Pawan Jury BhilwaraRj

क्या सरकार के मंत्री एफडीआई से पैसा बना रहे है ? पेड मीडिया सोनिया-मोदी-केजरीवाल की छवि इस तरह से पेश करता है जैसे वे दूध के धुले हो और घूस खाना हराम समझते हो, इसीलिए ज्योंही कोई कार्यकर्ता सोनिया-मोदी-केजरीवाल के घूस खाने की चर्चा करता है, इनके अंध भगत हल्ला मचाने लगते है। लेकिन मेरे विचार में हमे कोलाहल मचाने वाले अंध भगतो से हमें ब्लॉक कर देने के लिए कहना चाहिए और इस बात पर विमर्श करना चाहिए कि आखिर क्यों सोनिया-मोदी-केजरीवाल अंधाधुंध विदेशी निवेश की अनुमति दे रहे है।
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एफडीआई के माध्यम से बहुराष्ट्रीय कम्पनियां किसी देश की अर्थव्यवस्था के एक के बाद एक सभी क्षेत्रों को अधिग्रहित करती है, विज्ञान-गणित के ढांचे को तोड़ती है, और अंत में स्थानीय धर्म को ईसाई धर्म द्वारा प्रतिस्थापित कर देती है।
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साफ है कि एफडीआई से बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को होने वाला लाभ इतना ज्यादा है कि वे प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री आदि को अनुमतियों के बदले अकूत धन चुकाने से पीछे नहीं हटेगी।
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कांग्रेस के सभी मंत्रियों और वाजपेयी के मंत्रिमंडल ने भी भारत में एफडीआई की अनुमति देकर खरबो रूपये बनाए है। कई मंत्रियों ने घूस नकदी के रूप में ली, कुछ ने अन्य किसी माध्यम से और कुछ ने दोनों तरीकों से। घूस खाने का सबसे सुरक्षित और प्रचलित तरीका है --- सकारात्मक मीडिया प्रसारण और पद। उदाहरण के लिए पी वी नरसिम्हा राव बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के समर्थन से प्रधानमंत्री और मनमोहन सिंह जी वित्त मंत्री बने और दोनों ने ही पदासीन होकर उनका उपकार चुकाने के लिए भारत में बहुराष्ट्रीय कम्पनियो के लिए दरवाजे खोल दिए। इसी तरह से एक साधारण से कार्यकर्ता अरविंद गांधी ने पेड मीडिया के सहयोग से मुख्यमंत्री की कुर्सी हासिल की और बदले में एफडीआई की नीति का समर्थन करने का फैसला किया।
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तो इस परिस्थिति में सवाल यह उठता है कि --- मोदी साहेब खुद और उनके मंत्री बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से नकद या किसी अन्य तरीके से कितनी मात्रा में घूस खा रहे है ? जहां तक मोदी साहेब का विषय है, उनकी बही सार्वजनिक है, और यह साफ नजर आता है कि उन्हें बहुराष्टीय कम्पनियो से कितनी घूस मिल रही है। मोदी साहेब घूस के रूप में सकारात्मक मीडिया कवरेज ग्रहण करते है। मोदी साहेब को बहुराष्ट्रीय कम्पनियो द्वारा संचालित पेड मीडिया द्वारा 24*7 घंटे सकारात्मक और "झूठा नकारात्मक प्रचार"(*) मिल रहा है, जो यह सुनिश्चित करता है कि 2019 के चुनावों में मोदी साहेब के फिर से प्रधानमंत्री बनने में कोई बाधा नहीं आएगी। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या वे भारत में बीजीपी के संगठन को मजबूत करने के लिए एफडीआई के एवज में घूस के रूप में नकदी भी ले रहे है ? और क्या वे निजी तौर पर भी नकदी इकट्ठी कर रहे है ? पूरी दुनिया के मंत्रियों में अपने देश से बाहर पैसा जमा करने की प्रवृति है, ताकि विद्रोह या अन्य किसी कारण से देश के उड़ जाने पर वे देश से भागकर सुरक्षित स्थान पर शरण लेकर अपना शेष जीवन आराम से व्यतीत कर सके।
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या मोदी साहेब को अदालती मुकदमों और फर्जी डिग्री के प्रकरणों के माध्यम से ब्लेकमेल किया जा रहा है ?
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और अरविंद गांधी क्यों एफडीआई का बेतहाशा समर्थन कर रहे है ? सिर्फ कुछ दिन पहले ही अरविंद गांधी ने दिल्ली में गटर लाइने डालने तक का काम भी जापानियों को देने की मंशा जाहिर कि !! बताइये !!! अमेरिका और यूरोप के शहरों जैसे लंदन व न्यूयॉर्क में 1920 में डाले गए गटर भी इतने अच्छे से काम करते है कि भारत के सभी शहरों में उसी तकनीक से लाइने डाल कर इस समस्या को हल किया जा सकता है। लेकिन अरविंद गांधी को 100 साल पुरानी इस तकनीक के लिए भी एफडीआई चाहिए !!! इससे उनके असली मंसूबो का पता चलता है।
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जब कभी मनमोहन सिंह ने एफडीआई के क्षेत्र में सीमा को 1% भी बढ़ाया, प्रत्येक संघ सेवक, आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता और भारत स्वाभिमान ट्रस्ट के गोइंदो ने कहा कि, "मनमोहन ने घूस खाई है, सोनिया ने घूस खाई है, कांग्रेस के इस मंत्री ने घूस खाई उसने घूस खाई ..... आदि"। और अब मोदी साहेब एफडीआई के क्षेत्र में मनमोहन की तुलना में कई गुना तेजी से कार्य कर रहे है। लेकिन प्रत्येक संघ सेवक अब यह नारा लगा रहा है कि, "एफडीआई को अनुमति देने के लिए मोदी साहेब ने एक पैसा भी नहीं लिया, नहीं लिया, नहीं लिया, नहीं लिया ......." !!! और आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता कहते घूम रहे है की, "एफडीआई के बदले केजरीवाल एक पैसा भी नहीं लेते" !!
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भारत में एफडीआई की सभी क्षेत्रों में अंधाधुंध अनुमति देने और अर्थ्यवस्था के सभी क्षेत्रों को विदेशियों को हवाले कर देने के फैसलों के संदर्भ में इस बात पर गम्भीर चर्चा होनी चाहिए कि इसके बदले में मोदी साहेब बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से निजी लाभ उठा रहे है, पार्टी के लिए भारी अनुदान ले रहे है, या उन्हें ब्लेकमेल किया जा रहा है। मुझे पता है कि जो कोई भी मोदी साहेब की आलोचना नर्म लहजे में भी करता है मोदी साहेब के अंध भगत उन पर धौंस जमाते है, धमकाते है और उन्हें दबाने की कोशिश करते है। लेकिन अब यह जरूरी हो गया है कि उनकी इस धौंसपट्टी की अवहेलना की जाए।
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इस समय इस बात पर खुली चर्चा शुरू होना बेहद जरूरी है कि, आखिर क्यों मोदी साहेब एफडीआई के क्षेत्र में मनमोहन की तुलना में 10 गुना ज्यादा उत्साह से काम कर रहे है। सम्भावनाएं इन बिंदुओं से बाहर नहीं है --- घूस के रूप में नकदी लेना ताकि निजी और भविष्य हितों के लिए इसे सुरक्षित रखा जा सके, फर्जी डिग्री और कोर्ट केस के मामलों को लेकर ब्लेकमेल किया जाना, मीडिया से सकारात्मक कवरेज पाने की लालसा ताकि 2019 के चुनावों में फिर से पीएम बना जा सके या बीजेपी के संगठन को विस्तार देने के लिए अनुदान लेना।
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(*)"झूठे नकारात्मक प्रचार" से आशय पेड मीडिया द्वारा की गयी ऐसी आलोचना से है जिससे आलोचना के बावजूद वोटो में इजाफा होता है। उदाहरण के लिए, पेड राजदीप सरदेसाई को मोदी साहेब ने इस काम पर लगा कर रखा है कि वे पूरे भारत में यह भ्रम फैलाते रहे कि "मोदी साहेब साम्प्रदायिक एजेंडे पर कार्य कर रहे है"। इससे बहुसंख्यक हिन्दू वोट मोदी साहेब के पक्ष में लामबंद हो जाते है, और मोदी साहेब हिंदूवादी एजेंडे को दरकिनार करके एफडीआई के मुद्दे पर निशंक कार्य करते रह सकते है।
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