Pawan Jury BhilwaraRj
आप चुनिये ... हम हटाएंगे।
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2012 में उत्तराखंड के 50 लाख मतदाताओं ने 70 विधायकों को सरकार चलाने के लिए चुना था। कांग्रेस को बहुमत मिला और अब ये सरकार चलेगी या नहीं इसका फैसला करने का अधिकार इन लोगो को है :
१. विधायक - ये 70 लोग जिन मतदाताओं के प्रतिनिधि है उनसे बिना पूछे एक पार्टी से कूदकर दूसरी पार्टी में जाकर सत्ता परिवर्तन कर सकते है ! और ये इनका लोकतांत्रिक अधिकार है !!
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२. स्पीकर - इस आदमी की नियुक्ति राज्य सरकार करती है। और इस आदमी को यह अधिकार है कि वह किस सरकार के कितने विधायकों को दल बदल करने के आरोप में निलम्बित करे और कब तक मामले को तकनिकी तौर पर लटकाए रखे !!
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३. राज्यपाल - इस आदमी की नियुक्ति प्रधानमंत्री करते है। इस आदमी को यह अधिकार है कि अपने विवेकाधिकार का प्रयोग करते हुए किसी चुनी हुयी सकरार को हटाकर राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर दे !!
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४. प्रधानमंत्री - इन साहेब को ये अधिकार है कि ये किसी भी सरकार को बिना मतदाताओं को पूछे बर्खास्त कर सकते है या राष्ट्रपति शासन लगा सकते है !!
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५. सुप्रीम कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश - ये आदमी प्रधानमंत्री, मुख्य्मंत्री समेत उपरोक्त वर्णित किसी भी व्यक्ति को फूंक मार कर उड़ा सकता है तथा क़ानून क्या कहता है, यह बताने का अधिकार भी इसी व्यक्ति के पास है !!
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तो लोकतंत्र का मुरब्बा यह है कि -- प्रधानमंत्री और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश नामक पदों पर बैठे दो व्यक्तियों की मंशा 50 लाख मतदाताओं तुलना में ज्यादा महत्त्व रखती है। हो सकता है कि उत्तराखंड के ज्यादातर मतदाता कांग्रेस से दुःखी हो कर बीजेपी की सरकार चाहते हो या ये भी हो सकता है कि अधिकतर मतदाता कांग्रेस की सरकार को ही कायम रखना चाहते हो। पर मतदाताओं के पास पूछने कौन जाता है ?
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कुल मिलाकर जिस सरकार को लाखों-करोड़ो मतदाता चुनते है, उस सरकार को 5 वर्ष से पहले हटाने का अधिकार कुछेक लोगो के पास है, और उन्हें यह अधिकार कानूनी रूप से मिला हुआ है। लेकिन जब 5 वर्ष पहले अपने प्रतिनिधियों को हटाने के इसी अधिकार को नागरिकों को दिए जाने की मांग की जाती है तो सभी बुद्धिजीवी और नेता ऐसी 'राईट टू रिकॉल' प्रक्रियाओं का संगठित होकर विरोध करते है !!!
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क्या उत्तराखंड के मतदाताओं के पास ऐसी कोई कानूनी प्रक्रिया है जिससे वे बिना चुनाव करवाए यह बात बता सके कि वे मौजूदा कांग्रेस सरकार को जारी रखना चाहते है या हटाना चाहते है ?
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क्या एक बार वोट करने के बाद अन्य किसी राज्य या देश के मतदाताओं के पास ऐसी कोई प्रक्रिया है जिससे वे अपने राज्यों के मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के सम्मुख अपनी शिकायत/सुझाव आदि संगठित तरीके से रख सके ?
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क्या भारत के मतदाताओं के पास चुनाव में वोट करने के अलावा 5 वर्षो के दौरान अन्य किसी मसले पर अपनी बात सरकार के सम्मुख रखने या जनमत संग्रह की प्रक्रिया नहीं होनी चाहिए ?
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समाधान ?
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सिर्फ तीन धाराओं के प्रस्तावित 'टीसीपी' क़ानून के गैजेट में प्रकाशित होने से भारत के नागरिकों को ऐसी प्रक्रिया मिल जायेगी जिससे वे चुनावों के अलावा भी अपनी आवाज प्रधानमंत्री और मुख्य्मंत्री के सामने रख सकेंगे। यदि आप चाहते है कि भारत के नागरिकों के पास ऐसी प्रक्रिया होनी चाहिए तो अपने क्षेत्र के विधायक/सांसद को एसएमएस द्वारा आदेश भेजे कि टीसीपी के प्रस्तावित क़ानून को गैजेट में प्रकाशित किया जाए। प्रक्रिया का प्रस्तावित ड्राफ्ट निचे दिए गए लिंक पर देखा जा सकता है।
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'जनता की आवाज - पारदर्शी शिकायत प्रणाली' के लिए प्रस्तावित कानूनी ड्राफ्ट :
www.facebook.com/pawan.jury/posts/809753852476186
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