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और इस तरह महात्मा सुभाष चन्द्र बोस ने खुद को संघ की चपेट में आने से बचा लिया था।
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"जब डॉ केशव बलिराम हेडगेवार 1928 में कांग्रेस वर्किंग कमिटी के सालाना अधिवेशन में भाग लेने कलकत्ता गए थे तो उन्होंने सुभाष चन्द्र बोस से मुलाक़ात की थी। सुभाष बाबू तब कलकत्ते के मेयर थे, और उन्होंने मुलाकात के लिए सिर्फ 10 मिनिट का समय दिया था। लेकिन जब इन दोनों हस्तियों ने बातचीत शुरू की तो जैसे घड़ी की सुइयाँ ठहर गयी। उनके बीच में घंटो तक विचारों का आदान प्रदान होता रहा। डॉक्टर साहेब के ठोस और बेबाक जवाबो ने सुभाष बाबू की सभी जिज्ञासाओं को शांत किया और उन्हें गहराई तक प्रभावित किया। और अंत में डॉक्टर साहेब ने सुभाष बाबू से संघ से जुड़ने और इसके लिए सक्रीय रूप से काम करने का आग्रह किया।
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सुभाष बाबू ने जवाब दिया कि, डॉक्टर साहेब आपने जो भी कहा उससे मैं पूर्णत सहमत हूँ। इसमें कोई संदेह नहीं कि सिर्फ आप ही है जिसके पास भारत को स्वतंत्र कराने के लिए सबसे प्रभावशाली तरीका है। लेकिन मैं इस कार्य को राजनैतिक रूप से करने में पूरी तरह से जुटा हुआ हूँ, अत: अन्य किसी वैकल्पिक दिशा में कार्य करने की स्थिति में नहीं हूँ। इसीलिए मेहरबानी करके आप मुझे तो माफ़ ही कर दीजिये"।
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सन्दर्भ - Dr Hedgewar : The Epoch Maker, A biography. page : 46, Publisher : RSS
http://www.rss.org/Encyc/2015/8/8/334_12_29_25_Dr.Hedgewar_The_Epoch_Maker.pdf
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राष्ट्रपिता महात्मा सुभाष चन्द्र बोस जानते थे कि संघ युवाओं को गैर राजनैतिक, सामाजिक सेवा कार्यों में खपा कर ब्रिटिश राज के खिलाफ उठ रहे क्रांतिकारियों के आंदोलन को तोड़ रहा है, और इससे सिर्फ अंग्रेजो को ही लाभ होगा। इसीलिए उन्होंने बड़ी सफाई से हेडगेवार जी को टरका दिया। लेकिन मधुकर दत्तात्रेय देवरस -जो कि आगे चलकर 1974 में संघ के तीसरे सर संघसंचालक बने - और अन्य लाखों युवा इतने परिपक्व नहीं थे कि वे इस बात को समझ पाते। उल्लेखनीय है कि देवरस महात्मा भगत सिंह से प्रेरित होकर अंग्रेजो पर इसी तरह का हमला करने की योजना बना रहे थे। लेकिन एन वक्त पर हेडगेवार जी ने उन्हें और उनके साथियो को समझा बुझा कर भगत सिंह जी के रास्ते को छोड़ने और संघ के 'महान और ऊँचे आदर्शो' के लिए काम करने के लिए राजी कर लिया था।
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जब हेडगेवार सुभाष बाबू से मिले तो वे परिपक्व हो चुके थे। यदि वे नवयुवक होते तो सम्भावना थी कि हेडगेवार उन्हें उषा काल में आकर व्यायाम करने, लाठी चलाना सीखने, कम्बल बांटने, ध्वज वंदना करने, पथ संचलन निकालने और नारे लगाने जैसे संघ की 'महान गतिविधियों' में लगा देते। मुझे नहीं पता तब आजाद हिन्द फ़ौज खड़ी करने जैसा 'साधारण' कार्य कौन करता। लेकिन इतना तय है कि तब शायद भारत को आजादी के लिए और भी लम्बा इन्तजार करना पड़ता।
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आज भी संघ अपनी उसी नीति पर काम कर रहा है। आज संघ के पास 70 लाख स्वयंसेवकों को फ़ौज है। लेकिन वे सभी आज भी संघ के उन्ही ऊँचे आदर्शो के नाम पर अपना समय और ऊर्जा जाया कर रहे है। संघ इन कार्यकर्ताओ को पौने पांच साल तक अनुपयोगी गतिविधियों में उलझाए रखता है और चुनावों में इन्हे बीजेपी के लिए वोट इकट्ठे करने के लिए लगा देता है। और संघ के स्वयं सेवक समझते है कि वे 'वैभवशाली भारत' के निर्माण के लिए कार्य कर रहे है !! संघ ने हमेशा अपने कार्यकर्ताओ को उन कानूनों का विरोध करने के लिए कहा जिनकी सहायता से भारत को मजबूत और वैभवशाली बनाया जा सकता है। और आज भी संघ अपने सभी स्वयंसेवकों को भ्रष्टाचार मिटाने, स्वदेशी इकाइयों को सरंक्षित करने, गरीबी दूर करने और न्याय व्यवस्था को सुधारने के लिए आवश्यक राईट टू रिकॉल, ज्यूरी सिस्टम आदि कानूनों का विरोध करने की नसीहत देता है।
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संघ के सभी स्वयंसेवक समर्पित है और उनकी देश के प्रति निष्ठा संदेह से परे है। लेकिन संघ का शीर्ष नेतृत्व कभी भी राष्ट्रवादी नहीं रहा। यदि कोई व्यक्ति राजनैतिक रूप से उदासीन है तो उस पर कोई दोष नहीं। पर यदि कोई राष्ट्रवाद और हिन्दुवाद के नाम पर बड़े पैमाने पर सक्रीय और समर्पित कार्यकर्ताओ को खींच कर जान बूझकर अनुपयोगी गतिविधियों में उलझा देता है तो इससे राष्ट्र की ऊर्जा की क्षति होती है।
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आप अंदाजा लगा सकते है कि देवरस की तरह कितने क्रांतिकारी विचारों वाले युवाओं को संघ ने निष्क्रिय करके ब्रिटिश राज को फायदा पहुंचाया होगा। इधर यह काम महादुरात्मा गांघी कर रहा था तो उधर से यह काम हेडगेवार कर रहे थे। और इसीलिए महात्मा सुभाष बाबू को सेना खड़ी करने के लिए देश से बाहर जाना पड़ा। क्योंकि देश के सभी युवान या तो चरखे चला रहे थे या फिर पथ संचलन निकाल रहे थे।
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जो इतिहास में हो चुका है उसे जाने दीजिये लेकिन समस्या यह है कि आज भी संघ देश की सेना को मजबूत बनाने और अन्य समस्याओं को सुधारने के कानूनों का विरोध कर रहा है। इससे रिकालिस्ट्स और अन्य कार्यकर्ताओ को आवश्यक कानूनों की जानकारी नागरिकों तक पहुंचाने के लिए समर्पित कार्यकर्ताओ की कमी हो गयी है।
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