Rahul Mehta Gandhinagar LsCandidate
Pawan Jury BhilwaraRj:
अमेरिका की राजनैतिक व्यवस्था में वहाँ का एक सामान्य नागरिक भारतीय नागरिको की तुलना में अधिक मेहनत करता है, इसलिए अमेरिका भारत से आगे है।
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भारत में मतदाता सिर्फ 3 काम करता है ---- पार्षद/पंचायत सदस्य को चुनता है, विधायक को चुनता है, और सांसद को चुनता है।
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जबकि अमेरिका का मतदाता निम्नलिखित कार्य करता है --
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१) वह ज्यूरी में बैठकर मुक़दमे सुनता है, और यह तय करता है कि आरोपी को रिहा किया जाना चाहिए या जेल में पहुंचा देना चाहिए। वह यह भी तय करता है कि आरोपी को दी जाने वाली सजा की सीमा क्या होनी चाहीये।
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२) ज्यूरी के माध्यम से वह फैक्ट्री मालिकों/व्यवसायीयों को सरकारी अधिकारियों और श्रमिको द्वारा उत्पन्न किये जा रहे गैर जरुरी अवरोधों से सुरक्षा प्रदान करता है।
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३) वह ग्रांड ज्यूरी में बैठकर भी उपरोक्त श्रेणी के कार्य करता है।
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४) वह सिटी काउंसलर, मेयर, जिला जज, जिला लोक अभियोजक, जिला शिक्षा अधिकारी और जिला पुलिस अधिकारियों को चुनता है।
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५) यदि इन अधिकारियों में से कोई भ्रस्ट आचरण करता है तो राईट टू रिकॉल का उपयोग करके उसे पद से हटाता है।
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६) विधायक, मुख्यमंत्री और राज्यों के मुख्य न्यायधीशों को चुनता है।
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७) इनमे से किसी अधिकारी के भ्रष्ट हो जाने पर उन्हें रिकॉल करता है।
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८) लोकसभा, राज्य सभा एवं राष्ट्रपति को चुनता है। ( इन पदो पर रिकॉल प्रक्रियाए नहीं है )
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९) जिला स्तर पर जनमत संग्रह प्रक्रियाओ में भाग लेकर क़ानून बनाता है।
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१०) राज्य स्तर पर जनमत संग्रह द्वारा क़ानून बनाने का कार्य करता है।
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इस तरह अमेरिका के नागरिक वहां की व्यवस्था में भारतीयों की तुलना में ज्यादा सक्रीय भूमिका निभाते है।
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इसीलिए वे बेहतर स्थिति है।
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यह सीधी बात है। इसमें कोई जादू नहीं कि --- जो ज्यादा और अच्छा काम करेगा उसे ज्यादा और अच्छा परिणाम मिलेगा। अमेरिका के बढ़ने और भारत के पिछड़ने के दसियों अन्य कारण भी है, लेकिन उपरोक्त कारणो की भूमिका सबसे महत्त्वपूर्ण है।
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असल में भारत के कार्यकर्ता भी अपना अच्छा खासा समय और ऊर्जा राजनैतिक विमर्श में खर्च करते है। लेकिन उनकी गतिविधियाँ अनुत्पादक होती है। वे अपना समय नेताओं के बयान-भासण सुनने और उनकी वाहवाही या निंदा करने में खर्च कर देते है। इससे उनके द्वारा किया गया कार्य व्यवस्था में नहीं जुड़ पाता और वे रचनात्मक योगदान से वंचित हो जाते है। जबकि अमेरिका के नागरिको की गतिविधियां व्यवस्था का हिस्सा होती है, और यही अंतर उन्हें बदलाव लाने या दिशा तय करने में सक्षम बना देता है।
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समाधान ?
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समाधान के लिए भारत के कार्यकर्ताओ और नागरिको को अपने सांसद पर उन कानूनो को लागू करने का दबाव बनाना चाहिए जिससे भारत के नागरिको को उपरोक्त प्रक्रियाओं में हिस्सा लेने का अवसर मिले। सिर्फ सोनिया-मोदी और केजरीवाल आदि नेताओ की अंधभक्ति तक सिमित रहने से भारत अमेरिका से और भी पिछड़ता चला जाएगा, जिसका नतीजा भारत के फिर से गुलाम हो जाने के रूप में निकलेगा।
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कौन से क़ानून भारत में यह परिवर्तन ला सकते है ? मैंने इसके लिए जो क़ानून प्रस्तावित किये है, उन्हें इस लिंक पर देखा जा सकता है ---
https://web.facebook.com/notes/pawan-kumar-jury/809761655808739
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