Pawan Jury BhilwaraRj
राजतन्त्र और लोकतंत्र में से कौनसी व्यवस्था बेहतर है ?
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मैं लोकतंत्र का समर्थक हूँ। लेकिन भारत और पूरी दुनिया के कई कार्यकर्ताओ में यह धारणा है कि राजतन्त्र लोकतंत्र की तुलना में बेहतर शासन व्यवस्था है !!!
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राजतन्त्र के समर्थकों की अपने पक्ष में मुख्य दलील यह है कि --- एक निर्वाचित प्रधानमंत्री यह जानता है कि वह 5 -10 वर्ष तक ही सत्ता में रह सकेगा। और अगला राजा उसका पुत्र नहीं होगा। अत: उसकी दृष्टि नजदीकी लाभ पर ही टिकी रहती है और वह दूरदृष्टि से निर्णय नहीं करता। इसीलिए वह अपने और अपने घनिष्ठ व्यक्तियों के लाभ के लिए काम करता है, न कि पूरे राज्य के लिए। जबकि एक राजा का आजीवन सत्ता में बना रहता है, और वह यह भी जानता है कि उसके बाद राज्य की बागडोर उसके वारिस के पास होगी। इसीलिए वह अपने राज्य को समृद्ध बनाने का प्रयास करता है। इसीलिए राजतन्त्र बेहतर है।
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कृपया अधिक जानकारी के लिए इस विषय पर गूगल करें।
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सभी कार्यकर्ताओ को इस विषय पर अपना रूख तय करना चाहिए।
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इस विषय पर मैं अपनी प्रतिक्रिया 3-4 दिन में रखूंगा।
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राहुल चिमनभाई मेहता
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मूल प्रश्न यहां देखें -- https://web.facebook.com/mehtarahulc/posts/10153562568776922
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मेरी प्रतिक्रिया :
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मेरे विचार में राजशाही की तुलना में तानाशाही के समर्थकों की संख्या अधिक है। राजशाही के दिन लद चुके है। दरअसल वे तानाशाही का समर्थन करते है। और वे लोक की श्रेणी में होने के बावजूद तानाशाही का समर्थन करने के लिए इसीलिए बाध्य होते है, क्योंकि -- 1) वे सच्चे लोकतंत्र की प्रक्रिया से परिचित नहीं है, अत: विद्रूप लोकतंत्र को ही लोकतंत्र समझते है। अत: इस विद्रूप लोकतंत्र के प्रभावहीन नतीजे को देखकर उनका लोकतंत्र से मोहभंग हो जाता है। 2) लोकतंत्र को खारिज किए जाने के बाद अन्य 'ज्ञात' विकल्प सिर्फ तानाशाही और राजतन्त्र है, अत: वे बलात रूप से तानाशाही/राजशाही की तरफ आकर्षित होते है।
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राजतन्त्र , तानाशाही व लोकतंत्र
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monarchy = राजतन्त्र, dictatorship = तानाशाही, democracy = लोकतंत्र
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1) राजतन्त्र और तानाशाही में फर्क है। राजतन्त्र में वारिस खून से तय होता है। अवाम राजसी रक्त रेखा को शासक के रूप में देखती है और शाही खून को अपना स्वाभाविक शासक समझती है। राजा अच्छा काम करता है तो यह वफादारी बनी रहती है वरना विद्रोह हो जाते है।
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2) तानाशाह लागू व्यवस्था को धवस्त करके सत्ता हथियाता है या सत्ता में आकर राजा की नियुक्ति की व्यवस्था को ध्वस्त कर देता है। बहुधा तानाशाह सैन्य बल से सत्ता में काबिज होते है। तानाशाह अच्छा काम करता है तो ठीक वरना जनता विद्रोह कर देती है।
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3) लोकतंत्र एक पोस्टर है। इसकी प्रक्रिया महत्त्वपूर्ण है। यह सच्चा भी हो सकता है और विद्रूप भी। यदि लोकतंत्र होने के बावजूद सत्ताधीशो पर लोक का नियंत्रण नहीं है तो यह विद्रूप लोकतंत्र है।
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तर्क दिया जाता है कि , "एक निर्वाचित प्रधानमंत्री यह जानता है कि वह 5 -10 वर्ष तक ही सत्ता में रह सकेगा। और अगला राजा उसका पुत्र नहीं होगा"।
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इस तर्क में विरोधाभास है। चुन कर आया पीएम भी राजकाज अच्छा चलाने के प्रयास करेगा, ताकि उसके फिर से चुनकर आने की सम्भावनाएं बढ़ जाए। बात 5 या दस वर्ष की नहीं है। पीएम या सीएम चाहे तो अपने शेष जीवनकाल में निरंतर सत्ता में बने रहते है। इंदिरा जी व ज्योति बसु इसका उदाहरण है। साथ ही लोकतंत्र में एक अच्छा नेता आसानी से अपने वारिसों को सत्ता शीर्ष पर स्थापित कर सकता है।
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दलील है कि, "जबकि एक राजा का आजीवन सत्ता में बना रहता है, और वह यह भी जानता है कि उसके बाद राज्य की बागडोर उसके वारिस के पास होगी।"
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यह भी ठीक नहीं है। क्योंकि कितने ही राजवंशो ने बेहद लम्बे समय तक शासन किया लेकिन उनकी राजव्यवस्था कमजोर रही। इसके अलावा राजशाही किसी राजवंश के निरंतर सत्ता में रहने को सुनिश्चित नहीं करता। उन्हें आंतरिक षडयंत्रो और विद्रोहों के चलते सत्ता खोनी पड़ी है।
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शासन व्यवस्था कोई भी हो मूल विषय है कि --- अधिकार किस वर्ग के पास रहेगा तथा राज्य कब तक टिका रहेगा।
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शासक किसी भी व्यवस्था के अंतर्गत कार्य करे वह अधिकार अपने पास रखना चाहता है। उसे यह भय रहता है कि यदि अधिकार उसे हाथ से निकल कर प्रजा के पास चला गया तो प्रजा उसे पद से च्युत कर सकती है। जब प्रजा पर दमन होता है या प्रजा की ठीक से देखभाल नहीं होती तो प्रजा अधिकार मांगती है। जैसे जैसे प्रजा के हाथ में शक्ति (हथियार) और अधिकार (व्यवस्था में हस्तक्षेप) आएंगे राजा की शक्ति घटती जाएगी, और अंततोगत्वा लोकतंत्र* की स्थापना होगी। शासन व्यवस्था के विकास के क्रम की यही धारा है।
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(*) यदि किसी शासन व्यवस्था में दण्ड देने की शक्ति और राजवर्ग को पद से च्युत करने की शक्ति लोक के पास है तो यह लोकतंत्र ही कहलायेगा। चाहे इसे आप किसी भी नाम से पुकारे। उदाहरण के लिए ब्रिटेन में सांकेतिक रूप से राजा शासन करता है, लेकिन अवाम के पास शासन को दिशा देने के लिए पर्याप्त शक्तियां है। अत: यह लोकतंत्र है।
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प्रजा के पास अधिकार आने से शोषण में कमी आती है, आय का समान वितरण होता है तथा निर्माण उद्योगों में तेजी आने से तकीनीक विकास होता है। तकनीकी विकास से अमुक राज्य आधुनिक हथियारों का उत्पादन करने में सक्षम हो जाता है, और नतीजे में राष्ट्र बाह्य आक्रमणों का प्रतिरोध करने और अन्य देशों पर कब्जा कर अपने राज्य का विस्तार करने में सक्षम हो जाता है।
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अत: शासन व्यवस्था कोई भी हो, मेरे विचार में प्रजा के पास दण्ड देने की शक्ति और राजवर्ग को सत्ता से च्युत करने का अधिकार अवश्य होना चाहिए। इसी से राष्ट्र समृद्ध व मजबूत होगा। राईट टू रिकॉल और ज्यूरी सिस्टम प्रक्रियाएं ऐसी ही व्यवस्था की रचना करती है।
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तो इस प्रकार यदि कोई राजा या तानाशाह या प्रधानमंत्री अपने राज्य को समृद्ध बनाने के साथ साथ सैन्य दृष्टि से भी मजबूत बनाना चाहता है ताकि उसका राज्य टिका रहे तो वह अवश्य ही जनता के हाथो में शक्ति और अधिकार देगा। इससे राज्य और राजा दोनों ही अपने अस्तित्व को बनाए रखेंगे।
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कैसे सच्चा लोकतंत्र किसी भी अन्य व्यवस्था की तुलना में ज्यादा ताकतवर और समृद्ध बना देता है, इस सम्बन्ध में अधिक विवरण के लिए यह लेख देखें --- https://web.facebook.com/pawan.jury/posts/921182058000031
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