Pawan Jury BhilwaraRj

'राम अब भी वनवास पर'

ये आरएसएस और बीजेपी ही है, जिनकी वजह से राम मंदिर निर्माण नही हो पा रहा है ।
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अयोध्या में भव्य राम मंदिर निर्माण होना चाहिए - अमित शाह ( चुनाव से पहले )
राम मंदिर निर्माण के लिए मोदी सरकार को 2019 तक का वक़्त दिया जाना चाहिए - सह सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले ( बहुमत मिलने के बाद )
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राजनीति में मुद्दों के मुर्दों को जलाया या जिलाया नही जाता, बल्कि दफनाया और लटकाया जाता है, ताकी वक़्त जरूरत गड़े मुर्दों को उखाड़ा तथा लटको को उतारा जा सके ।
बीजेपी और संघ 1990 से ही राम मंदिर मुद्दे पर जनता की आस्था से खेल रहे है, लेकिन इसके हल के लिए इन्होने कभी कोई कानूनी ड्राफ्ट नही दिए । चुनावी सीज़न में इस बेताल को वोटो की खातिर उतार लिया जाता है, और सत्ता में आकर फिर से डाल पर लटका दिया जाता है ।
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1986 में शाहबानो प्रकरण में तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं को भरण पोषण देने के उच्चतम न्यायालय के फैसले को मुस्लिम वोट के लिए राजीव गांधी ने संसद में क़ानून बना कर पलट दिया था । इस फैसले से भारत में साम्प्रदायिक राजनीति की शुरुआत हुयी, जिसकी प्रतिक्रिया स्वरूप वाजपेयी और आडवानी साम्प्रदाय वाद को राजनीति की मुख्य धारा में ले आये ।
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1526 में सिर्फ 20,000 घुड़सवार लेकिन अपने उन्नत तोपखाने के चलते पानीपत में इब्राहीम लोदी को हराकर बाबर ने मुगल सल्तनत की स्थापना की थी ।1527 में बाबर ने खानवा के युद्ध में राणा सांगा को हराया, बाबर के सिपहसालार मीर बाक़ी ने आगरा क्षेत्र में बड़े पैमाने पर कत्ले आम किया और शरियत क़ानून लागू कर दिया। अयोध्या में राम चन्द्र जी के मूल मंदिर का जीर्णोद्वार 2100 वर्ष पहले शकारी विक्रमादित्य द्वारा कराया गया था, जिसे ध्वस्त कर के मीर बाक़ी ने मस्जिदनुमा ढांचा खड़ा करवा दिया, किन्तु अजान के लिए मीनारों और वज़ू के हौदो का निर्माण नहीं हो सका । वस्तुत: ढाँचे में नमाज़ पढ़ने तथा तलावत करने की रस्मे कभी अदा न हो सकी ।
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^ 1949 में ढाँचे के मुख्य गुम्बद के नीचे मध्यरात्री में रामलला प्रकट हुए, साम्प्रदायिक तनाव की आशंका के चलते जवाहर लाल गाज़ी ने मुख्य इमारत पर ताला लगवा दिया किन्तु एक पुजारी को सुबह शाम पट खोलकर पूजा आदि करने की अनुमति दी।
^ 1983 से विहिप ने विवादित स्थल पर भव्य राम मंदिर तथा मथुरा और काशी में क्रमश: कृष्ण तथा विश्वनाथ मंदिर के निर्माण के लिए आन्दोलन को तेज कर दिया ।
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शाहबानो प्रकरण में कोर्ट के फैसले को संसद ने क़ानून बना कर पलट दिया था, इसे मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति के तौर पे देखा जा रहा था, आडवाणी ने हिन्दुओ के ध्रुवीकरण का यह अच्छा मौका पाया और मंदिर मुद्दे को लपक लिया । राजीव ने हिन्दुओ को चिपकाये रखने के लिए राम मंदिर का ताला खुलवा दिया जिस से मामले ने तूल पकड़ लिया ।
1980 में जनता पार्टी के विखंडन के बाद बीजेपी की स्थापना हुयी थी, और 1986 के चुनाव में बीजेपी को सिर्फ दो सीटो से ही संतोष करना पड़ा था।
यह मंदिर आन्दोलन ही था जिसे बीजेपी ने विहिप से हाईजेक किया और मात्र 10 वर्ष में सीटो की संख्या 2 से बढ़कर 186 हो गयी ।
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जैसा कि विहिप अध्यक्ष अशोक सिंघल ने 2010 में खुलासा किया कि, आडवाणी ने रथ यात्रा की घोषणा करने से पहले न तो उन्हें सूचित किया था, न ही उनसे इस सम्बन्ध में मशविरा किया गया था । सिंघल का मानना है कि आडवाणी की रथ यात्रा ने मंदिर आन्दोलन को राजनेतिक रंग देकर कमजोर कर दिया था ।
ज्ञातव्य है कि 1989 से पहले तक मंदिर निर्माण का मुद्दा एक जनांदोलन के रूप में उभर रहा था, जिसका नेतृत्व विहिप कर रही थी । आडवाणी की रथ यात्रा ने इसे राजनेतिक मुद्दा बना दिया और हिन्दू राष्ट्रवादी संघठनो का विलय बीजेपी में होने लगा ।
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आरएसएस और विहिप के सहयोग से बीजेपी की राजनेतिक शक्ति बढ़ती रही, हिंदुत्व को धार देने के लिए बीजेपी ने समान नागरिक संहिता तथा धारा 370 जैसे मुद्दों को भी प्रखरता से उठाना शुरू कर दिया।
इस समय वी पी सिंह मंडल की राजनीति में व्यस्त थे, अत: बीजेपी और आरएसएस ने कमंडल को कस कर पकड़ लिया । वीपी की सरकार बीजेपी के समर्थन से ही चल रही थी, किन्तु बीजेपी ने समर्थन वापिस लेने की जगह आन्दोलन करना ज्यादा 'मुनासिब' समझा ।
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1989 से 1992 में ढांचा गिराने तक, और 1992 से 1998 में सत्ता में आने तक, बीजेपी आरएसएस और विहिप के नेताओं ने मंदिर, UCC तथा धारा 370 पर हज़ारो स्पीचे दी, सेंकडो नारे गढ़े, करोड़ो बयान दिए ।
लाखों लोगो को बुलाकर ढांचा गिराया गया, मंदिर निर्माण के लिए श्री राम की सौगन्धे खायी गयी, सेंकडो कार सेवक खेत रहे, जवाबी कार्यवाही में मुंबई में बम धमाके हुए, साम्प्रदायिकता राजनीति का अनिवार्य तत्व हो गया, करोडो टन कागज़ इस मुद्दे पर पोते गए, असीमित बहस मुहासिबे हुए ।लेकिन सत्ता में आते ही यह मुद्दा ठन्डे बस्ते में चला गया। बीजेपी का बहाना था कि हमारे पास 272 का आंकड़ा नही था ।
साढ़े छ: वर्ष सत्ता भोग के बाद ज्योहीं बीजेपी विपक्ष में आई, वैसे ही फिर से मंदिर मुद्दे के गीत गाये जाने लगे ।
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1995 में राष्ट्रपति डॉ शंकर दयाल शर्मा ने संविधान के अनुच्छेद 143 (अ) के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय से प्रश्न किया कि :
'क्या विवादित स्थल पर ढाँचे के निर्माण से पूर्व वहां कोई हिन्दू मंदिर या धार्मिक इमारत थी ?'
उच्चतम न्यायलय ने प्रश्न इलाहबाद उच्च न्यायलय को भेज दिया, जो इस मामले की सुनवाई 1949 से ही कर रहा था ।
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2003 में उच्च न्यायलय की देख रेख में पुरातत्व विभाग ने विवादित स्थल की खुदाई की, खुदाई के दौरान निष्पक्षता बनाए रखने के लिए, दोनों पक्षकारो तथा उनके अधिवक्ताओ को उपस्थित रहने की अनुमति दी गयी । यह भी सुनिश्चित किया गया कि मजदूरों की कुल संख्या में 40% मजदूर मुस्लिम समुदाय के हो तथा खुदाई के प्रत्येक चरण के छाया चित्र लेकर विडिओग्राफी की जाए ।
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खुदाई के दौरान ढाँचे के नीचे 64 खंबो का आधार तथा धार्मिक शिला लेख प्राप्त हुए। सर्वे टीम ने रिपोर्ट दी कि ढाँचे के नीचे विशाल धार्मिक इमारत मौजूद है, जिसे ध्वस्त कर ढाँचे का निर्माण किया गया ।
इलाहबाद उच्च न्यायलय की तीन सदस्यीय बेंच ने 2010 में एकमत से यह फैसला सुनाया कि 'ढाँचे के निर्माण से पूर्व विवादित स्थल पर धार्मिक इमारत थी, जिसे ध्वस्त कर ढांचा खड़ा किया गया ।
तीन सदस्यीय बेंच में न्यायमूर्ति एस यू खान भी शामिल थे ।
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1989 से ही मंदिर मुद्दा बीजेपी और संघ का प्रिय मुद्दा रहा है । लेकिन बीजेपी और संघ ने इसका समाधान कभी प्रस्तुत नही किया । जब बीजेपी और संघ सत्ता से बाहर होते है, तो भड़काऊ बयान और नारे लगाकर इस मुद्दे को उभारते है, ताकि मंदिर भक्तो तथा हिन्दू वादी वोटो को खिंचा जा सके और सत्ता में आते ही गप कर जाते है । 2014 के आम चुनाव से पहले तक राम मंदिर का मुद्दा बीजेपी के एजेंडे में हमेशा से प्रमुखता से छाया रहा, किन्तु 2014 के एजेंडे में बीजेपी ने राम मंदिर के मुद्दे को अंतिम पृष्ठ पर छापा ताकि फाड़ के फेंकने से पूरी किताब के पृष्ठों की संख्या में बदलाव न करना पड़े ।
आम चुनाव में साक्षत्कार के दौरान जब नमो से इस सम्बन्ध में सवाल पूछा गया तो, नमो ने कोलर माईक निकाल कर एंकर को थमा दिया, और नमस्कार कर के निकल गए ।
दरअसल मोदी काफी पहले ही ताड़ चुके थे कि, मंदिर मुद्दा घिस चुका है और 2014 के चुनाव के लिए ब्रांड गोधरा ज्यादा मुफीद रहेगा ।
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इस बात पर कोई बहस नही कि मोदी MNCs और मिशनरीज़ के तोड़ू दबाव में होने के कारण सेना को मज़बूत करने, ज्यूरी सिस्टम लाने, 370 को ख़त्म करने, UCC लागू करने और FDI को रोकने में सक्षम नहीं है, लेकिन मंदिर निर्माण जैसे मुद्दे की अवहेलना समझ से परे है । आखिर पेट भर के FDI की अनुमति देने के बदले MNCs और मिशनरीज़ से मोदी मंदिर निर्माण की अनुमति तो ले ही सकते है ।
क्योंकि मंदिर निर्माण जैसे प्रतीकात्मक मुद्दे से MNCs और मिशनरीज़ को कोई नुक्सान नही होगा, जबकि बीजेपी और संघ का हिन्दू वोट बेंक और भी मज़बूत हो जाएगा ।
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समाधान :

1. संविधान संसद को ये शक्ति देता है कि वह किसी भी विषय पर क़ानून बना कर विवाद का निपटारा कर सकती है ।
न्यायधीन मामले को एक कमेटी को स्थानांतरित किया जा सकता है, जो रोज सुनवाई करे और ज़ल्दी से ज़ल्दी फैसला सुना दे। पश्चात संसद अपनी शक्ति का प्रयोग करते हुए विवादित स्थल की पूरी भूमि को अधिगृहित कर के राम मंदिर निर्माण समिति को दान कर दे । इस तरह इस मुद्दे को 4-6 माह में हल किया जा सकता है ।
* ज्ञातव्य है कि ढाँचे के ध्वस्त होने के बाद पीवी नरसिम्हा राव ने रामलला की सुरक्षा के लिए 1993 में अध्यादेश पारित कर के 67 एकड़ विवादित भूमि का अधिगृहण कर लिया था ।
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2. टीसीपी ( ट्रांसपरेंस कम्प्लेन प्रोसीज़र ) का कानूनी ड्राफ्ट गेजेट में छापा जाए । इस क़ानून के छपने के बाद पीएम की वेबसाईट पर यह प्रस्ताव रखा जाएगा कि 'क्या विवादित स्थल पर राम मंदिर का निर्माण किया जाना चाहिए ?'
सभी भारतीय मतदाता इस प्रश्न पर अपनी हाँ/ना पटवारी की कचहरी में जाकर दर्ज करेंगे ।
यदि 41 करोड़ (कुल मत 80 करोड़) मतदाता हाँ दर्ज कर देते है, तो संसद बहुमत का सम्मान करते हुए मंदिर निर्माण का क़ानून पास कर देगी ।
*टीसीपी के ड्राफ्ट के लिए नीचे दी गयी वेबसाईट देखे ।
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3. यह जज सिस्टम ही है जिसके कारण 63 वर्षो से यह मुकदमा घिसट रहा है, त्वरित और निष्पक्ष फैसले के लिए हमें नागरिको की ज्यूरी द्वारा सुनवाई करनी चाहिए ।
2500 से 10,000 नागरिको की एक ज्यूरी बनायी जाए, जो इस मुकदमे की रोजाना सुनवाई करे । नागरिको का चयन देश की मतदाता सूची से अनियमित तौर पर किया जाएगा ।
यह ज्यूरी जो भी फैसला करे उसे निष्पादित किया जाए ।
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प्रजा अधीन राजा समूह ने राम-कृष्ण जन्म भूमि तथा काशी विश्वनाथ देवालय के निपटान के लिए कानूनी ड्राफ्ट्स का प्रस्ताव किया है, जिन्हें आप इस वेबसाईट पर देख सकते है :
rahulmehta . com/301 . h . htm
(chapter- 35, 21, 3)
सभी नागरिको से निवेदन है कि अपने क्षेत्र के सांसद को SMS द्वारा ऑर्डर भेजे कि इन कानूनी ड्राफ्ट्स को गेजेट में छापा जाए ।

प्रजा अधीन राजा @ pk