Rahul Mehta Gandhinagar LsCandidate
नमो ने IMF के एजेंट अरविन्द सुब्रमनियन को प्रमुख आर्थिक सलाहकार नियुक्त किया है। इससे पहले वे IMF/ WB (विश्व मुद्रा कोष एवं विश्व बैंक) के एजेंट नृपेन्द्र मिश्रा को प्रधान मंत्री कार्यालय में सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी के पद पर नियुक्त कर चुके हैं !! यही नमो रॉकफेलर के एजेंट प्रोफेसर भगवती को भारतीय अर्थव्यवस्था में आवश्यक सुधारों सम्बन्धी सलाह देने के लिए आमंत्रित करते हैं।
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अनेक प्रशासनिक अधिकारी, अर्थशास्त्री आदि विश्व मुद्रा कोष एवं विश्व बैंक में नौकरी कर लेते हैं। लेकिन इनमे से कोई छह महीने भी यहाँ तभी टिक कर रह सकता है यदि वह इस बात को तहे दिल से स्वीकार करे कि "गोरे लोगों को काले लोगों पर शासन करने का पूरा हक़ है।" यदि किसी व्यक्ति में राष्ट्रीयता की भावना का एक कतरा भी होगा तो वह छह माह के अंदर यहाँ से भाग खड़ा होगा। नृपेन्द्र मिश्रा ने IMF/ WB में पांच साल बिताये हैं, वही अरविन्द सुब्रमनियन ने भी कई साल IMF में बिताये हैं। इससे भी कड़वा घूँट हमे यह पीना पड़ रहा है कि महमूद गज़नी की 25 वीं पीढ़ी के वंशज रघुराम गज़नी हमारे रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया (RBI) के गवर्नर बन गए !!
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इस प्रकार से IMF\Wb के एजेंटों को महत्वपूर्ण पदो पर बैठाने का सर्वप्रमुख प्रभाव यह होगा कि पूरे भारत में FDI को बढ़ावा मिलेगा। इससे बड़े पैमाने पर अल्पकालिक समृद्धि आएगी। मैं पुनः दोहराता हूँ-- मैंने कुछ गलत टाइप नही किया --- बड़े पैमाने पर FDI से अल्पकालीन समृद्धि आएगी, किन्तु जैसे ही विदेशी मुद्रा प्रत्यावर्तन की समस्या सामने कड़ी होगी, सारी समृद्धि फुर्र हो जाएगी।
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अपने भाषणो में SoMoKe हमेशा FDI का पक्ष लेते हैं। एके ने भी रिटेल को छोड़कर हर क्षेत्र में FDI का समर्थन किया है और अपने चार सांसदों से भी कहा है कि वे FDI के खिलाफ संसद में कोई प्राइवेट मेंबर बिल पेश न करें। सोनिया तो 1991 ई. से ही FDI की समर्थक रही हैं. नमो ने तो यह कहकर हद ही पार कर दी कि FDI= First Develop India (प्रत्यक्ष विदशी निवेश= पहले भारत का विकास) !! SoMoKe ने कभी भी विदेशी मुद्रा प्रत्यावर्तन से उत्पन्न होने वाले संभावित संकट के बारे में जनता को नही बताया।
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विदेशी मुद्रा प्रत्यावर्तन से उत्पन्न होने वाला संकट कितना गंभीर है? इस सम्बन्ध में एक अच्छी बात यह है कि ऐसा प्रति वर्ष नही होता। लेकिन दुखद बात यह है कि जब ऐसा घटित होगा तो यह प्रलय से भी भयंकर होगा और सब कुछ समाप्त कर देगा। चूँकि यह संकट हर वर्ष नही आता, इसलिए मतदाता और कार्यकर्ता बिकाऊ मीडिया के इस झांसे में आ रहे हैं कि ऐसा कभी नही होगा !! जब ऐसा होगा तो सब कुछ ख़त्म हो जायेगा।
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उदाहरण के लिए SoKo ने 1960 के दशक में भारी पैमाने पर FDI को स्वीकृति दी। और 1997 ई. में पहली बार विदेशी मुद्रा प्रत्यावर्तन से उत्पन्न बड़ा संकट सामने आया। उस समय Daewoo जैसी कंपनी ने भी स्वयं को जनरल मोटर्स के हाथों बेच दिया। और SoKo की आधी से भी ज्यादा बड़ी कम्पनियाँ विशाल विदेशी मुद्रा के कर्ज के बोझ तले दब कर या तो समाप्त हो गयी या अधिगृहीत कर ली गयी !! मिशनरियों की ताकत इतनी बढ़ गयी कि अगले 15 वर्षों में बौद्ध धर्म के अनुयायियों की संख्या 75% से घटकर 30% से भी कम हो गयी।
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विश्व मुद्रा कोष और विश्व बैंक के एजेंटों का हमारे आर्थिक प्रशासन में सर्वोच्च स्थान हासिल करते जाना ही बहुत कुछ बता रहा है। यह FDI द्वारा आनेवाली अल्पकालीन किन्तु बड़े पैमाने पर आर्थिक समृद्धि तथा उसके बाद आनेवाले विदेशी मुद्रा संकट का खुला संकेत है।
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इसका मेरे द्वारा प्रस्तावित समाधान वही है जो मैं 1998 ई. से ही प्रस्तावित करता आ रहा हूँ। हम सभी कार्यकर्ताओं को चाहिए कि रिजर्व बैंक गवर्नर के रिकॉल के लिए ड्राफ्ट को राजपत्र में प्रकाशित करने का प्रयास करें। साथ ही वित्त मंत्री, प्रधान मंत्री आदि पदों के लिए भी राइट टू रिकॉल का प्रावधान लागू कराने का प्रयास हमें करना चाहिए। हमें ऐसे कानून ड्राफ्टों की भी आवश्यकता है जिनके द्वारा भारतीय फैक्ट्री मालिको तथा मजदूरो की कमिया दूर की जा सके। इनमे ज्यूरी प्रणाली, राइट टू रिकॉल न्यायाधीश, डीडीएमआरसीएम, टीसीपी, संपत्ति कर, जीएसटी/ वैट/ सेवा कर/ सीएसटी आदि को हटाना आदि मुख्य हैं। इसके लिए सबसे पहले हमें नेताओं की अंध- भक्ति छोड़कर अपने सांसद को एसएमएस द्वारा आदेश भेजना होगा, ताकि वे इन कानून ड्राफ्टों को राजपत्र में प्रकाशित कराएं। कृपया देखें- tinyurl. com/RahulMehtaSms
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एक अन्य विचारणीय मुद्दा :
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गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने भारत की समस्याओं के लिए पश्चिमी शिक्षा प्रणाली को दोषी ठहराया !! और फिर उन्ही गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने शिक्षा में FDI लागू किये जाने का स्वागत किया। इतने बड़े विरोधाभासी बयानों पर आरएसएस कार्यकर्ताओं ने ध्यान तक नही दिया !! यह अंधभक्ति नही तो और क्या है? 150 आईक्यू वाले व्यक्ति भी यदि किसी के अंध- भक्त बन जाएँ तो वे शाहरूख खान के फैन की तरह व्यवहार करने लगते हैं।
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100 करोड़ रूपये से भी अधिक रकम खर्च कर के बिकाऊ मीडिया के सहयोग से चलाये गए स्वच्छ भारत अभियान से एक अच्छी बात हुई कि इससे एके के झाड़ू- ड्रामा के गुब्बारे की हवा निकल गयी !! नमो की लम्बी छड़ी वाली झाड़ू एके की छोटी झाड़ू से अधिक प्रभावी साबित हुई। एके ने आम आदमी को पुनः अपने पक्ष में करने के लिए फिर से छोटी झाड़ू का प्रयोग करने पर जोर दिया। वही मोदी तो उनसे भी अधिक सावधान निकले, अतः उन्होंने लम्बी छड़ी वाली झाड़ू के प्रयोग पर जोर दिया। जो भी हो, मुझे ख़ुशी है कि एके के झाड़ू- ड्रामा पर विराम लग गया।