Pawan Jury BhilwaraRj

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क्या पुदीने की चटनी को राष्ट्रीय चटनी के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए ?
कृपया कमेन्ट बॉक्स में अपनी राय अवश्य रखें !!!
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शासको की भलाई इसी में है कि वे राजनेतिक रूप से जागरूक नागरीको के आक्रोश और असंतोष के गुबार को निकालने के ऐसे रास्ते गढ़ते रहे, जिससे परिवर्तन के लिए आवश्यक आन्दोलन को पनपने से रोका जा सके ।
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सभी प्रकार के चिरकालीन अभाव बहुधा कुंठा पैदा करते है, और यही अभाव उनकी भूख बन जाती है। सार्वजनिक विषयों में नागरिको का सत्ता में भागीदारी का अभाव असंतोष, गुस्सा, आक्रोश जनांदोलन या क्रान्ति के रूप में निकलता है। अत: शासको को लोगो की भड़ास निकाल कर उन्हें ठंडा करने के लिए निरापद माध्यमो की जरुरत होती है।
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भारत की मौजूदा व्यवस्था में 5 वर्ष में एक बार वोट करने के सिवा मतदाताओं को कोई अधिकार प्राप्त नही है। चुनी हुयी सरकार को 5 साल के दौरान 56 हजार फैसले लेने पड़ते है, तथा कार्यकर्ताओं द्वारा इन फैसलों का समर्थन या विरोध करने का कोई वास्तविक लाभ नही है। क्योंकि अव्वल तो भारत में 5 साल के दौरान सरकार द्वारा लिए गए किसी फैसले पर अपनी राय रखने की मतदाताओं के पास कोई अधिकृत प्रक्रिया नहीं है, अत: यह कभी सत्यापित ही नही हो पाता कि सरकार के अमुक फैसले का कितने मतदाता समर्थन या विरोध करते है।दुसरे यदि यह मान भी लिया जाए कि करोड़ो मतदाता सरकार के किसी फैसले के खिलाफ है, तब भी भारतीय नागरिको के पास ऐसी कोई प्रक्रिया नही है, जिससे नागरिक मौजूदा सरकार को पदच्युत कर सके। और यही 5 साला निश्चिंतता सरकारों को एक बार चुन लिए जाने के बाद जनता की और से बेफिक्र बना देती है।
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लेकिन 5 साल तक उन राजनेतिक रूप से सक्रीय कार्यकर्ताओं की ऊर्जा को कहाँ खाली किया जाए,जो कि सरकार के किसी फैसले से आक्रोशित है,पीड़ित है, या अपना विरोध या समर्थन दर्ज करने के लिए कसमसा रहे है, जिन्हें अपना गुबार निकालना है, या जो ज्यादा सक्रिय रूप से भागीदारी चाहते है। यदि इन्हें खुला छोड़ दिया जाए तो इनकी ऊर्जा उन्हें इस समाधान तक पहुंचा सकती है कि 'नागरिको के पास सरकार द्वारा लिए जा रहे फैसलों पर अपना मत प्रकट करने की प्रक्रिया होनी चाहिए'
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तो ऐसी वास्तविक और अधिकृत प्रक्रिया के अभाव में ये नागरिक कार्यकर्ता अपनी भड़ास इस प्रकार के अनुपयोगी और काल्पनिक गतिविधियों पर बिता कर संतुष्ट है, जिनसे उन्हें भागीदारी का अहसास होता है।
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यदि आप गौ माता को बचाना चाहते है तो इसे लाइक करें, एक लाइक बराबर एक वोट है !!!
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यदि आप भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहते है तो इसे इतना शेयर करें कि भारत हिन्दू राष्ट्र बन जाए !!!
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नरेन्द्र मोदी किस परिधान में ज्यादा मारू दिखाई देते है ?
A) बंद गले के जोधपुरी सूट में
B) या कुरता, चूड़ीदार और सदरी में
यदि आप हिन्दूवादी है तो ही इस पर वोट करे।
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यदि आप मोदी साहेब के कार्यकाल से 100% संतुष्ट है, तो कमेन्ट करे, यदि 50% सहमत है तो लाइक करें, ऊहापोह में है तो शेयर कर दें !!! (सिकुलर इसे इग्नोर करे)
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सिर्फ कट्टर हिन्दुओ के लिए---- औवेसी का आप क्या करना चाहते है, 1 लाइक= 1 झापड़, 1 कमेन्ट = 1 जूता
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इससे सत्ता द्वारा जतन से सुरक्षित किया गया घी भी छीजने से बच जाता है, और प्रतीकात्मक रूप से कार्यकर्ता चुपड़ी हुयी रोटी खाने का सुख भी पा जाते है ।
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एक समय की बात है, एक कंजूस व्यापारी के पास घी से भरा मर्तबान था जिसे वह संदूक में बंद करके रखता था। घी बचाने के लिए नित्य वह रोटियां पकाकर उन्हें बर्तन के ऊपर घुमा फिरा कर खाते थे। इस प्रकार उन्हे घी की हानि होती थी साथ ही यह संतोष भी बना रहता था कि वह चुपड़ी हुयी रोटियां खा रहे है। एक बार व्यापारी का अन्य गाँव में जाना हुआ। लौटकर उसने पुत्र से कहा कि संदूक की चाबियां तो मैं भूले से साथ ही ले गया था, तुम्हे लुखी रोटियों का सेवन करना पड़ा होगा। पुत्र ने जवाब दिया, असुविधा की कोई बात नही, हमनें रोटियों को चुपड़ने के लिए उन्हें संदूक के ऊपर फिरा लिया था।
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अत:, यदि यह भ्रमित, और कसमसाए सक्रीय कार्यकर्ता अपना अधिकाँश समय निंदा/प्रशंसा रस के आस्वाद में तथा फिजूल के मतदान, सर्वेक्षण आदि में खुद को खपाए रखते है, तो सरकार को इससे राहत मिलती है। असल में कई ऐसे राजनेतिक कार्यकर्ता आजकल बड़े पैमाने पर खुद के चुनाव आयोग और सर्वेक्षण इकाइयां चला कर अपनी भड़ास सोशल मिडिया पर निकाल रहे है।
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जनता को अधिकार देने का मतलब है कि नेताओं और शासको के अधिकारों में कटौती । अत: सभी सरकारे/पार्टियाँ/नेता आदि अपने अधिकारों में कटौती करके जनता को दिए जाने के न पक्ष में रहे है न ही रहेंगे। जैसे-जैसे जनता में जागरूकता आयी और उन्हें भागीदारी की प्रक्रियाओं की जानकारी मिली, वैसे वैसे जनता ने अपने अधिकारों को बढाने की मांग की। चूंकि संख्या बल के लिहाज से जनता की तुलना में शासक मुट्ठी भर होते है, इसलिए शासक कभी नही चाहते कि जनता अपने समर्थन या विरोध को अधिकृत और संगठित तरीके से रख सके। क्योंकि ऐसा होने से 5 साल तक किये जा रहे सभी फैसलों पर 'जनता हमारे साथ है' का लेबल लगाने का उनका पैंतरा खटाई में पड़ जाएगा ।
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जहाँ तक समस्याओं के समाधान के लिए लाइक शेयर करने की मुहीम चलाने की बात है, इससे वास्तविक रूप से एक पत्ता भी नही हिलता, अत: इस जुगत का खुद की और दुसरो की ऊर्जा को नष्ट करने के सिवा इसका कोई फल नही। अत: देश की जानबूझकर या अनजाने में अपना और औरों का समय नष्ट करने की जगह हमें ऐसे क़ानून को लागू करवाने का प्रयास करना चाहिए जिससे आम मतदाता 5 साल के दौरान भी सरकार के सम्मुख अपनी शिकायत/सुझाव/प्रस्ताव/समर्थन/विरोध आदि पारदर्शी, अधिकृत और संगठित तरीके से रख सके। इसके लिए हमें जिस क़ानून की आवश्यकता है उसका खाका इस तरह हो सकता है।
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टी सी पी----transparent complaint procedure/पारदर्शी शिकायत प्रणाली का प्रस्तावित कानूनी ड्राफ्ट, जिसे गेजेट में प्रकाशित करने की हमें मांग करनी चाहिए :
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1. [जिला कलेक्टर के लिए निर्देश]
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यदि कोई नागरिक मतदाता कलेक्टर कार्यालय में उपस्थित होकर कोई शपथपत्र प्रस्तुत करता है तो कलेक्टर उसे 20 रू प्रति पृष्ठ की दर से शुल्क लेकर उसे दर्ज करेगा, और इस शपथपत्र को स्कैन करके प्रधानमन्त्री की वेबसाईट पर डाल देगा।
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2. [पटवारी के लिए निर्देश]
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यदि कोई नागरिक मतदाता पटवारी कार्यालय में अपने मतदाता पहचान पत्र के साथ उपस्थित होकर, धारा एक के तहत दर्ज किये गए किसी शपथपत्र पर हाँ या ना दर्ज करता है तो पटवारी 3 रू शुल्क लेकर उसे दर्ज करेगा और इस हाँ या ना को प्रधानमन्त्री की वेबसाईट पर डाल देगा ।
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3. [सभी के लिए निर्देश]
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यदि देश के कुल मतदाताओं के 51% मतदाता किसी शपथपत्र पर हाँ दर्ज कर देते है तो प्रधानमन्त्री उस पर कार्यवाही कर सकते है या नही भी कर सकते है। प्रधानमन्त्री का फैसला अंतिम होगा।
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इस क़ानून के गेजेट में प्रकाशित होने से भारत के नागरिको को अपनी बात अधिकृत रूप से सरकार के सम्मुख रखने का अवसर मिलेगा तथा मतदाता देश की गंभीर समस्याओं जैसे अशिक्षा, गरीबी, बेरोजगारी, बांग्लादेशी घुसपेठ, आरक्षण, महंगाई, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का बढ़ता नियंत्रण आदि के समाधान पर अपने सुझाव दर्ज करवा सकेंगे। इस क़ानून को राज्य स्तर पर सभी राज्यों में भी लागू किया जा सकता है, तथा कलेक्टर हाँ या ना के लिए मोबाईल द्वारा SMS भेजने की प्रक्रिया भी बना सकते है।
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बेहतर है कि खुद आपस में ही डबके खाने की जगह हमें ऐसे क़ानून की मांग करनी चाहिए जो नागरिको और कार्यकर्ताओं को सरकारों से संवाद स्थापित करने की प्रक्रिया उपलब्ध कराये। इस कानूनी ड्राफ्ट का नागरिको में प्रचार करें तथा अपने क्षेत्र के सांसद को SMS भेज कर यह मांग करे कि टी सी पी के कानूनी ड्राफ्ट को गेजेट में छापा जाए।
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sms का नमूना :
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Hon mp, I order you to print mentioned law draft in tinyurl .com/PrintTcp
voter ID : ######
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