Pawan Jury BhilwaraRj

मोदी साहेब के अब तक का कार्यकाल : जो हुआ और हो न सका ।
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1. रक्षा
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जो हुआ : मनमोहन FDI के रास्ते चल रही थे, मोदी साहेब ने भी उसे ही आगे बढ़ाया। विदेशी कम्पनिया मेक इन इण्डिया के तहत भारत में आकर हथियार बनाएगी, जिससे हम पूर्व की तरह ही हथियारों के लिए अन्य देशो पर निर्भर बने रहेंगे।
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हो न सका : सेना को आत्मनिर्भर बनाने, स्वदेशी हथियारों के निर्माण के लिए गणित विज्ञान का आधार मजबूत करने की जरुरत थी, जिसके लिए सात्य प्रणाली और जूरी सिस्टम आदि क़ानून पास किये जा सकते थे।
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2. वित्त
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जो हुआ - मनमोहन 10 साल से सभी क्षेत्रो को विदेशी कम्पनियों के लिए खोलने के लिए FDI की पालिसी पर काम कर रहे थे। मोदी साहेब ने इसे मेक इन इण्डिया के नाम से और भी गति दे दी। इन विदेशी कम्पनियों द्वारा कमायें गए रूपये के बदले हमे डॉलर चुकाने पड़ेंगे, ये इकाइयां हमारी स्वदेशी इकाइयों को और भी निगल जायेगी, हमारा निर्यात गिरेगा और हम हर क्षेत्र में इन विदेशी कम्पनियों पर और भी निर्भर हो जायेंगे।
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हो न सका : विदेशी कम्पनियों द्वारा कमायें मुनाफे के बदले में डॉलर के भुगतान के समझौते को रद्द किया जा सकता था। स्वदेशी इकाइयों को सरंक्षित करने के लिए सेल्स, वेट, एक्साइज, सर्विस, ओक्ट्रोय आदि करो को निकाल कर वेल्थ टेक्स और जूरी सिस्टम लागू किया जा सकता था।
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3. शिक्षा
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जो हुआ : सरकारी स्कूलों को तोड़ने के लिए मनमोहन 8 वी तक फेल न करने का क़ानून लाये, जिसे मोदी साहेब ने जारी रखा। सरकारी स्कूल और भी बदहाल होंगे, गरीबी बढ़ेगी और धर्मान्तर में तेजी आएगी।
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हो न सका : सरकारी स्कूलों को सुधारने के लिए राईट टू रिकाल शिक्षा अधिकारी और शिक्षा मंत्री के क़ानून पास किये जा सकते थे।
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4. चिकित्सा :
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जो हुआ : मनमोहन ने पेटेंट के क़ानून को पास किया था जिससे दवाइयों के दाम आसमान छू गए। मोदी साहेब ने उस क़ानून को जारी रखने का फैसला किया तथा 80 अन्य दवाइयों को नियंत्रित मूल्य की सूची से निकाल दिया जिससे दवाइयां और भी महंगी हुयी। सरकारी अस्पतालो की हालत और भी खराब हो रही है, नतीजे में गरीबी बढ़ेगी और धर्मान्तर तेजी से होंगे।
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हो न सका : पेटेंट के क़ानून को केंसिल करके दवाइयों की कीमतों को काबू किया जा सकता था। राईट टू रिकाल चिकित्सा अधिकारी तथा चिकित्सा मंत्री के कानूनों को गेजेट में प्रकाशित करके सरकारी अस्पतालों को निजी अस्पतालों जैसा बेहतर बनाया जा सकता था।
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5. बांग्लादेशी घुसपेठिये
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जो हुआ : मनमोहन के कार्यकाल में आवक जारी थी। मोदी साहेब ने उन्हें खदेड़ने का वादा किया था, किन्तु पलट गए। आवक जारी है।
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हो न सका : 2 करोड़ घुसपेठियो की पहचान करके उन्हें खोज कर निकालने के लिए विधिवत क़ानून की जरुरत थी, जिसे पास किया जा सकता था। मामला ठन्डे बस्ते में।
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6. मंदिर
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जो हुआ : मनमोहन ने स्वर्ण भंडारों से युक्त मंदिरों को सरकारी नियंत्रण में ले लिया था, तथा मंदिरों का सोना कब्जाने की नाकाम कोशिशे की। मोदी साहेब तिरुपति से सोना खींचने में सफल रहे और अन्य मंदिरों का सोना हड़पने के लिए गोल्ड बांड ले आये।
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हो न सका : मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त किया जा सकता था, तथा मंदिरों के प्रशासन को सुधारने के लिए हिन्दू देवालय ट्रस्ट अधिनियम पास किया जा सकता था।
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7. बेरोजगारी
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जो हुआ : मनमोहन की रोजगार की परिभाषा में नौकरियां थी। मोदी साहेब भी उसी लीक पर चले। मतलब, विदेशी कम्पनियों को धंधा करने को बुलाओ, और वे तुम्हे नौकरियां देंगे।
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हो न सका : स्वरोजगार को बढ़ावा देते हुए स्वदेशी इकाइयों के सरंक्षण के लिए जूरी सिस्टम और वेल्थ टेक्स के क़ानून लागू किये जा सकते थे। इससे जमीनों की कीमते कम होती और स्वरोजगार के ज्यादा अवसर पनपते।
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8. भ्रष्टाचार
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जो हुआ : ऊँचे स्तर पर व्यापम और छोटे स्तर पर भ्रष्टाचार बदस्तूर जारी है। सुषमा, राजे और पंकजा मुंडे के प्रकरण ने दर्शाया कि मनमोहन सरकार का चेहरा बदला है, व्यवस्था नही।
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हो न सका : जूरी द्वारा सार्वजनिक नार्को टेस्ट से संगठित भ्रष्टाचार और राईट टू रिकाल पुलिस प्रमुख क़ानूनो से छोटे स्तर के भ्रष्टाचार को नियंत्रित किया जा सकता था।
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9. जांच एजेंसियां
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जो हुआ : मनमोहन के घोटालो की जांच खुद मनमोहन ही करवाते थे, अब मोदी साहेब भी ऐसा ही कर रहे है। सरकारो के घोटालो की जांच सरकारों द्वारा ही किये जाने की परिपाटी को मोदी साहेब ने बदलने से इनकार कर दिया।
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हो न सका : सीबीआई, ईडी, सीवीसी, सीआईडी तथा पुलिस आदि के प्रमुखों को चुनने और नौकरी से निकालने का अधिकार जनता को देकर स्वतंत्र जांच एजेंसियों की स्थापना की जा सकती थी।
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10. अदालतें
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तीन करोड़ मुकदमे लंबित है भारत की अदालतों में। वर्षो तक फैसले न आने से सजा का डर लगभग ख़त्म। रसूखदार जज-नेता-अधिकारियों से गठजोड़ बना कर छूट जाते है, और आम नागरिक पिसता है।
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जो हुआ : चूंकि दंड देने की अंतिम शक्ति जजों के पास है, इसलिए मनमोहन ने न्यायपालिका में कोई सुधार नही किये। मोदी साहेब ने भी इसे न छूने का फैसला किया।
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हो न सका : जजों की संख्या 17 हजार से बढ़ाकर 50 हजार की जा सकती थी। जजों को प्रजा अधीन करके भाई भतीजावाद और न्याय की खरीद फरोख्त को कम किया जा सकता था। मोदी साहेब ने न्यायपालिका सुधार के सभी प्रस्ताव खारिज कर दिए।
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11. मिडिया
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पूरा देश किन मुद्दों पर चर्चा करेगा, किस पर क्या सोचेगा, कौन सी खबरे छिपायी जायेगी और किन खबरों को प्रमुखता दी जायेगी, यह मिडिया तय करता है। दूरदर्शन को छोड़ दें तो मिडिया MNCs और मिशनरीज़ द्वारा संचालित है।
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जो हुआ : मनमोहन मिडिया को विदेशी हाथो में बनाए रखने के पक्ष में थे, मोदी भी इसी के पैरोकार निकले। उतना भी काफी नही था इसलिए प्रकाश जावड़ेकर प्रिंट मिडिया में भी FDI बढाने का प्रस्ताव ले आये।
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हो न सका : दूरदर्शन के चेयरमेन को चुनने और नौकरी से निकालने का अधिकार जनता के हाथ में देकर DD को निजी कम्पनियों की प्रतिस्पर्धा में खड़ा किया जा सकता था। मोदी साहेब ने DD को कार्यकुशल बनाने के सभी प्रस्ताव खारिज कर दिये। ज्ञातव्य है कि सभी निजी चैनल मिलकर भी संसाधन और दर्शक संख्या के लिहाज़ DD से कमतर है, अत: DD को सुधारने से यह अन्य सभी चैनल्स को DD निगल जाएगा।
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12. कृषि
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कृषि का जीडीपी में योगदान लगातार गिर रहा है, किसानो की आत्महत्या जारी है और रासायनिक खाद-GM फसलो पर हमारी निर्भरता बढती जा रही है।
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जो हुआ : मनमोहन ने 220 GM फसलो को अनुमति दी थी, लेकिन उनमे आधारभूत फसले शामिल नही थी। मोदी साहेब ने चावल, दालें और गेंहू जैसी फसलो के GM संस्करण को अनुमति दे दी। मुरली मनोहर जोशी का पत्ता इसी प्रकरण में काटा गया था।
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हो न सका : सभी GM फसले हानिकारक नही है, किन्तु इन्हें भारत में विकसित करने और कृषि में स्वदेशी तकनीको को प्रोत्साहन देने के लिए आवश्यक कानूनों को पास किया जा सकता था।
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13. सेंसर बोर्ड
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सांस्कृतिक प्रदूषण और नग्नता को नियमित करना सेंसर बोर्ड और सूचना मंत्री की जिम्मेदारी है।
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जो हुआ : मनमोहन ने OMG को लांच किया था, मोदी साहेब PK और सिंघम-2 ले आए। मनमोहन ने लियोनि दी तो मोदी साहेब ने जौहर और पादुकोण के आल इण्डिया बक## को मौन स्वीकृति दी।
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हो न सका : सेंसर बोर्ड चेयरमेन और प्रसारण मंत्री को प्रजा के अधीन करके यह गटर गंगा बहाने वालो की घड़ी दबाई जा सकती थी। परन्तु मोदी साहेब ने पूरे देश को इसमें डुबकियाँ लगवाई।
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14. पाकिस्तान
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पाकिस्तान का इलाज है कि हम अपनी सेना को अमेरिका के बराबर ताकतवर बना ले। पाकिस्तान खामोश हो जाएगा। किन्तु ऐसा करने के लिए हमे मेड इन इण्डिया मेड बाय इन्डियन हथियार चाहिए।
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जो हुआ : आतंकवादी घुसपेठ और सीमा पर गोलाबारी की घटनाएं यथावत जारी है। मोदी साहेब ने भी मनमोहन की तरह सेना मजबूत करने के क़ानून बनाने की जगह निंदा, भर्त्सना, चेतावनी और बर्दाश्त नही करेंगे के बयानों से काम चलाने का फैसला किया। थोथे बयानों की परवाह न करते हुए पाकिस्तान ने पंजाब में आतंकवाद का नया अध्याय शुरू कर दिया।
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हो न सका : नागरिको को बन्दुक रखने की छूट देकर हथियार बंद नागरिक समाज की रचना की जा सकती थी, तथा स्वदेशी हथियारों के निर्माण के लिए लाइसेंस राज का खात्मा किया जा सकता था।
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15. रेल और बीमा
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सेवा क्षेत्र में एलआईसी और रेल भारत के शीर्ष सार्वजनिक उपक्रम है। मनमोहन इन्हें पूरी तरह से ख़त्म नही कर पाए थे, मोदी साहेब इन्हें ठिकाने लगाने के काम में तेजी ले आये।
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जो हुआ : मोदी साहेब ने बीमा और रेल में FDI की सीमा बढ़ाकर क्रमश: 75% और 49% की। मुंबई-अहमदाबाद और दिल्ली-मुंबई कोरिडोर जापानियों को, बेंगलोर-हेदराबाद चीनियों को और मुंबई-कोलकाता ट्रेक स्पेन के हवाले कर रहे है।
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हो न सका : भारत के पास जमीन, खनिज खदाने, मानव संसाधन आदि सभी कुछ है। सिर्फ तकनीक बढाने और स्वदेशी औद्योगिक इकाइयों को सरंक्षण देने वाले क़ानून बना कर हम खुद की हाई स्पीड ट्रेने चला सकते थे। जिससे हम इस क्षेत्रो में आत्म निर्भर बने रहते। जहाँ तक बीमा में विदेशी निवेश की बात है, इसमे किस तरह की तकनीक चाहिए, समझ नही आ रहा।
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16. जनसँख्या का धार्मिक असंतुलन
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बढ़ते धार्मिक असंतुलन को रोकने के लिए टू चाइल्ड पालिसी, नेशनल आई डी सिस्टम गरीबी दूर करने के कानूनों की जरुरत है। मौजूदा व्यवस्था के जारी रहने से धार्मिक असंतुलन बढ़ता जाएगा।
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जो हुआ : मनमोहन ने 2011 के धार्मिक एवं भाषाई आंकड़ो को प्रकाशित नही किया था, मोदी साहेब भी इन्हें साल भर से दबा कर बैठे है।
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हो न सका : आंकड़ो को प्रकाशित किया जा सकता था ताकि असंतुलन की वस्तुस्थिति ज्ञात हो। टू चाइल्ड पालिसी और नेशनल आईडी सिस्टम के क़ानूनो को गेजेट में प्रकाशित किया जा सकता था।
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17. उर्जा क्षेत्र के सार्वजनिक उपक्रम
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कोल इण्डिया दुनिया की सबसे बड़ी कोयला कम्पनी, ओएनजीसी भारत की सबसे अधिक मुनाफा कमाने वाली कम्पनी तथा एनएचपीसी हाइड्रो पॉवर के में भारत की सबसे बड़ी कम्पनी है।
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जो हुआ : मनमोहन ने 2010 में कोल इण्डिया की 10%, ओएनजीसी की 20% हिस्सेदारी बेचीं थी। मोदी साहेब ने इन तीनो कम्पनियों की और भी हिस्सेदारी बेचने का प्रस्ताव किया।
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हो न सका : सार्वजनिक उपक्रम राष्ट्रीय संपत्तियां है, जबकि ये उपक्रम ऊर्जा जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्र से जुड़े हुए है। इन्हें कार्यकुशल बनाने के लिए इन्हें प्रजा अधीन किया जा सकता था।
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18. राम मंदिर
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1990 से बीजेपी के लिए वोट खींचने के लिए यह मुख्य मुद्दा रहा है, और करोड़ो लोगो की आस्था का विषय होने से इसने वोट खींचे भी है।
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जो हुआ : मनमोहन ने कभी नही कहा कि वो मंदिर बनायेगे। उनका रुख था कि अदालत जो कहेगी वो होगा। सत्ता में आते ही मोदी साहेब ने खुद को गोल कर लिया और उनके सिपहसालार उनके मुंह में जो आता है वेसे बयान देते चले गए।
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हो न सका : संसद में जनमत संग्रह का सामान्य प्रस्ताव पास करके करोड़ो नागरिको की हाँ/ना से मंदिर बनाने के क़ानून को पास किया जा सकता था। पर मोदी साहेब इस विषय पर मनमोहन हो गए।
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19. मांस की मंडी
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मोदी साहेब ने मनमोहन के पिंक रिवोल्यूशन को शर्मनाक बताया था।
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जो हुआ : मोदी साहेब ने कत्लखानो को दी जा रही सब्सिडी जारी रखी और कटवाई में काम आने वाली मशीनों के आयात शुल्क को 4% घटा दिया। फलस्वरूप मोदी साहेब के शपथ लेने के समय मांस का जो निर्यात 10 लाख मीट्रिक टन था, वह एक वर्ष में बढ़कर 16 लाख मीट्रिक टन हो गया।
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हो न सका : पिंक रिवोल्यूशन को हतोत्साहित करने के लिए आवश्यक क़ानून पास किये जा सकते है। पर इनने इन्हें रोकना नही बल्कि बढ़ाना था।
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20. मोरिशस रूट
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मोरिशस से निवेश करने वाली कम्पनियों को मुनाफे पर टेक्स नही चुकाने होते, इसलिए इस रूट से 1992 से ही बेशुमार धन निवेश किया जा रहा है। काले धन को सफ़ेद करने के लिए भी यह बेहतरीन विकल्प है।
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जो हुआ : इसे वित्त मंत्री रहते मनमोहन ने ही शुरू किया था, वाजपेयी ने इसे जारी रखा, और सत्ता में आकर मोदी साहेब ने इसे ख़त्म करने के लिए अनूठी तरकीब अपनाई। उन्होंने मोरिशस यात्रा के दौरान कहा कि, 'मोरिशस रूट ख़त्म होना चाहिए'। तरकीब ने काम नही किया और मोरिशस रूट ख़त्म नही हुआ।
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हो न सका : मोरिशस रूट को केंसल करने के लिए गेजेट नोटिफिकेशन निकाला जा सकता था।
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20. बलात्कार
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जो हुआ : मोदी साहेब ने निर्भया काण्ड की कसर मीनाक्षी हत्याकांड से पूरी की। बलात्कार की घटनाएं जारी ही नही रही बल्कि और भी बढ़ गयी।
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हो न सका : बलात्कारी का सार्वजनिक नार्को टेस्ट, जूरी द्वारा सुनवाई और राईट टू रिकाल कानूनों को गेजेट में छाप कर इसका समाधान किया जा सकता था।
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इसके अलावा गरीबी, भुखमरी, नक्सलवाद, महंगाई, छोटे स्तर का भ्रष्टाचार आदि शाश्वत समस्याएं शाश्वत रही, तथा इनके निस्तारण के लिए मनमोहन साहेब की तरह ही मोदी साहेब ने भी कोई क़ानून पास नही किये, बल्कि बयानों से इनकी भरपाई करने की कोशिश की।
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मनमोहन साहेब बोलते नही थे और मोदी साहेब रुकते नही है। जिस पर मनमोहन टहल रहे थे मोदी साहेब उसी रास्ते पर सरपट दौड़ लगा रहे है। लेकिन अवाम को अहसास नही हुआ तो उसका कारण मोदी साहेब का हुनर है। मार्केटिंग का हुनर।
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सीने का हिसाब तो मोदी साहेब के अंधभक्तो के पास है, लेकिन इसमें शुबहा नही कि मोदी साहेब की जबान 56 इंच से तो कुछ लम्बी ही है। और यह जबान आरी की तरह चलती रही और मन की बातों में मोदी साहेब 1 साल काट ले गए।
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क़ानून पास करने की जगह साहेब ने स्वच्छता अभियान, योग, खादी आदि पर जनता और देश का अच्छा ख़ासा टाइम पास किया ताकि मूल मुद्दे नेपथ्य में चले जाए। केजरीवाल इस फन में कच्चे निकले और 500 करोड़ के प्रचार बजट का एलान करके निशाने पर आ गए। केजरीवाल को भी भ्रष्टचार दूर करने के लिए गाँव चौपाल पर रिश्वत न देने की शपथ आदि दिलवाने के आयोजन करने चाहिए थे और मिडिया को पैसा देकर उनका सीधा प्रसारण करवाना चाहिए था। प्रचार का प्रचार होता और जनता व्यस्त रहती वो अलग से।
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अभी रुको...थोडा और रुको...रातो रात सब बदल जाएगा क्या... अभी तो बच्चा पैदा भी नही हुआ... अभी अभी तो पैदा हुआ है.. अभी तो दूध के दांत भी नही निकले... अभी तो सिर्फ 5 साल का हुआ है... डिस्टर्ब मत करो यार... देखते जाओ... अभी तो शुरुआत है।
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तो अब क्या करे... राहुल को बना दें क्या पीएम... या केजरीवाल को ? पहली दफा राष्ट्रवादी पीएम आया है... हिंदूवादी भी है, टोपी भी नही पहनता, अब क्या मर जाएँ हम... जिसकी दुम उठा कर देखो मादा ही निकलता है...हुह..!! मंदिर नही बना रहा तो क्या, गिरा भी तो नही रहा है... घुसपेठियो को खदेड़ नही रहा तो क्या, उन्हें बुला तो नही रहा है... हिन्दुराष्ट्र तो ठीक है, पर देश में शरिया क़ानून तो लागू नही होने दिया...!!!
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यदि आप सोच रहे है कि अगले चार साल में कुछ होगा, तो आप गलत सोच रहे है, क्योंकि गाडी उसी दिशा में दौड़ रही है जिस दिशा में वक़्त के साथ नुक्सान बढ़ता जाएगा। यदि राहुल या केजरीवाल को पीएम बना दिया जाता है तब भी स्थिति यही रहेगी, क्योंकि वे भी इन्ही नीतियों को आगे बढ़ाएंगे। इसलिए हमें नेता और सरकारे बदलने की जगह कानूनों को बदलने की जरुरत है।
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हम कैसे कानूनों में बदलाव ला सकते है ?
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नेता या सरकार कोई भी हो, अच्छे क़ानून पास करवाने के लिए सरकार को बदलने की जरुरत नही होती है। किसी भी सरकार से मांग करके इच्छित क़ानून पास करवाए जा सकते है। ये एक बेतुकी बात है कि किसी क़ानून को पास करवाने के लिए नेता को हटा दिया जाए या अगले 5 वर्ष तक इंतिजार किया जाए। नागरिक मौजूदा सरकार से ही इच्छित क़ानून पास करवा सकते है। इसके लिए नागरिको को अपने सांसद को SMS द्वारा वांछित कानूनों के ड्राफ्ट गेजेट में प्रकाशित करने के आदेश भेजने चाहिए।
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राईट टू रिकाल ग्रुप ने देश की सभी समस्याओ जैसे सेना को मजबूत बनाने, अदालतों को सुधारने, हिन्दू धर्म को सशक्त बनाने, तकनीक का विकास करने, स्वदेशी इकाइयो को सरंक्षण देने, सरकारी स्कूलो-अस्पतालों को सुधारने और गरीबी-बेरोजगारी-भ्रष्टाचार आदि के निस्तारण के लिए राइट टू रिकाल/जूरी सिस्टम प्रक्रियाओ के 100 से भी अधिक कानूनी ड्राफ्ट प्रस्तावित किये है। जिन्हे आप righttorecall. info पर देख सकते है। मुख्य ड्राफ्ट्स के लिंक कॉमेंट बॉक्स में दिए गए है।
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करोड़ो नागरिको की ऐसी मांग को किसी भी सरकार द्वारा नजरअंदाज नही किया जा सकता, अत: बहुमत का सम्मान करते हुए प्रधानमन्त्री अमुक कानूनों को गेजेट में प्रकाशित कर देंगे।
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इसलिए नागरिको और कार्यकर्ताओं को नेताओं के स्तुतिगान की जगह उनसे अच्छे कानूनों की मांग करनी चाहिए ताकि नेताओं को बारी बारी से देश के 5 साल नष्ट करने का मौका नही मिले।
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वैसे भी भारत के पास सेना नही है, अत: भारत एक गुलाम देश* है। गुलाम देश के गुलाम नेताओं से देश को बचाने की उम्मीद करके हम अपने नेताओं से ज्यादती कर रहे है। ऐसी स्थिति में सिर्फ करोड़ो नागरिक ही जन आन्दोलन द्वारा देश को बचाने के लिए वांछित क़ानून पास करवा सकते है।
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*गुलाम देश पढ़कर भावुक होने या भड़कने की जरुरत नही है। यही वास्तविकता है। अंग्रेजो के जमाने में भी हम इसलिए गुलाम थे क्योंकि हमारे पास सेना नही थी, और आज भी नही है। तब गुलामी जाहिर थी आज निहां है। इस बात पर ध्यान देना आवश्यक है कि सेना वर्दी से नही बल्कि हथियारों से होती है। और जैसा कि बहुत कम लोगो को ये जानकारी है कि भारत अपने हथियार खुद नही बनाता बल्कि हम आयातित हथियारों से सेना चलाते है। हथियार आना बंद, सेना की दुकान बंद। क्योंकि हमें बनाने भी नही आते। और यही कमजोरी भारत की सभी समस्याओं की जड़ है।
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अच्छी खबर यह है कि ब्रिटिश भारत की तरह आज भारत के नागरिक गुलाम नही है। लेकिन यदि हमने वक़्त रहते अपने खुद के हथियार बनाने शुरू नही किये तो हमारी आजादी एक युद्ध की गुलाम है। जब तक है तब तक है।
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तुम्हारे पावों के नीचे जमीन ही नही,
कमाल यह है कि फिर भी तुम्हे यकीन नही।
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