Pawan Jury BhilwaraRj

एक 'ईमानदार' जिला शिक्षा अधिकारी की पीड़ा !!
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मैंने हमेशा मेरे पेशे के प्रति पूरी ईमानदारी बरती और आज भी बरतता हूँ। मैं भी एक मध्यम वर्गीय परिवार में पला बढ़ा, अत: अभिभावकों की पीड़ा भी समझता हूँ। लेकिन मैं मजबूर हूँ। मुझमे इतना हौंसला नहीं है कि अपने ईमानदारी के पालन के लिए अपने कॅरियर को दांव पर लगा दूँ। जब मैं अभिभावकों को मेरे खिलाफ प्रदर्शन करते हुए गर्मी के मौसम में सड़कों पर धूल फाँकते, उद्यान बैठकों में पसीना बहाते, कड़कती धूप में कलेक्टरी के दरवाजे पर निरुपाय रूप से ज्ञापन देने के झुण्ड में खड़े देखता हूँ तो व्यथित हो जाता हूँ। उनकी मांगे जायज है। अच्छी शिक्षा सभी को कम से कम कीमत पर मिलनी चाहिए। लेकिन मैं उनकी मांगो पर ध्यान न देने के लिए बाध्य हूँ।
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मुझे मालूम है कि शिक्षा विभाग अब शिक्षा माफिया बन चुका है और शिक्षा की निजी दुकाने मेरे ही सरंक्षण में अभिभावकों का खून चूस रही है। और भविष्य में भी ऐसा ही चलता रहेगा। यदि अभिभावक इस स्थिति में परिवर्तन चाहते है तो उन्हें मुझे मेरे राजनैतिक आकाओ से आजाद करना होगा। आज भी सिस्टम में मेरे जैसे लोगो की कमी नहीं है, जो किसी जिले की शिक्षा व्यवस्था में सिर्फ 1 महीने में इतना बड़ा परिवर्तन ला सकते है जितना अभिभावक कल्पना भी नहीं कर सकते। लेकिन फिलहाल मैं भी अपने आकाओ की गुलामी कर रहा हूँ। कभी कभी लगता है कि मैं शिक्षा के नहीं बल्कि रंगदारी के व्यवसाय में हूँ। यदि मैं यह रंगदारी नहीं करूँगा तो या तो निकाल दिया जाऊँगा या दूर दराज इलाको में फेंक दिया जाऊँगा।
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इसीलिए अपनी खाल बचाने के लिए मैं जिले की बड़ी दुकानों यानी स्कूलों से हफ्ता वसूल कर एक हिस्सा आगे पहुंचाता हूँ और एक हिस्सा खुद रखता हूँ। मुझे नौकरी से निकालने का अधिकार मेरे जिन आकाओ के पास है स्वाभाविक रूप से मुझे उनके लिए ही काम करना होगा, वर्ना वे मुझे नौकरी से निकाल देंगे। अत: उनके निर्देशानुसार मैं उनके लिए स्कूलों से पैसा इकठ्ठा कर के उन्हें पहुंचाता हूँ। यही मेरी ड्यूटी है और यही मेरा कर्तव्य।
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मेरे जिले की स्कूलों से मैं कुल 2 से ढाई करोड़ सालाना इकठ्ठा करता हूँ। जिसमे से 50 लाख के करीब मेरे पास रहता है तथा बाकी आगे देना होता है। नाम नहीं लूंगा कि किसे कितना दिया जाता है। वरना वे मुझे नौकरी से निकाल देंगे। मुझे इस बात से बहुत ही पीड़ा होती है कि जिले के अभिभावक मुझसे बार बार यह उम्मीद लगाते है और आग्रह करते है कि मैं उनके जिले की शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त करूँ। मैं उनसे कहना चाहता हूँ कि -- 'साथियों मैं आपके लिए काम नहीं कर सकता, क्योंकि मेरी नौकरी आपकी मर्जी से नहीं चलती'। यदि मैं आपके हितों के लिए काम करूँगा तो मेरे आकाओ के हितो को चोट पहुंचेगी, और वे मुझे नौकरी से निकाल देंगे।
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यदि आप चाहते है कि मैं आपके लिए काम करूँ तो यह जरुरी है कि मुझे नौकरी से निकालने का अधिकार आप के पास हो। मेरे आका आप हो जाइये, मैं आपकी नौकरी करना शुरू कर दूंगा। और उसके बाद मुझे सिर्फ एक महीना दीजिये। आपको मालूम हो जाएगा कि जिला शिक्षा अधिकारी अपनी पर आये तो क्या कर सकता है।
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१) जिले के सभी स्कूलों की खुली ऑडिट की जायेगी। जो भी स्कूल मुनाफा कमा रहे है उन सभी स्कूलों के ट्रस्टों को भंग करके उन्हें अधिगृहीत किया जाएगा और सुचारु करके फिर से ट्रस्टियों को सौंपा जाएगा। लागत और खर्चो के अनुसार फ़ीस वसूली जायेगी। इससे सभी स्कूलों की फ़ीस में कम से कम 50% की कमी आएगी।
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२) सभी स्कूलों में फ़ीस की बढ़ोतरी के संबंध में निर्णय लेने के लिए अभिभावकों की कमिटी बनाना अनिवार्य होगी। तथा इस कमिटी के सामने खर्चो का त्रे-मासिक हिसाब रखा जाएगा। सिर्फ यह कमिटी ही बहुमत द्वारा यह तय करेगी कि कितनी फ़ीस बढाई जानी चाहिए तथा किन मदो पर खर्च किया जाना चाहिए। कमिटी में स्वतंत्र शिक्षाविद् भी होंगे जो कि तकनिकी विषयों पर अभिभावकों को सलाह देंगे।
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३) पूरे जिले में सभी कक्षाओं में सिलेबस शिक्षा विभाग द्वारा तय किया जाएगा। किताबो के पब्लिशर्स की निविदा होगी। तथा जो पब्लिशर सबसे कम कीमत में सबसे आकर्षक किताबें छापने की बोली लगाएगा उसे ही किताबें छापने के लिए अधिकृत किया जाएगा। इससे किताबो की कीमतें गिर कर आधे से भी कम पर आ जायेगी। कॉपिया वगैरह स्कूल नहीं बेचेगा, और अभिभावक उन्हें कहीं से भी खरीद सकेंगे।
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४) जिले के सभी स्कूलों और कक्षाओं के लिए स्कूल ड्रेस में विभाग तय करेगा, और इनमे 3 वर्ष से पहले कोई बदलाव नहीं किया जाएगा। यदि किसी स्कूल की अभिभावक सिमिति बदलाव करना चाहे तो मेरी अनुमति से ऐसा कर सकेगी।
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५) यदि अध्यापक द्वारा छात्रों के साथ कोई दुर्व्यवहार या मारपीट की जाती है तो विद्यालय के अभिभावकों की सूची में से रेंडमली 12 अभिभावकों का चयन किया जाएगा और अभिभावकों की यह ज्यूरी ही अमुक विवाद की सुनवाई करेगी। इस ज्यूरी को अध्यापक को नौकरी से निकालने और दण्ड देने का अधिकार होगा। यदि ट्रस्टी कोई बदमाशी करते है इन विवादों का निपटारा भी अभिभावकों की ज्यूरी करेगी।
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ये सभी प्रावधान लागू करने में मुझे कोई खर्चा नहीं करना होगा, अत: मुझे इसके लिए कोई बजट या अतिरिक्त स्टाफ नहीं चाहिए। सिर्फ कार्यालयी आदेश निकालने से ही ये सब महीने भर जायेगा। पर मैं यदि आज ऐसा करता हूँ तो अगले दिन ही स्कूल माफिया मेरे आकाओ को मुझे नौकरी से निकालने के लिए रूपया भेजेंगे और मेरे आका मुझे नौकरी से बर्खास्त कर देंगे। इसीलिए यदि आपको अपने जिले की शिक्षा व्यवस्था में यह बदलाव लाने है तो मुझे नौकरी से निकालने और ट्रांसफर करने का अधिकार अपने हाथो में ले।
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यह अधिकार आप कैसे प्राप्त कर सकते है ?
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शायद आपको यह जानकारी नहीं होगी कि अमेरिका में जिला शिक्षा अधिकारी को नौकरी से निकालने और ट्रांसफर करने का अधिकार जिले के मतदाताओं के पास है शिक्षा मंत्री के पास नहीं। इसीलिए वहाँ पर ईमानदार शिक्षा अधिकारी जिले की जनता के हितों के लिए कार्य करते है, और बेईमान अधिकारियों को वहाँ की जनता नौकरी से निकाल देती है। आपने सही पढ़ा है। मैं फिर से दोहराता हूँ --- "अमेरिका में जिला शिक्षा अधिकारी को वहां के जिले के मतदाता वोट द्वारा चुनते है, और उसके भ्रष्ट आचरण करने पर किसी भी समय वोट करके नौकरी से निकाल देते है"। वे लोग अपनी किसी समस्या के समाधान के लिए अनशन, धरने, प्रदर्शन आदि नहीं करते। वे भ्रष्ट अधिकारी को सीधे अपने अधिकार का प्रयोग करके नौकरी से निकाल देते है। इससे शिक्षा अधिकारी पर अंकुश बना रहता है और वह अभिभावको के हितों के लिए काम करता है। आप जो सड़कों पर आकर यह हंगामा करते हो उससे मुझे कोई फर्क नहीं आता। क्योंकि मैं जानता हूँ कि आप मेरा कुछ भी उखाड़ नहीं सकोगे। और मुझे उखाड़ने वाले को मुझसे कोई दिक्कत नहीं है। बल्कि वह तो मुझसे बहुत खुश है।
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तो कैसे आप जिला शिक्षा अधिकारी को नौकरी से निकालने की प्रक्रिया हासिल कर सकते है ?
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इसके लिए आपको ऐसे क़ानून को गैजेट में प्रकाशित करवाना होगा जिससे जिले के अभिभावक अपने मताधिकार का प्रयोग करके शिक्षा अधिकारी चुन और नौकरी से निकाल सके। एक बार यह क़ानून गैजेट प्रकाशित हो गया तो बस राज्य के सभी जिलों के सभी मतदाताओं को अपने जिले के शिक्षा अधिकारी को नौकरी से निकालने की प्रक्रिया मिल जायेगी। फिर बस अभिभावक है और जिला शिक्षा अधिकारी है। शिक्षा माफिया और राजनैतिक आका अगले दिन ही जमा हो जाएंगे।
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कहां से आप ऐसा कानूनी ड्राफ्ट हासिल कर सकते है ?
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अपने शहर में या फेसबुक समुदाय पर 'राईट टू रिकॉल कार्यकर्ताओ' से संपर्क करे। उन्होंने इस प्रकार की प्रक्रिया का प्रस्ताव किया है। उनसे आप यह ड्राफ्ट प्राप्त कर सकते है। इस ड्राफ्ट का अध्ययन करें और अन्य सभी अभिभावकों में इसका प्रचार करे। अपने विधायक को एसएमएस द्वारा आदेश भेजे कि इस प्रस्तावित क़ानून को गैजेट में प्रकाशित किया जाए।
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और मैं यह कहना चाहूंगा कि -- जो एजेंडा मैंने ऊपर लिखा है, वह मेरा द्वितीयक एजेंडा है। मेरा प्राथमिक एजेंडा सरकारी स्कूलों को प्राइवेट स्कूलों से बेहतर (बेहतर, न कि बराबर) बनाना तथा 'सात्य प्रणाली' लागू करना है। और मेरा दावा है कि सिर्फ 6 महीने में जिले के सरकारी स्कूल इतने बेहतर बन जाएंगे कि छात्र और अभिभावक निजी स्कूलों की और झांकेंगे भी नहीं। और 'सात्य प्रणाली' तो शिक्षा व्यवस्था के पूरे स्वरूप को ही पलट कर रख देगी। 'सात्य' आने के बाद छात्र पढ़ने पर खर्च नहीं करेंगे बल्कि वे पढ़ने से पैसा कमाएंगे।
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मिट्ठू लाल, जिला शिक्षा अधिकारी, राजस्थान
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(मिट्ठू लाल जी के आग्रह पर उनका सही नाम और तैनाती जिला यहाँ दर्ज नहीं किया गया है)

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