Pawan Jury BhilwaraRj

आरक्षण के बयान के कारण परम पूज्य मोहन भागवत के सिर हार का ठीकरा फोड़ना उनके साथ अन्याय है। उन्होंने वही किया जो उन्हें कहा गया या वे करते आये है।
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बीजेपी के पिछले 20 सालों के चुनावी घोषणा पत्र उठाइये और देखिये कि उनका आरक्षण पर क्या 'अधिकृत' स्टेण्ड है ? कोई स्टेण्ड नहीं !!!
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लेकिन बीजेपी और संघ चुनावी मौको पर वक्त देखकर अपना रूख बयानों से बदलते रहते है और लोगो को कन्फ्यूज करके आरक्षण समर्थको और विरोधियों दोनों के वोट बटोर लेते है। अबकि बार धमाका घर में ही हो गया।
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नीति यह है कि भागवत आरक्षण का विरोध प्रतीत करने वाला बयान देंगे और आरक्षण विरोधी अगड़ी जाति के युवाओ को अपने साथ चिपका लेंगे। तब बीजेपी का कोई नेता सामने आएगा और आरक्षण को जारी रखने की वकालत कर देगा। वक्त निकलने पर संघ फिर से पल्टी खा जाएगा और आरक्षण समर्थक हो जाएगा। जोखिम बराबर का है। दोनों पक्ष समर्थन में भी आ सकते है और विरोध में भी। हुनर यही है, कि ऐसी ख़ूबसूरती से दावं चला जाए कि गोटी चित पड़े। इसी नीति से संघ और बीजेपी दोनों खेमों के वोट खींचते आये है। किन्तु इस बार गोटी पट पड़ी।
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यह लेख दिए गए लिंक देखें --- https://web.facebook.com/pawan.jury/posts/818163008301937
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भागवत 'आरक्षण की समीक्षा' होनी चाहिए कह खामोश हो गए, लेकिन लालू-नितीश ने बयान पकड़ लिया और पिछड़ों को यह समझाने में कामयाब हो गए कि मोदी साहेब के साइन में जो फुलावट है उसमे हवा संघ के पम्प से ही भरी जाती है। अत: संघ के सामने मोदी साहेब की हैसियत नहीं है कि वे आरक्षण जारी रख सके।
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लालू यादव ने प्रचार के दौरान संघ को ही निशाना बनाया, बीजेपी पर सीधे आरोप लगाने से बचते रहे। उनका आरएसएस का एजेंडा से मतलब क्या था यह भागवत पहले ही स्पष्ट कर चुके थे। मोदी साहेब ने डेमेज कंट्रोल करने की कोशिश की लेकिन बात बनी नहीं। पिछड़ा वर्ग 'आरएसएस के एजेंडे' में गिरफ्तार हो चुका था और मोदी साहेब के बयान ने उन्हें मुतमईन नहीं किया।
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