Rahul Mehta Gandhinagar LsCandidate

Pawan Jury BhilwaraRj:

किन्ही समूहों या गुटों में होने वाला टकराव धर्म या सभ्यता का टकराव नही है, बल्कि यह टकराव अमुक समूहों की प्रशासनिक, न्यायिक प्रणाली और नेतृत्व के बीच होने वाला टकराव है ।
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निजी लाभ हासिल करने के लिए किन्ही व्यक्तियों के बीच टकराव होना स्वभाविक है, अत: विभिन्न गुटों के बीच संघर्ष पनपते है। किन्तु यदि समूह A तथा समूह B के बीच निरंतर संघर्ष जारी रहता है, तथा न तो समूह A के व्यक्ति समूह B में शामिल होना चाहते है न ही समूह B के व्यक्ति समूह A में शामिल होना चाहते है, तो इसका सबसे स्वीकार्य कारण यह है कि यदि अमुक समूह का विलय अन्य समूह में हो जाता है तो समूह का नेता अपनी शीर्ष स्थिति खो देगा । किन्तु मेरे विचार में यह एक गौण कारण है, मुख्य कारण यह है कि विभिन्न समूहों के अनुयायी कानूनी अधिकार और दंड देने की प्रणालियों की भिन्न प्रक्रियाओं में विश्वास करते है, अत: इसी बिंदु पर मतभेद के कारण दो समूहों का परस्पर विलय नही हो पाता और संघर्ष जारी रहता है ।
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न्याय तथा प्रशासनिक व्यवस्था की कतिपय प्रणालियाँ निम्नांकित है :
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(1) जनसभा (एकत्रीकरण)--- इस प्रणाली में सभी व्यक्ति समय समय पर विवादों के निपटान और विमर्श के लिए इकट्ठे होते है । उदाहरण - इस्लाम ।
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(2a) उत्तराधिकार शासन प्रणाली-- शासक का का पुत्र शासन की बागडोर संभालता है ।
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(2c) चुनाव, जिसमे हटाने/रिकाल करने का अधिकार भी चुनने वालो के पास हो ।
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(2d) अविवाहितो का अल्पतन्त्र--- उदाहरण - कैथोलिक चर्च, आरएसएस आदि ।
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(3a) अधिकारियों का विवेकाधीन आधार पर चयन ( या साक्षत्कार के माध्यम से )
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(4d) लिखित या इसी तरह की वस्तुनिष्ठ परीक्षाओं के माध्यम से अधिकारियों की नियुक्ति ।
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(4a) जज प्रणाली
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(4b) ज्यूरी प्रथा
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इसी तरह की या इन प्रणालियों के मिश्रण से बनी अन्य भी कई प्रकार की व्यवस्थाएं हो सकती है ।
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व्यक्तियों के राष्ट्र जैसे किसी समूह को कई प्रकार की प्रणालियों की आवश्यकता होती है । कुछ प्रणालियाँ एक दुसरे के साथ तालमेल बना कर साथ में लागू की जा सकती है किन्तु कुछ प्रणालियाँ आपस में विरोध मूलक हो सकती है । उदाहरण के लिए जज प्रणाली और जूरी प्रथा में मौलिक विरोधाभास है, अत: इन प्रणालियों में परस्पर समन्वय जटिल हो जाता है । इसी प्रकार अविवाहित अल्पतन्त्र तथा चुनावी प्रणाली जिसमें नागरिको के पास चुने हुए को रिकाल करने की प्रक्रिया हो, में मेल नही हो पाता, फलस्वरूप ये प्रणालियाँ एक दुसरे के अधिकारों का अतिव्यापन करेगी, जिससे संघर्ष बढेगा । किन्तु इसके उलट चुनाव, जिसमे रिकाल करने का अधिकार जनता के पास हो तथा ज्यूरी प्रथा एक दुसरे के साथ समन्वय बना कर कार्य कर सकते, इसी प्रकार जनसभा तथा ज्यूरी प्रथा भी साथ साथ लागू की जा सकती है ।
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अब मान लीजिये कि ,किन्ही दो समूहों की शक्ति बढ़ती है । तो उनके बीच टकराव होना भी तय है । इसे लम्बे समय तक टाला नहीं जा सकता । इस परिस्थिति में मेरी यह अकाट्य मान्यता है कि 'सिर्फ वही समूह टिका रहेगा जिस समूह की न्यायिक/प्रशासनिक व्यवस्था ज्यादा शक्तिशाली है, न कि वह जिस समूह का दर्शन, धर्म और मान्यताएं ज्यादा प्रभावी है'।
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किन्तु यदि दोनों समूह समान तथा बेहतर न्याय/प्रशासनिक प्रणालियों का निर्वाह कर रहे है तो इनमे से कोई भी समूह एक दुसरे पर जीत हासिल नही कर सकेगा, फलस्वरूप दोनों समूह मतभेदों और छिटपुट संघर्षो के बावजूद सह अस्तित्व में निवास करेंगे और उनकी उत्तरजीविता बनी रहेगी ।
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किन्तु यदि समूह A ज्यादा बेहतर न्यायिक और प्रशासनिक प्रणालियों का निर्वाह कर रहा है तो समूह A समय गुजरने के साथ साथ ज्यादा शक्तिशाली होता चला जाएगा ।
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इस हालत में समूह B के पास सिर्फ दो विकल्प है--- 1) या तो वह उन्हीं न्यायिक/प्रशासनिक प्रणालियों को अपने समूह पर लागू करके समूह A के बराबर शक्ति जुटाए, 2) या फिर अपनी कमजोर न्यायिक/प्रशासनिक व्यवस्था को ढ़ोता रहे । इस स्थिति में समूह A समूह B की तुलना में लगातार ज्यादा ताक़तवर होता जाएगा ।
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अंततोगत्वा, समूह A या तो समूह B को मिटा देगा, या उसे ग़ुलाम बना लेगा या फिर समूह A समूह B को आत्मसात/हड़प कर उसके अनुयायियों को दोयम दर्जे का नागरिक बना देगा । शक्तिशाली द्वारा कमजोर को निगल लेने के इस प्राकृतिक सिद्धांत में न कोई दया की अवधारणा है, न ही कोई अपवाद ।
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इतिहास के विभिन्न समूहों के बीच हुए सभी टकरावों और संघर्षो की व्याख्या उपरोक्त वर्णित न्यायिक/प्रशासनिक सिद्धांत की कसौटी पर रख कर समझी जा सकती है ।
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राहुल चिमन भाई मेहता