साधने के लिए पिछले 10 साल में कांग्रेस द्वारा किये गए सभी घोटालो पर 'कार्यवाही' करने में ढील दे दी। सोनिया से लेकर वाड्रा और मनमोहन से लेकर चिदम्बरम तक सभी घोटालो में लिप्त है। लेकिन इनमे से अब तक किसी पर भी कार्यवाही नहीं की गयी। इसीलिए विपक्ष मोदी साहेब के खिलाफ नहीं है। हाँ, मोदी साहेब की आलोचना करना उनका काम है , और वे यह रस्म निभाते रहते है।
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२) जनता - ये सबसे बड़ा लेकिन सबसे पंगु वर्ग है।
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यदि एक बार सरकार को बहुमत आ जाता है या सांसद गठजोड़ करके गठबंधन सरकार बना लेते है तो सरकार जनता के नियंत्रण से पूरी तरह से मुक्त है। भारतीय राज व्यवस्था में नागरिको के पास न तो अपने सांसदों को नौकरी से निकालने का अधिकार है न ही प्रधानम्नत्री, मुख्य्मंत्री आदि को। अत: जनता के हिस्से में अगले 5 वर्ष तक सिर्फ मूकदर्शक बने रहने के सिवा कोई चारा नहीं रहता। फिर भी कुछ उत्साही कार्यकर्ता अगले 5 वर्ष तक धरने, अनशन, प्रदर्शन, जुलुस आदि निकाल कर अपनी चेतना का प्रदर्शन या दूसरे शब्दों में अपनी ऊर्जा जाया करते रहते है। इससे कार्यकर्ताओ में यह संतोष रहता है कि वे सरकार के फैसलों के विरोध में 'कुछ' तो कर ही रहे है, लेकिन नेताओ को यह अच्छे से मालूम होता है कि ये अगले 5 साल तक उल्टे होकर भी लटके रहेंगे तो तकनिकी तौर पर हमारी सरकार का कुछ भी बिगाड़ नहीं सकते। इसीलिए वे ऐसी हरकतों को लोकतंत्र में 'अपनी आवाज उठाने का अधिकार' कहकर पुकारते है ।
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कभी किसी मुद्दे पर यदि जनता का एक विराट वर्ग सरकार के खिलाफ हो जाता है तो आगामी चुनाव में वोट गंवाने के भय से सरकारे अपना फैसला पलट लेती है। लेकिन बहुधा ऐसा शेष 1 वर्षो के दौरान ही होता है, तथा शुरुआती 4 वर्षो के दौरान नेता जनता के विरोध प्रदर्शनों से निस्पृह बने रहते है।
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लेकिन यदि मिडिया और धनिक किसी सरकार के खिलाफ हो जाए तो वे विपक्ष के साथ मिलकर किसी मुद्दे पर पूरे देश की जनता को सरकार के खिलाफ खड़ा कर सकते है। ऐसी स्थिति में सरकार को आगामी चुनावों में हारने का निश्चित रूप से खतरा पैदा हो जाता है, लेकिन तब भी तकनिकी रूप से सरकार सुरक्षित बनी रहती है। ऐसी स्थिति से बचने के लिए बहुधा सांसद पीएम का चेहरा बदलने के लिए किसी अन्य नेता को पीएम बना देते है।
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देवी इंदिरा गांधी :
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इंदिरा जी के शासन काल में जनता हमेशा उनके फेवर में रही। लेकिन देशी-विदेशी धनिको, बहुराष्ट्रीय कम्पनियो के खिलाफ फैसले लेने और बड़े पैमाने पर सैन्य क्षमता जुटाने के प्रयासों से ये वर्ग तथा अमेरिका उनके खिलाफ हो गया। सभी ने उन्हें गिराने के लिए सम्मिलित प्रयास किये और चहुँ और से घिर जाने पर उन्होंने एक भयंकर भूल की। उन्होंने आपातकाल लगा दिया। आपातकाल के कारण जनता पर दमन हुआ और जनता उनके खिलाफ हो गयी। 1977 के चुनावो में उन्हें हार का सामना करना पड़ा लेकिन वे 2 साल बाद फिर से सत्ता में लौटी।
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मोदी साेहब :
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मोदी साहेब को अपने 2 साल के कार्यकाल में जनता का पूरा समर्थन हासिल रहा।
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यह बात बिल्कुल साफ थी कि यदि इंदिरा जी भारत की सेना को मजबूत बनाने के प्रयास करेगी और विदेशी निवेश को अनुमति नहीं देगी तो उन्हें अमेरिका व बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के भीषण प्रतिरोध का सामना करना पड़ेगा। लेकिन उन्होंने इस प्रतिरोध से निपटने के लिए सिर्फ खुद पर भरोसा किया भारत की जनता पर नहीं। यदि वे इस प्रतिरोध से निपटने के लिए 1972-73 में ही देश में राईट टू रिकॉल, ज्यूरी सिस्टम प्रक्रियाएं लागू कर देती तो उन्हें आपातकाल का सहारा नहीं लेना पड़ता। इस तरह सच्चे लोकतंत्र को प्रोत्साहित न देने के कारण वे अपने कार्यकाल के दौरान दो भयंकर भूलें ( आपातकाल व ब्लू स्टार ) करने के लिए बाध्य हुयी। इन दो घटनाओं को निकाल दें तो इंदिरा जी के कार्यकाल ने देश को जो मजबूती दी उसके आस पास तक भी कोई पीएम नहीं फटक सका है।
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जहां तक मोदी साहेब की बात है, उन्होंने पीएम बनते ही समझौता वादी रूख अख्तियार कर लिया, और उन सभी शक्ति पुंजों से दब गए जिनसे मुकाबला करने के लिए उन्हें चुना गया था। इन दो सालो में मोदी साहेब बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और धनिको के सामने इतना पसर चुके है कि अब उनकी वापसी लगभग असम्भव है। यदि उन्होंने अपनी धारा बदली तो उन पर पीएम की कुर्सी गंवाने का खतरा मंडराने लगेगा। और यह जोखिम उठाने के लिए मोदी साहेब कभी तैयार नहीं होंगे। कीमत चाहे जो चुकानी पड़े।
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समस्या यह है कि 1991 के बाद से भारत के सभी प्रधानमंत्री बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के एजेंडे पर कार्य कर रहे है, जिससे हमारी आर्थिक, सामरिक और सांस्कृतिक-धार्मिक व्यवस्था लगातार बिगड़ती जा रही है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के एजेंडे पर करने से नेताओं को काफी सहूलियत रहती है। उनकी नीतियों को लागू करने से पेड मीडिया जनता में इनकी सकारात्मक छवि बनाए रखता है जिससे चुनाव जीतना आसान हो जाता है तथा बदले में इन्हे भारी मात्रा में घूस भी मिलती है। लेकिन इन नीतियों से देश को नुकसान होने के बावजूद जनता नेताओं को देश हित के एजेंडे पर कार्य करने को बाध्य नहीं कर पाती।
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समाधान यह है कि भारत के आम नागरिकों को इस प्रकार के अधिकार दिए जाए, जिससे वे पूरे पांच वर्ष तक पीएम और सांसदों पर नियंत्रण रख सके। राईट टू रिकॉल, ज्यूरी सिस्टम और जनमत संग्रह प्रक्रियाएं ऐसे ही शासन की रचना करती है। राइट टू रिकॉल प्रधानमंत्री और राईट टू रिकॉल सांसद के कानूनों के गैजेट में प्रकाशित होने से नागरिकों का हर समय प्रधानमंत्री/सांसदों पर नियंत्रण बना रहेगा। यदि तब प्रधानमंत्री देश हित के एजेंडे पर कार्य नहीं करता तो आम नागरिक बहुमत का प्रयोग करके उन्हें नौकरी से निकाल सकेंगे। नौकरी खोने का यह भय ही पीएम की नीतियों में बदलाव लाएगा और वे देश हित के एजेंडे पर कार्य करेंगे।
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राईट टू रिकॉल पार्टी द्वारा प्रस्तावित प्रधानमंत्री को नौकरी से निकालने की प्रक्रिया नीचे दिए गए लिंक पर देखी जा सकती है :
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राईट टू रिकॉल प्रधानमंत्री के लिए प्रस्तावित कानूनी ड्राफ्ट :
https://web.facebook.com/pawan.jury/posts/837611029690468
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