Rahul Mehta Gandhinagar LsCandidate
मिलों में उत्पादित सूती वस्त्रों तथा खादी में क्या अंतर है?
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दोनों ही कॉटन (कपास) के पौधे से निकली कपास से बनाये जाते हैं।
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खादी का मतलब वैसे सूती कपडे से है जो बिना किसी ऐसी मशीन के प्रयोग के बनाया जाता है जिसमे विद्युत, कोयला, डीज़ल, सौर आदि ऊर्जा का उपयोग होता हो। उदाहरण के लिए मिलों में सूत की कताई के लिए जिस चरखे का उपयोग होता है वह विद्युत ऊर्जा से चलता है। जबकि खादी के निर्माण के लिए चरखा हाथ से चलाया जाता है (हथकरघा)। दोनों में यही एकमात्र अंतर है। यदि चरखा ऑक्स पावर से भी चलाया जाये तो भी यह खादी नही कहलायेगा।
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यदि मिल भारत में अवस्थित है, 100% किसी भारतीय के आधिपत्य में है और उसमे उपयोग की जाने वाली सभी मशीने भी 100% भारत में भारतीयों के द्वारा निर्मित हैं, तब हम कह सकते हैं कि उस मिल का बना कपडा भी 100% स्वदेशी है।
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यदि कोई विदेशी, जैसे मान लीजिये कोई बांग्लादेशी भारत में आकर चरखा चला रहा हो तो उस खादी को स्वदेशी नही कहेंगे।
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सूती वस्त्रों/ कपड़ो पर भारी कर लगाया जाता है। इन पर उत्पाद कर, वैट, सेवा कर, केंद्रीय बिक्री कर, विक्रय कर आदि कई कर लागू हैं। उदाहरण के लिए इनकी फैक्ट्री, गोदाम, विक्रय केन्द्रों आदि को जो नगरपालिका संपत्ति कर (municipal property tax) चुकानी पड़ती है वह अहमदाबाद में आवासीय स्थानो की तुलना में लगभग 7 गुना अधिक है। इन्हे लेबर कानूनो, PF, मजदूर संघ के हड़तालों आदि का भी सामना करना पड़ता है और ज्यादा वेतन भी देना पड़ता है। जबकि खादी की फैक्टरियों, दुकानो आदि को आवासीय की तुलना में मात्र दो गुना अधिक दर चुकानी पड़ती है, लेबर कानून इनपर लागू नही होते और वेतन भी कम देना पड़ता है। उसपर से इसके उत्पादकों को सरकारी अनुदान भी प्राप्त होता है।
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इन सबके बावजूद खादी की तुलना में मिल के सूती कपडे अधिक सस्ते होते हैं!! साथ ही ये ज्यादा मजबूत एवं टिकाऊ भी होते हैं।
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मैं स्वयं पिछले 35 वर्षों से एक खास मिल के बने कॉटन कपडे पहनता आया हूँ (उसका नाम बता कर मैं विज्ञापन करना नही चाहता) . यह 100 रूपये प्रति मीटर की दर से मिलता है, चौड़ाई 3 फ़ीट, अर्थात 10 रूपये प्रति स्क्वायर फ़ीट। इतनी ही लम्बाई चौड़ाई का खादी का कपडा जो कि इससे कम टिकाऊ भी होगा, 150 रूपये प्रति मीटर की दर से मिलता है, अर्थात 15 रूपये प्रति स्क्वायर फ़ीट, जो कि 50% अधिक है। यदि मिल के कॉटन कपड़ों से सभी कर हटा दिए जाएँ और मजदूरों का वेतन भी खादी के जितना हो जाये तो इनकी कीमत आधे से अधिक कम हो जाएगी, अर्थात 50 रूपये प्रति मीटर= 5 रूपये प्रति स्क्वायर फ़ीट। वही यदि खादी को मिलने वाली सब्सिडी हटा ली जाये तो इसकी कीमत लगभग 4 गुना बढ़ जाएगी, अर्थात 200 रूपये प्रति मीटर यानि 20 रूपये प्रति स्क्वायर फ़ीट!!!
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अतः हम कह सकते हैं कि जितने लागत और मजदूरी में 10000 स्क्वायर फ़ीट खादी का उत्पादन होगा, उतने में ही 40000 स्क्वायर फ़ीट मिल के कॉटन कपडे का उत्पादन होगा। हालांकि मिल में मजदूरो की आवश्यकता कम होती है, लेकिन इन मिलो में उपयोग होने वाली मशीनो के निर्माण करने वाली स्वदेशी फैक्टरियों में बड़ी संख्या में मजदूरो को रोजगार मिलेगा।
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यह बहुत बड़ा मिथक है कि मिलों के बने कपडे स्वदेशी नही होते और केवल खादी स्वदेशी है। सच तो यह है कि दोनों ही स्वदेशी हो सकते हैं।
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यह भी एक मिथ्या दावा है कि खादी से लोगो को रोजगार मिलता है। यदि कॉटन मिलों में प्रयोग की जाने वाली मशीने भारत में तथा भारतीयों द्वारा बनाई गयी हों, तथा उनपर लगाये जाने वाले सभी अतिरिक्त कर और खादी को दिए जाने वाले सभी अनुदान हटा दिए जाएँ तो मिलों द्वारा भी उतने रोजगार उत्पन्न होंगे जितने खादी द्वारा होते हैं या हो सकते हैं।
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कॉटन मिलों के कपडे से न सिर्फ लागत में कमी आएगी, बल्कि इसका वास्तविक लाभ तो यह है कि इससे इंजीनियरिंग कौशल बढ़ेगा जिससे आगे चलकर हथियार निर्माण में भी क्रांति आएगी !! इसके बारे में मेरे पिछले पोस्ट में बताया गया है।
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Translation done by Hindi-RTR