Pawan Jury BhilwaraRj

भारत को एनएसजी में सदस्यता की इतनी फिक्र नहीं करनी चाहिए। ये फिक्र अमेरिका की है भारत की नहीं। अमेरिका भारत को एनएसजी में शामिल करने को लेकर बहुत उत्सुक है, और अमेरिका के कहने से ही भारत को शेष सदस्य देशों का समर्थन मिला है। विरोध करने वाले देशों को भी रास्ते पर लाने का बल अमेरिका के पास ही है, हमारे पास नहीं। तो जब अमेरिका हमें एनएसजी में घुसाने के प्रयास कर रहा है तो भारत की रजामंदी विषय ही नहीं है। प्रयास तो दूर की बात है।
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जहां तक चीन के विरोध का प्रश्न है इससे 'निपटने' के कई तरीको में से कुछ इस प्रकार हो सकते है।
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1) यदि अमेरिका की तरह हम चीन को भी भारत में 2-5 रिएक्टर लगाने की अनुमति दे दे तो चीन मान जाएगा।
2) यदि हम चीन को 5-7 कर मुक्त सेज और दे दे या उनके माल को भारत में डम्प करना और भी आसान बना दे, तो भी चीन हमारा समर्थन कर देगा।
3) या हम MTCR के लिए चीन का समर्थन करके एनएसजी के लिए चीन का समर्थन पा सकते है।
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पर इन विकल्पों पर भी हमें निर्णायक विचार करने की जरूरत नहीं है। क्योंकि इस बारे में भी फैसला अमेरिका को ही करना है कि चीन से समझौता किन शर्तों पर होगा। तो एनएसजी का मामला चीन और अमेरिका के बीच का विषय है, हमारी स्थिति न्यूट्रल है।
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हमें विचार इस पर करना चाहिए कि हमें एनएसजी से हासिल क्या होगा। यह परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में एफडीआई को आसान बनाने से ज्यादा कुछ नहीं है। भारत ने 40 साल पहले अपने बूते परमाणु ताकत जुटाई थी। और आज हम अपना परमाणु ऊर्जा क्षेत्र विदेशियों को हवाले करने का जश्न मना रहे है !!
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तो देर सवेर अमेरिका हमें यह जश्न मनाने का अवसर अवश्य देगा।
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