Pawan Jury BhilwaraRj
यदि मोदी साहेब और राजनाथ ने भाषणो और बयानबाजी से फुर्सत निकालकर थोड़ा ध्यान काम पर भी दिया होता तो शायद हम पठानकोट ऑपरेशन में 6 सैनिको को शहीद होने से बचा सकते थे।
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सरकार को दो साल होने को आये लेकिन इन्हें एनएसजी के लिए जरुरी साजो सामान खरीदने की फुर्सत नहीं है। और मोदी साहेब की पालिसी है कि यदि घर में कुत्ते घुस आये तो घर को सुरक्षित बनाने की जगह कुत्तो को समझाने की कोशिश की जानी चाहिए !!
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पठानकोट आपरेशन के दौरान एनएसजी कमांडोज़ के पास रात में देखने के उपकरण और थर्मल इमेजर नहीं थे, अत: शाम होते ही कार्यवाही रोक दी जाती थी, और कमांडो असहाय अपने कैम्प में लौट जाते थे।
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एनएसजी के पास ड्रोन भी नहीं थे, अत: हाथियों जितनी ऊँची घास में आतंकवादियों की टोह लेने के लिए कमांडोज़ को विमानों पर निर्भर रहना पड़ा। लेकिन विमानों ने जिन बिम्बो को ट्रेक किया उनमे से ज्यादातर जंगली सूअर निकले।
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बख्तरबंद गाड़ियां नहीं होने से एनएसजी को गाड़ियां स्थानीय इकाइयों से उधार लेनी पड़ी , जो कि प्रयाप्त क्षमता वाली नहीं थी।
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कमांडोज़ जीपीएस से लैस नही थे और एनएसजी के पास कोई कमांड सेंटर भी नहीं था, जहां से ओपरेशन का केंद्रीय संचालन किया जाता। इसके अलावा पोर्टेबल रडार, हेलमेट में लगे नाइट विज़न और लम्बी दूरी वाले सेंसर्स का भी अभाव था।
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एनएसजी के पास खुद का हेलीकॉप्टर तक नही है, और यह वक्त जरूरत इन्हे रॉ या वायुसेना से उधार लेता है।
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खबर के लिए यह लिंक देखें -- http://indiatoday.intoday.in/story/exclusive-how-pathankot-attack-highlighted-nsgs-weaknesses/1/571860.html
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ये खामियां नयी नही है। मुंबई हमले के दौरान एनएसजी को घटनास्थल तक पहुँचने में 10 घंटे लग गए थे और ऑपरेशन के दौरान कमांडोज़ के फोन की बैटरियां खत्म होने से उनका आपस में सम्पर्क टूट गया था। तब एनएसजी को मजबूत बनाने के लिए जिन हथियारों और उपकरणों की जरुरत थी, वे साजो सामान 8 साल बीत जाने पर भी हासिल नही हो सके है।
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इन जरुरी उपकरणों की खरीद (आयात) के लिए 1400 करोड़ के प्रस्ताव को गृह मंत्रालय की मंजूरी 2012 में ही मिल गयी थी लेकिन योजना अब तक कागजो में ही घूम रही है। दो साल मनमोहन-सोनिया ने बर्बाद कर दिए और अब मनमोहन-सोनिया का फर्ज मोदी साहेब और राजनाथ पूरा कर रहे है। इससे तो बेहतर था कि साधनहीन कमांडोज़ को भेजने की जगह अजित डोवाल ऑपरेशन की जिम्मेदारी सेना की स्थानीय इकाई को ही सौंप देते।
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फिर भी हम सैनिको के हथियारों की कमी उनके शौर्य गान से पूरा करना चाहते है। साहस और बहादुरी अतिरिक्त बढ़त है, लेकिन जंग में निर्णायक भूमिका हथियारों की ही होती है। यदि एनएसजी के पास माकूल हथियार होते तो 6 में से ज्यादातर सैनिको की जान बचाई जा सकती थी।
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समाधान -- यह है कि हमे अपने इंजीनियरिंग कौशल का विकास करने का प्रयास करना चाहिए ताकि अपनी सेना के लिए आवश्यक हथियारों का उत्पादन स्वयं कर सके। ऐसा राईट टू रिकॉल जिला शिक्षा अधिकारी, ज्यूरी सिस्टम, तथा टीसीपी जैसे कानूनो को गैजेट में प्रकाशित करवाकर किया जा सकता है।
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सम्बंधित प्रस्तावित कानूनो के विवरण यहां देखें : https://web.facebook.com/notes/809761655808739
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