Rahul Mehta Gandhinagar LsCandidate
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Pls read this comment by Navin Agrawal .
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" पिछले कई दशको से मिशनरीज़ पूर्वोत्तर और दक्षिण में धर्मान्तर कर रहा है, अत: संघ उस इलाके में गतिविधि नहीं कर रहा है। मिशनरीज सीमांत इलाको में कन्वर्जन करते है जहां मिडिया नहीं होता। संघ धर्मान्तर रोकने की जगह टीवी कैमरों के सामने धर्मान्तर का आडम्बर करता है। नतीजा यह कि मिशनरीज द्वारा किये गए धर्मान्तर की सूचना करोडो नागरिको तक नहीं पहुँचती जबकि संघ के आडम्बर को पेड मिडिया पूरे देश दिखाता है। इससे संघ की भी छवि बनी रहती है और मिशनरीज का एजेंडा भी आगे बढ़ता रहता है। . धर्मान्तर रोकने के लिए गरीबी दूर करना, सरकारी स्कूलों और अस्पतालों को सुधारना, नक्सलवाद ख़त्म करना, जातिगत भेदभाव को ख़त्म करना आवशयक है। साथ ही हिन्दू धर्म को मजबूत बनाने के लिए मंदिरो का प्रशासन सुधारना जरुरी है। इन सब को सिर्फ अच्छे कानूनो द्वारा ही सुधारा जा सकता है, अत: संघ इन सभी समस्याओ को दूर करने के लिए आवशयक कानूनो का विरोध करता है। . नारे, बयान, दर्शन, एलान, प्रवचन, संस्कार, उपदेश देने से कोई बदलाव नहीं आता। संघ का शीर्ष नेतृत्व इस बात से परिचित है। अत: सिर्फ यही गतिविधिया करता है। संघ का शीर्ष नेतृत्व हमेशा से ही इस्लाम का छद्म विरोधी, ईसाइयत का प्रबल समर्थक और हिन्दू हितो के प्रति उदासीन रहा है........"
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Ashok Jain VotevapsiCm:
जानिये संघ परिवार ने स्थापना से लेकर आजतक कैसे राष्ट्रवादियों को को ठगा है:-(भाग १)
आर एस एस की स्थापना १९२५ मे हुई थी उस समय की परिस्थितियों पे नजर डालें तो एक तरफ़ हिंदुत्ववादी लोग हिंदू महासभा के बैनर तले हिंदू संगठन, हिंदुओ के सशक्तिकरण ब्रिटिश सरकार के खिलाफ़ संघर्ष, शुद्धी इत्यादि का कार्य कर रहे थे तो दूसरी तरफ़ बिस्मिल, आज़ाद, अश्फ़ाक़ुल्ला जैसे क्रांतिकारी सशस्त्र संघर्ष कर रहे थे। इसी बीच केशवराव हेडगेवार ने हिंदू महासभा से अलग होकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बना लिया जिसका काम था हिंदुत्ववादी कार्यकर्ताओ को हिंदू महासभा ज्वाइन करने से रोकना तथा क्रांतिकारियों को भगत सिंह के रास्ते पे जाने से रोकना.
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इस बात के अनेको प्रमाण है जब उस जमाने में सशस्त्र क्रांति करने के इच्छुक लोग केशवभाई के पास हाज़िर होते थे और केशवभाई उन्हे भगत सिंह के रास्ते पर जाने से रोक कर संघ मे शामिल कर लेते थे और फ़िर उनकी ऊर्जा जो कि अंग्रेजों को मारने मे लगती वो रोज सुबह शाखा मे कबड्डी खेलने और बैंड पार्टी के जैसा ढॊल बाजे बजाने मे व्यय हो जाती थी। खुद तृतीय सरसंघचालक बालासाहब देओरस ने स्वीकार किया है कि ऐसा उनके साथ घटित हुआ। उसी प्रकार एक बार एक युवक हेडगेवार के पास आया और भगत सिंह के रास्ते पे चलने की इच्छा प्रकट की। केशवभाई ने बोला कि और तुम्हारे परिवार का क्या होगा? तो उसने बोला कि मैने दो साल तक उनके गुजारे का बंदोबस्त कर रखा है। तो केशवभाई बोले कि अगर दो साल तक बंदोबस्त कर रखा है तो फ़िर भगत सिंह का रास्ता पकडने की जगह संघ मे क्युं नही आ जाते। इससे वह युवक इतना हतोत्साहित हो गया कि न तो संघ ही ज्वाईन किया और न ही क्रांतिकारी ही बन पाया.उसी तरह से हिंदुत्ववादियों को हिंदू महासभा की राजनीति में भाग लेकर हिंदुत्व को मजबूत बनाने से रोककर वो बैंड पार्टी, कबड्डी इत्यादि में व्यस्त रखते थे।
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नतीजा ये हुआ कि १९३६ आते आते इस देश में भगत सिंह की विरासत को आगे बढाने वालों का अभाव हो गया और दूसरी तरफ़ हिंदू महासभा के कार्यकर्ता दिन प्रतिदिन कम होते गये। १९३८ मे सुभाष चंद्र बोस कांग्रेस के प्रेसिडेंट बने और उन्होने कांग्रेस में दोहरी सदस्यता खत्म करवा दी जिसके कारण कांग्रेस के बहुत से नेता जो कि हिंदू महासभा के सदस्य भी थे मजबूरीवश हिंदू महासभा छोड गये। हिंदू महासभा नेता एवं कार्यकर्ताओ के अभाव में कमजोर होती गयी.१९४० मे गुरु घण्टाल गोलवलकर संघ के दूसरे हेड बने। वो भी युवाओ के राजनीति एवं आंदोलनो में भाग लेने के सख्त विरोधी थे। स्पष्ट रूप से उन्होने कहा कि -"१९२० के असहयोग आंदोलन का दुष्प्रभाव ये हुआ कि युवा उद्दंड हो गये और उनमें अनुशासन और आज्ञाकारिता नहीं रही। "१९४२ के भारत छोडो आंदोलन के समय उन्होने आधिकारिक तौर पर संघ को उसमें शामिल नहीं किया जबकि उसके कार्यकर्ता ऐसा चाहते थे। और इस कारण स्वयंसेवकों के मन में काफ़ी आक्रोश भी था। उसी तरह हमेशा युवाओ को मूर्ख बनाकर राजनीति से हमेशा दूर रखा।हिंदू महासभा हिंदुओ को मिलीट्री ट्रेनिंग दिलवाना चाहती थी वहीं आर एस एस बोलता था कि लाठी से काम चला लो। इस बात मे कोई शक नहीं कि आर एस एस के बनने से अगर किसी पार्टी को सबसे अधिक नुकसान पहुचा था तो हिंदू महासभा। क्योंकि हिंदू महासभा से भविष्य के लाखों कार्यकर्ता छिन गये जो कि उसे एक मजबूत राजनैतिक पार्टी बना सकते थे। अगर संघ न होता तो ये लाखों स्वयंसेवक हिंदू महासभा ज्वाईन करते, हिंदू महासभा मजबूत होती और अंग्रेज कांग्रेस और लीग के समकक्ष महत्व विभाजन के समय महासभा को भी देते और शायद विभाजन टल जाता। उसी तरह जब विभाजन की घोषणा हो गयी तो भी संघ ने सरकार का कोई विरोध नहीं किया और युवाओ को राजनीति से दूर रहने की पट्टी पढाकर चतुर्थ श्रेणी के कार्यों मे व्यस्त रखा।
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जब देश का बटवारा हो गया और फ़िर आजादी मिली,नाथूराम गोडसे ने गांधी की हत्या कर दी संघ पर बैन लगा फ़िर उठा,हिंदू महासभा तबाह हो गयी इन सब घटनाॐ के बाद स्वयंसेवकों को अच्छी तरह समझ आ गया कि संघ ने उन्हे किस प्रकार टोपी पहनाई है और वो हिंदू महासभा की राजनीति अथवा भगत सिंह का संगठन ज्वाइन कर लेते तो शायद आजादी जल्दी मिल जाती, देश का बटवारा न होता, पाकिस्तान को ५५ करोड न देने पडते इत्यादि।उन्होने देखा कि अपनी क्षमताओ का हम राष्ट्रनिर्माण में कोई उपयोग न कर सके और दुश्मन हमारी आंखों के सामने सबकुछ लूट कर ले गये और हम बस अपने गुरुजी की आज्ञा का पालन करने मे व्यस्त रहे। संघ ने उन्हे राजनीति से जानबूझकर अलग रखा जिसका खामियाजा देश ने भुगता। उसके बाद स्वयंसेवकों का मोह संघ से भंग हो गया और बडे पैमाने पर कांग्रेस विरोधी विकल्प सोशलिस्ट एवं कम्यूनिस्ट पार्टी में जाने लगे। संघ प्रमुख ने देखा कि अब तो हमारी ईंटें समाजवादियों का भवन निर्माण करेंगी। अब इन स्वयंसेवकों को फुसलाने के लिए एक राजतीतिक विकल्प दिखाने कि जरूरत है जिसमे संघ के नेताओ को बैक डोर से इंट्री दिलाई जाए ताकि हिंदुत्ववादियों के लिए एक सेफ़्टी वाल्व बने.
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इसी बीच हिंदू महासभा के सेकुलर नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने हिंदू महासभा मे मुस्लिमों को भी घुसाने का प्रस्ताव किया जिसे किसी ने नहीं माना। नतीजतन उन्होने हिंदू महासभा छोड दी और नया सेकूलर राजनीतिक दल बनाने की तैय्यारी करने लगे। उसके बाद गोलवल्कर और मुखर्जी ने जनसंघ बनाने की योजना बनाई जिसमे संघ के ही कुछ नेता शीर्ष पदों पर रहते और स्वयंसेवक संघ को छोडकर सोशलिस्ट और कम्यूनिस्ट पार्टी ज्वाइन करने के बजाय संघ/जनसंघ के नेताओ का प्रचार करते। इस प्रकार जनसंघ की स्थापना हुई.हिंदू महासभा मृतप्राय हो गयी और हिंदुत्ववादी कार्यकर्ताओ को एक ईमानदार हिंदूवादी राजनीतिक विकल्प कभी न मिल सका।
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तो कुल मिलाकर देखा जाए तो जनसंघ की स्थापना के ही पीछे इतना बडा खोट था.इस पार्टी की कभी कोई विचारधारा नहीं रही। बस एक नीति थी-" गंगा गये गंगा दास, जमुना गये जमुना दास"। स्थापना के बाद किस प्रकार इन दोनो संगठनों के नेताओ ने मिलकर राष्ट्रवादियों को जम क ठगा और कालांतर मेंआवश्यकतानुसार विहिप स्वदेशी जागरण मंच इत्यादि टाइम पास संगठन इस संघ परिवार का हिस्सा बने