Pawan Jury BhilwaraRj

Vipul Prakash Rrg:

महाराष्ट्र और हरियाणा का गोवंश हत्या विरोधी कानून कितना कारगर?क्या है समाधान?
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सभी भाजपा/संघ/नमो समर्थक महाराष्ट्र और हरियाणा सरकारों द्वारा बनाए गये गोवंश हत्या विरोधी अधिनियमों के लिये सरकार की पीठ ठोक रहे हैं। और अपने नेताओ की शान में कसीदे पढ रहे हैं मगर शायद ही उनमे से १% ने भी इन अधिनियमो का अध्ययन किया है जो कि आनलाईन उपलब्ध हैं।
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महाराष्ट्र एनिमल प्रिसर्वेशन ऐक्ट १९७६ के तहत गाय और ब्छडे की हत्या पर ६ महीने की सजा का प्रावधान था। जिसे १९९५ में संशोधित करके गाय बैल और सांड तीनो की हत्या गैरकानूनी करार दी गयी और सज़ा की अवधि बढाकर ५ साल कर दी गयी है। इस संशोधित कानून को राष्ट्रपति की सहमति २०१५ मे मिली है
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और साथ साथ इस संशोधन के सेक्शन ६ मे ये प्रावधान जोडा गया कि - "कोई भी व्यक्ति गाय बैल इत्यादि को काटने के लिये अथवा यह जानते हुए कि इन्हे काटा जा सकता है , महाराष्ट्रा के बाहर नही ले जाएगा
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और सेक्शन ९ में पुलिस आफ़िसरो को चेकिंग करते समय निर्धारित करने का अधिकार दिया है कि- "यह व्यक्ति वाकइ काटने के लिये गाय बैल ले जा रहा है अथवा नही या फ़िर यह जानता है कि इन गाय बैलो को काटा जा सकता है अथवा नही। "
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इसके कारण कोई भी व्यक्ति पुलिस को गुमराह करके अथवा रिश्वत खिलाकर गाय बैल से लदे हुए ट्रक महाराष्ट्र से तेलंगाना याफ़िर गोवा अथवा केरल लेजाकर उन्हे काट सकता है.
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इसका सबसे बडा सबूत यह है कि इस प्रकार का प्रावधान "पंजाब प्रोहिबिशन आफ़ काऊ स्लाटर ऐक्ट १९५५ "(जो कि हरियाणा और हिमाचल पे भी लागू था ) के "हरियाणा राज्य संशोधन १९८०" के सेक्शन ३ और सेक्शन ५ मे भी थे। और वहीं से महाराष्ट्र सरकार ने अपने यहां कॉपी पेस्ट किया। मगर हरियाणा की वर्तमान सरकार ने स्वयं स्वीकार किया कि "वहां का मौजूदा कानून गोहत्या अथवा गायों की तस्करी रोकने मे असमर्थ सिद्ध हुआ क्योंकि अपराधियों अथवा आरोपियों को अदालत द्वारा दोषी ठ्हराए जाने और सजा देने की दर बहुत कम थी। "
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इससे स्पष्ट है कि पुलिस और जज को घूस देकर गो तस्करी और गोहत्या धडल्ले से होती थी। अब क्या महाराष्ट्र सरकार को भी हरियाणा सरकार की तरह ४० -५० साल लगेंगे यह स्वीकारने मे?
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मगर बात यही खत्म नही होती है, हरियाणा सरकार ने जो वर्तमान मे गोसंरक्षण और संवर्धन अधिनियम पास किया है उसमे सिर्फ़ सजा की अवधि को बढाकर १० साल कर दिया है और साथ ही यह प्रावधान किया है कि " हरियाणा राज्य से किसी भी ऐसे राज्यो मे गायो/बैलों को निर्यातित नहीं किया जा सकता जहां गोहत्या पे प्रतिबंध नही हो। मगर ये प्रावधान तो दिल्ली के गोहत्या विरोधी कानून में १९९४ से ही है तो क्या वहा पर गायों का निर्यात पुलिस को घूस देकर नहीं हो रहा है? और तो और दिल्ली के अंदर भी घूसखोरी द्वारा गोहत्या हो रही है.
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यानि कि हरियाणा सरकार ने भी प्रतिबंध का दायरा और सज़ा की अवधि बढा दी है मगर ऐसा कुछ नहीं किया जिससे कि आरोपियों /अपराधियों को स्ज़ा मिलने की दर में वृद्धि आए जो कि हरियाणा सरकार ने स्वीकार किया कि हरियाणा के पहले वाले कानून से नहीं हो रहा था और जिसके कारण गोहत्या और गो तस्करी पे लगाम नही लग रही थी.
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यानि कि इन दोनो राज्यों में गोहत्या बंदी कानून के नामपर दूसरे राज्यों से कॉपी पेस्ट करके ऐसे प्रावधान जोड दिये गये हैं जो कि खुद अपने ही राज्यों मे गोहत्या/गो तस्करी बंद करवाने मे असमर्थ थे.और अंधभक्त लोग बिना कानून के ड्राफ़्ट को पढे हुए गोहत्या बंदी का ढिंढोरा पीट रहे हैं.
क्या है समाधान
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गोहत्या/गो तस्करी पे लगाम तभी लगेगी जब अपराधियों को सजा मिलनी शुरू होगी इसके लिये जरूरी है कि:-
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1. पारदर्शी शिकायत प्रणाली:-संक्षिप्त में ये मांग केवल एक लाइन की है कि नागरिक के पास विकल्प हो कि वो अपना एफिडेविट निश्चित सरकारी दफ्तर जाकर प्रधानमंत्री की वेबसाइट पर स्कैन करवा सके ताकि उस एफिडेविट को उसके वोटर आई.डी. नंबर के साथ, बिना लॉग-इन के सभी उसे देख सकें | इस एक लाइन सरकारी आदेश-क़ानून द्वारा आने से सबूतों को दबाया नहीं जा सकेगा ; जनता के सामने सबूत दबाने का प्रयास करने वाले की जनता में सबूत सहित पोल खुल जायेगी |

2. राईट टू रिकॉल जिला पुलिस चीफ़ का कानून बने ताकि पुलिस आफ़िसर घूसखोरी करके अपराधियों को गोतस्करी करने दें तब जनता वोट डालकर जिला पुलिस चीफ़ को पद से हटा दे अथवा रिकॉल कर ले
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3. राईट टू रिकॉल जिला जज ताकि जज लोग घूस लेकर अपराधियों को बरी न कर दें
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4. ज्यूरी सिस्टम जिसमे कि वोटर लिस्ट मे से १२-१५ लोग लॉटरी द्वारा हर केस को सुनने तथा उसका फ़ैसला देने के लिये चुने जाते हैं और घूसखोरी नहीं होती ज्यूरी सिस्ट मे यह दुनिया के उन सब देशों मे सिद्ध हो चुका है जहां जहां ज्यूरी सिस्टम है.
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5. ज्यूरी अपराधियों का सार्वजनिक रूप से नारको टेस्ट ले ताकि गोतस्करी मे जितने लोग शामिल हों सबके नाम का खुलासा हो
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6. और सबसे बडी बात ये है कि गोहत्या पे राज्य सरकारों का ही बैन हो गोहत्या पर केंद्र सरकार का बैन निरर्थक सिद्ध होगा। राज्य सरकारों का बैन ही सार्थक हो सकता है क्योंकि जिस राज्य की जनता बडे पैमाने पर गोमांस खाना चाहेगी वह वैसे भी पुलिस को घूस देकर खा लेगी क्योंकि पुलिस राज्य सरकारों के अधीन होती है न कि केंद्र सरकार के.
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7. गायों के एक राज्य से दूसरे राज्य निर्यात करने पर पूर्ण प्रतिबंध हो ताकि केरल और नार्थ ईस्ट के राज्यों मे भी गोहत्या रुके क्योंकि इन राज्यों की जनता बडे पैमाने पर गोहत्या की समर्थक है मगर इन राज्यो मे अधिकतर दूसरे राज्यों से आयातित गायें ही काटी जाती हैं क्योंकि यहां केरल की स्थानीय गायों मे बहुत कम मांस होता है
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8. ट्रेक्टर आदि की खरीद पर छूट (सब्सीडी) हर वर्ष 20% कम हो ताकि बैलो की माँग बढ़े, उपज बड़े और गो-हत्या कम हो ।
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इन सभी जरूरी प्रावधानों तथा अन्य भी बहुत से आवश्य्क प्रावधानों से युक्त राईट टू रिकॉल ग्रूप द्वारा प्रस्तावित गोरक्षा कानून इस लिंक पर है>>>tinyurl.com/GoHatyaRokoKanoon
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बहुत सरल हिंदी भाषा मे है। इसे पढिये और वर्तमान मे जितने भी राज्यों मे गोरक्षा के कानून आनलाईन उपलब्ध हैं उन्हे भी पढिये तो आप पाएंगे कि वे कानून समस्या की जड तक बिल्कुल नहीं पहुचते हैं।गोहत्या जिन कारणों से होती है उनका निवारण महाराष्ट्र हरियाणा इत्यादि के कानून बिल्कुल नहीं करते। राईट टू रिकॉल ग्रूप द्वारा प्रस्तावित गोरक्षा कानून खुद पढिये दूसरों को भी पढाइये तथा अपने सांसदो और विधायकों को इस कानून की लिंक एस एम एस इत्यादि से भेजकर उन्हे राजपत्र में छापने की मांग करें.साथ ही साथ गोहत्या बंदी के समर्थन में इस वेबसाईट >>>smstoneta.com पर जाकर अपना नाम एवं वोटर आई डी रजिस्टर करवा के इस कानून के पक्ष मे अपना समर्थन भी दर्ज़ करवा सकते हैं। यहां पूरी पारदर्शिता एवं नागरिक प्रमणिकता के साथ दिखाया जाएगा कि कितने एवं किन किन लोगों ने समर्थन किया है.

References:-

1. महाराष्ट्र एनिमल प्रिसर्वेशन ऐक्ट 1995 ((संशोधन)> http://tinyurl.com/ok425u9
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2. महाराष्ट्र एनिमल प्रिसर्वेशन ऐक्ट 1976 >http://tinyurl.com/q76l4ka
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3. "पंजाब प्रोहिबिशन आफ़ काऊ स्लाटर ऐक्ट १९५५ तथा इसमे १९८५ तक हुए संशोधन>
http://tinyurl.com/o9zy352
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4.दिल्ली एग्रीकल्चर कैटल प्रीसर्वेशन ऐक्ट १९९४>>> http://tinyurl.com/p4x8tm6