Pawan Jury BhilwaraRj

अव्यक्त लोकमत
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जब जनता को यह बताना होता है कि कौन व्यक्ति हमारा विधायक, सांसद, प्रधानमन्त्री और मुख्यमंत्री होगा तो इन सभी पदो के उम्मीदवारों ने 84 करोड़ नागरोको को एक बेहद ही सभ्य, शालीन, अधिकृत, सौम्य और व्यवस्थित प्रक्रिया दी है ------ सभी मतदाता अपने नजदीकी मतदान केंद्र पर अपने मतदाता पहचान पत्र के साथ जाइए और एक बटन दबाकर, अपनी तर्जनी पर स्याही लगवा कर घर लौट जाइए। इस प्रक्रिया को मतदान या जनमत की इच्छा दर्ज करने की प्रक्रिया या जनता की आवाज के आधार पर शासको का निर्वाचन आदि कहा जाता है।
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बढ़िया है।
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किन्तु आगामी 5 वर्ष तक यदि जनता अपने शासको के सामने कोई बात रखना चाहती है, या समर्थन एवं विरोध दर्ज करवाना चाहती है तो उपरोक्त निर्वाचितो ने जनता को अधिकृत रूप से कोई प्रक्रिया नहीं दी है। लेकिन कुछ लोगो ने शेष 5 वर्षो के दौरान भी अपनी आवाज शासको तक पहुंचाने के लिए ऐसी सभ्य, शालीन, अधिकृत, सौम्य और व्यवस्थित प्रक्रिया की मांग करने की जगह कुछ विकट और अजीब नुस्खों का आविष्कार कर लिया है --- इनमें आंधी पानी सहते हुए सड़को पर नारे लगाना, जुलुस निकालना, पोस्टर और बैनर गले में लटका कर घूमना, पटरियां उखाड़ना, जाम लगाना, पुतले फूंकना और बदले में आंसू गैस सुड़कना, पानी की बौछारे सहना, पुलिस के सोट खाना और आवाज पहुचाने के चक्कर में मुकदमे दर्ज करवाना आदि शामिल है।
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इसी क्रम में बौद्धिक किस्म के लोग अपनी आवाज शासको तक पहुंचाने के लिए कुछ अजीब किस्म के टोटके इस्तेमाल में लाते है। ये लोग इसके लिए भूखे रहने, टेंट लगा कर बैठे रहने, मोमबत्तियां जलाने आदि तरीको का इस्तेमाल करते है। इनका मानना है कि यदि आपमें भूखे रहकर अधमरा होने की या अपना काम धंधा छोड़कर चौराहो पर सुबह से शाम तक हफ्तों और महीनों तक मजमा लगा कर बैठे रहने की शक्ति नहीं है तो दफा हो जाओ। क्योंकि ऐसे कमजर्फ लोगो को अपनी बात सरकार तक पहुंचाने का कोई हक नहीं है।
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नेता जानते है कि इस टाइप की गतिविधियों में सिर्फ फुरसतिये ही हिस्सा ले सकते है, जिनकी तादाद 0.1 % से भी कम है, जबकि आम नागरिको के लिए अपने रोजगार आदि छोड़कर इस तरह रोज सड़को पर उतरना अव्यवहारिक है। अत: जब जनता को अपनी कोई बात सरकार तक पहुंचानी हो तो इन झमेलों में सिर्फ 0.1 % नागरिक ही हिस्सा ले पाएंगे । और जब हमें सांसदी और विधायकी का फैसला करवाना होगा तो हम मतदान की प्रक्रिया द्वारा जनता की आवाज सुन लेंगे। फिर अगले पांच साल की छुट्टी।
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फुरसतिये भी यह जानते है कि काम धंधा छोड़कर मजमा आदि लगाना सभी नागरिको के लिए सम्भव नहीं है, अत: हमारी प्रतिस्पर्धा सिर्फ 0.1 % कार्यकर्ताओ से ही है। हम सड़को पर उतर कर, भूखे मर कर, तम्बू आदि लगाकर आसानी से 'जनता की आवाज' का प्रतिनिधित्व कर अपनी राजनीति चमका सकते है। चाहे 1% जनता भी उनकी उल जलूल मांगो से सहमत न हो। क्योंकि अपनी असहमति दर्ज करवाने के लिए इन्हे फिर सड़को पर उतरना पड़ेगा, जो कि इनके लिए अव्यवहारिक है।
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यहां तक तो एक हद तक बात समझ आती है, लेकिन विडम्बना यह है कि शेष 99.99% आम नागरिक भी ऐसी प्रक्रिया की मांग करने से इनकार कर देते है, जिसकी सहायता से वे मतदान दिवस के अलावा भी शेष 5 वर्षो तक अपनी बात सरकार के सम्मुख पारदर्शी, अधिकृत और सभ्य तरीके से रख सके !!!
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ऐसी ही एक प्रक्रिया 'टीसीपी' का कानूनी ड्राफ्ट हमने प्रस्तावित किया है जिसके गैजेट में प्रकाशित होने पर देश का कोई भी नागरिक अपनी बात/आवाज/समर्थन/विरोध/सुझाव आदि प्रधानमन्त्री या मुख्यमंत्री के सम्मुख रख सकेगा, तथा अन्य नागरिक ऐसी मांग पर अपनी हाँ या ना दर्ज कर सकेंगे। इस प्रक्रिया का कानूनी ड्राफ्ट इस लिंक पर दर्ज किया गया है :
https://www.facebook.com/pawan.jury/posts/809753852476186
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इसमें सिर्फ 3 पंक्तियाँ है, जिसके गैजेट में प्रकाशित होने पर देश के सभी नागरिको को अपनी बात सरकार के सम्मुख रखने का 5 साला अवसर मिल जाएगा।
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तो यदि आप ऐसी कोई प्रक्रिया चाहते है तो अपने सांसद को एसएमएस द्वारा यह आदेश भेजे कि 'जनता की आवाज - पारदर्शी शिकायत प्रणाली' या टीसीपी के क़ानून ड्राफ्ट को गैजेट में प्रकाशित किया जाए।
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किन्तु यदि आपका मानना है कि जिस व्यक्ति को सड़को पर उतर कर हुड़दंग मचाने की फुर्सत नहीं है, उसे अपनी बात सरकार तक पहुंचाने का कोई मौका नहीं दिया जाना चाहिए, तो आप अपने सांसद को यह आदेश भेजे कि टीसीपी क़ानून को गैजेट में प्रकाशित नही किया जाए, न ही ऐसी किसी प्रक्रिया को लागू किया जाए जिससे भारत के सभी 84 करोड़ मतदाताओ को सभ्य और शालीन तरीके से अपनी अधिकृत मांग रखने का कोई अवसर मिले।
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यह उल्लेखनीय नहीं है कि मौजूदा व्यवस्था से नेता और फुरसतिये दोनों खुश है। आप भी खुश है तो ठीक है। किन्तु यदि आप ऐसा कोई क़ानून चाहते है तो ऐसी प्रक्रिया के लिए मांग भी आपको ही करनी होगी।
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