Rahul Mehta Gandhinagar LsCandidate

नोबेल प्राइज तो बिकाऊ मीडिया से भी अधिक बड़ा धोखा है। अतः यह प्रश्न ही निरर्थक है कि बिकाऊ मीडिया ने हमें कैलाश सत्यार्थी के बारे में पहले क्यों नही बताया !!
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कुछ लोग बिकाऊ मीडिया के बारे में यह गलत प्रश्न पूछ रहे हैं- " बिकाऊ मीडिया ने हमें कैलाश सत्यार्थी के बारे में पहले क्यों नही बताया?" यह प्रश्न पूछने वाले शायद नोबेल प्राइज को पुरस्कारों का सर्वोच्च मानक समझ रहे हैं।
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शांति, साहित्य, और अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार पश्चिमी देशों के संभ्रांत वर्ग के हाथों में एक ऐसा हथियार है जिसके द्वारा वे भगवान बनकर मनमर्जी की कठपुतलियों को तीसरी दुनिया के देशों में स्थापित करते हैं। बिकाऊ मीडिया और मैग्सेसे अवार्ड का उद्देश्य भी समान है। लेकिन बिकाऊ मीडिया और मैग्सेसे की तुलना में नोबेल पुरस्कार अपने इस उद्देश्य में 10 गुना अधिक कारगर रहे हैं।
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अपने कैरियर के शुरुआती कुछ महीनो में ही प्रत्येक पत्रकार (बिकाऊ पत्रकार) को कुछ बातें बताई जाती हैं। उनमे से एक है बिकाऊ मीडिया को पूर्णतः निष्पक्ष मीडिया के रूप में दर्शाना !! आप किसी भी ऐसे आदमी से पूछ लें जिसने 2 वर्षों तक पत्रकार के रूप में कार्य किया है। वह हमेशा यही कहेगा "कोई भी समाचार बिका हुआ नही होता " . इसका कारण यह है कि उन्हें यह बताया गया होता है कि " यदि आप कभी भी पाठकों को समाचारों के बिके हुए होने का सच बताएँगे तो मीडिया का कोई भी दफ्तर आपको एक ब्रेड तक नही देगा, बटर की तो बात ही भूल जाइये।" इसलिए इस झूठ को ढकना वे सीख जाते हैं।
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दूसरी बात जो उन्हें बताई जाती है वह है जजों, नोबेल प्राइज, मैग्सेसे प्राइज, बुकर प्राइज, पुलित्ज़र प्राइज, आदि का सम्मान करना और उन्हें ही सभी निर्णयों अथवा पुरस्कारों का सर्वोच्च मानक बताना !! उन्हें यह भी सिखाया जाता है कि इन पुरस्कारों के बारे में यह सच वे कभी नही बताएं कि इनका उपयोग पश्चिमी संभ्रांत वर्ग द्वारा अपने एजेंटों को भगवान की तरह स्थापित करने के उद्देश्य से किया जाता है। हालाँकि वे चाहें तो उन व्यक्तियों की आलोचना कर सकते हैं जिन्हे यह पुरस्कार प्रदान किया गया है, लेकिन भूले से भी उन्हें यह नही बताना होता है कि इन पुरस्कारों के आयोजकों की नीयत में कोई खोट है।
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सबसे पहले तो हम इस बात पर ध्यान दें कि हमारे इन शुभेच्छुओं को फण्ड कौन देता है। इन सारे भले कार्यों को करने के लिए ये पैसे कहाँ से लाते हैं। महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि सभी समाचारपत्रों, टीवी चैनलों आदि मीडिया को पैसे कौन देता है। आश्चर्यजनक रूप से ये सभी भले एनजीओ और मीडिया वाले CAG, RTI आदि के उन पर प्रयोग किये जाने का विरोध करते हैं !!
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मेरा प्रस्ताव है कि सभी बिकाऊ मीडिया वालों तथा एनजीओ के सभी बैंक स्टेटमेंट सार्वजनिक किये जाएँ। कोई आश्चर्य नही कि इस प्रस्ताव का विरोध भी सभी एनजीओ वाले और मीडिया वाले करेंगे !!