Pawan Jury BhilwaraRj
'पार्टी पॉलिटिक्स'
धारावारिक स्तम्भ : भाग - 3
पिछले दो अंको में हमने जाना कि किसी भी पार्टी द्वारा देश के लाखों कार्यकर्ताओ को किस प्रकार बेसिक, सदाबहार और मौसमी मुद्दों में उलझा कर उनका टाइम वेस्ट किया जा सकता है । इस अंक में हम लोकलुभावन मुद्दे और नारों की राजनीति पर चर्चा करेंगे ।
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द - लोकलुभावन मुद्दे - कोई भी पार्टी यदि सीरियस होती है तो इन्ही मुद्दों के प्रति होती है ।
स्थिति यह रहती है कि, यदि किसी पार्टी ने इस श्रेणी के 4 वादे किये है, तो पार्टी 40 वादे पूरे करने की फ़िराक में रहती है ।
विशेषताएं :
- इन्हें कल्याणकारी योजनाओं के नाम से पुकारा जाता है, क्योंकि वोटर को लुभाना एक अपमान जनक क्रिया है, इसलिए ज्यादा सम्मानजनक शब्द' जनकल्याण' का प्रयोग होता है ।
- चुनावी साल में पार्टियाँ इनकी लगभग बारिश सी कर देती है ।
- इन्हें तुष्टिकरण की निति से भी जोड़ कर देखा जाता है ।
किसी भी पार्टी को ध्यान रखना चाहिए कि आपके झोले में जितने ही ज्यादा लोक लुभावन मुद्दे होंगे उतनी अधिक लोकप्रियता पार्टी को मिलेगी ।
कोंग्रेस पार्टी को इसका जनक कहा जाता है और विपक्षी पार्टिया वोट बेंक की पोलिटिक्स और तुष्टिकरण के आरोप दशको से कोंग्रेस पर लगाती रही है, और खुद भी इन्ही में मुब्तिला रही है ।
इन मुद्दों के लिए स्कीमें चलायें । स्कीमें योजनाओं का गुटका संस्करण होती है, मुहं में डाला और मुंह से ही थूक दिया । योजनाये थोड़ी लम्बी और बड़े स्तर की भी हो सकती है, स्कीमे किसी भी हद तक छोटी और कम बजट में समेटी जा सकती है ।
इनमें जनहित का कोई विजन नही रखना चाहिए , बल्कि समस्याओं को जिन्दा रखने के लिए टोकन नुमा हल कर दिया जाना चाहिए ।
उदाहरण के लिए - छात्रों को लेपटोप, छात्राओं को साइकिले बांटना,बेरोजगार युवाओं को रोज़गार की जगह 200-500 मासिक भत्ते देना, वृद्ध, विधवा पेंशन व् किरायो में छूट वगेरह, मुफ्त अनाज, तेल, नमक आदि की स्कीमे, आरक्षण के वादे, मुफ्त घरो के वादे, मुफ्त स्कूल बेग, कोपी किताबे बांटना, और भी इस तरह की सेंकडो स्कीमे चलाई जा सकती है ।
सावधानी - समस्या के हल के लिए कभी भी अच्छे क़ानून नही बनाएं, न ही विपक्ष में रहते हुए ऐसे कोई कानूनी ड्राफ्ट दें, न ही कार्यकर्ताओं को कानूनी ड्राफ्ट की जानकारी देवें । ऐसा करने से समस्या का समाधान हमेशा के लिए हो जाएगा और आप खजाना लुटा कर वोट नही बटोर पायेंगे ।
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2. बयान और नारों का राजनीति में महत्त्व :
इस धारावारिक स्तम्भ के प्रथम अंक में हमने यह स्पष्ट किया था कि जिस भी मुद्दे पर आप पार्टी या संघठन चला रहे है उस समस्या पर किसी भी पार्टी को कानूनी ड्राफ्ट नही देना है, क्योंकि यदि एक बार उस समस्या के निराकरण के लिए कानूनी ड्राफ्ट दे दिए, तो उस मुद्दे का नियंत्रण पार्टी के नेताओं के हाथ से निकल कर कार्यकर्ताओ और नागरिको के हाथ में चला जाता है और नेताओं की हैसियत रेजगारी के समान हो जाती है ।
तो फिर आप नागरिको को कैसे भ्रमित कर के रख पायेंगे कि आप अपने मुद्दों के प्रति गंभीर है ?
- जवाब है, विवादित बयान और नारे दीजिये ।
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नारे :
- सुन्दर और छोटे नारे गढ़े , काव्यात्मक और तुकबंदी हो तो और भी बेहतर है ।
- नारे भावुक हो, ताकि कार्यकर्ताओं के दिल में उतर जाएँ ।
- नारों को बार-बार दोहराते रहे, ताकि वे जनता की जबान पर चढ़ जाए ।
- नारों में ललकार और संकल्प 'दिखाई' देता हो ।
- नारों में ऐसे शब्दों का प्रयोग करें जिन शब्दों का उद्घघोष प्रचंड रूप में किया जा सके ।
- हर चुनाव में नये नारे लेकर मैदान में उतरे, क्योंकि नारे काठ की हांडी की तरह होते है ।
- जहां पर भी कार्यकर्ता एकत्र हो वहाँ नारों का बार बार उदघोष करें, इस से नारे जन मानस के पटल पर छा जायेंगे ।
नारे लगवाने के फायदे बनाम क़ानून ड्राफ्ट्स देने के नुकसान :
- नारे समस्या को उठाते है जबकि क़ानून ड्राफ्ट्स समाधान दे देते है ।
- नारे अस्पष्ट और भावुक होते है, जबकि क़ानून ड्राफ्ट्स स्पष्ट और गंभीरता लिए होते है ।
- नारे काल्पनिक और जादुई समाधान सुझा रहे होते है, जबकि क़ानून ड्राफ्ट्स व्यवहारिक समाधान दे देते है ।
- नारे छोटे होते है, और एक मिनिट में सुना कर, दोहरा कर याद करवाए जा सकते है, जबकि कानूनी ड्राफ्ट्स की व्याख्या करने में काफी समय देना पड़ सकता है ।
- नारो में किसी प्रतिप्रश्न का खतरा नही है, जबकि क़ानून ड्राफ्ट रद्दी है तो आलोचना और बहस का सामना करना पड़ सकता है ( और मजबूत और अच्छा ड्राफ्ट देना नही है, ये कोई नई बात नही है )
- नारे साल दो साल बाद बदले जा सकते है, जबकि लिखित ड्राफ्ट की पृकृति स्थायी होती है ।
- रेलियो, जूलुसो आदि में उर्जावान कार्यकर्ताओं से गला फाड़ फाड़ कर 100-50 नारे लगवाकर उन्हें आसानी से ठंडा किया जा सकता है, ताकि उनके कान , गले और सर में दर्द शुरू हो जाए और घर जाकर खाना खाकर चुपचाप सो जाए । जबकि कानूनी ड्राफ्ट की चर्चा शांत वातावरण में होने से कार्यकर्ता लम्बे समय तक अच्छे माहौल में काम कर पायेगा तो आपको उसकी उर्जा चूसने और दिमाग चाटने का अवसर नही मिल पायेगा और इस उर्जा का लाभ उठा कर कार्यकर्ता अच्छे कानूनों की जानकारी प्राप्त कर सकता है ।
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कुछ नारे जिन्होंने कई पार्टी और संघठनो को सत्ता की मलाई खिलाने का अवसर प्रदान किया :
- गरीबी हटाओ ।
- इंदिरा हटाओ । ( इंदिरा हटी पर गरीबी रही )
- रोटी कपडा और मकान, साथ साथ दैनिक उत्थान । (ये तो आज भी बारामासी मुद्दा है)
- 'सिंहासन खाली करो कि जनता आती है' । जनता की जगह मोरारजी आ गए सिंहासन पर ।
- 'मैं एक नौजवान हूँ, मेरे भी कुछ सपने है' । राजिव जी के क्या सपने थे उन्होंने जनता को कभी खुलकर नही बताया, और जनता के सपनो के बारे में जनता से पूछा नही ।
- 'चलेगा पहिया उड़ेगी धूल, न रहेगा हाथ न रहेगा फूल' । पहिया ऐसा चला कि हाथ और फूल के साथ साथ जनता भी उड़ गयी, और 2 साल में वीपी भी उड़ गए ।
- 'अनुभवी हाथो में कमान' । इतने अनुभवी थे कि UN की मदद से पीवी अल्पमत की सरकार 5 साल तक चला ले गए ।
- 'सौगंध राम की खाते है, हम मंदिर वहीँ बनायेंगे' । लाखो लोगो को मंदिर बनवाने में मदद के लिए अयोध्या बुलवाया ।
-'एक धक्का और दो, बाबरी मस्जिद तोड़ दो' । घटना स्थल पर नया नारा लांच किया गया । जो लोग मंदिर बनवाने गए थे, धक्का देकर वापिस घर आ गए । मंदिर अभी तक नक़्शे में बना हुआ बीजेपी कार्यालय में रखा हुआ है ।
- 'यह तो केवल झांकी है, काशी मथुरा बाकी है' । काशी विश्वनाथ और कृष्ण जन्म भूमी का नारा 'ड्राप'। सब भूल गए । लेखक भी भूल गया था, राहुल चिमन भाई ने याद दिलाया ।
- 'सारे देश से नाता है, सरकार चलाना आता है' । कोंग्रेस की इस कला पर किसी को डाउट नहीं ।
- अँधेरा छटेगा, सूरज निकलेगा, कमल खिलेगा । जैसे जैसे कमल खिलता गया कमल का रंग भी धुप में उड़ता गया । 1990 में पूरा केसरिया था, अब पूरा सफ़ेद हो गया है ।
- अबकी बारी अटल बिहारी । 1952 से ही अटल जी बारी का इंतज़ार कर रहे थे, जनता पसीज गयी ।
- कहो दिल से अटल फिर से ।
- 'भारत उदय' । जनता नही मानी, कहा भारत को 7 साल से आप ही अस्त कर रहे हो । अब दस साल तक भारत को कोंग्रेस अस्त करेगी ।
लब्बेलुआब यह कि समस्या उठा कर सत्ता में पहुँचने के लिए नारे ही वैतरणी का कार्य करते है ।
सत्ता मै आने के बाद नारे को गायब कर दीजिये, समस्या भी ऑटोमेटिक गायब हो जायेगी । नए चुनाव में नया नारा नयी समस्या ले आइये ताकि समाधान के चक्कर में पड़ना ही नही पड़े ।
उदाहरण के लिए मान लीजिये कि जिस राम मंदिर के मुद्दे को बीजेपी पिछले 25 साल से घसीट रही है, वो नारों के भरोसे ही घसीट पा रही है ।
फ़र्ज़ कीजिये कि बीजेपी ने राम की सौगंध खाने के नारे की जगह यदि राम मंदिर बनाने का कानूनी ड्राफ्ट दिया होता कि 'यदि हम बहुमत से सत्ता में आते है तो संसद में राम मंदिर निर्माण करने के इस अमुक ड्राफ्ट को पारित करेंगे' तो बीजेपी को लेने के देने पड़ जाते । क्योंकि अब तक उस कानूनी ड्राफ्ट की करोडो प्रतियां नागरिको के हाथ में पहुँच चुकी होती, और जनता द्वारा यह दबाव बनाया जा सकता था कि 'यह अमुक ड्राफ्ट आप ही के द्वारा वितरित या प्रस्तावित किया गया है अत: इस क़ानून को संसद से पास करके राम मंदिर निर्माण को सुनिश्चित कीजिये ।
ऐसी स्थिति में M टर्न लेने, कमेटी वगेरह बनाने, बहस शुरू करवाने और बातचीत के जरिये 'आम सहमती' बनाने के बयान देकर टाइम पास करना मुश्किल हो जाता और बीजेपी अपने कार्यकर्ताओं के सामने एक्सपोज़ हो जाती ।
*ज्ञातव्य है कि भारतीय संविधान किसी भी न्यायधीन मामले में संसद को क़ानून बनाने या अपने चमचो की का एक आयोग बना कर मामले को अपनी रुचि से निपटाने की शक्ति देता है ।
तो इस प्रकार की सेंकडो समस्याएं कोई भी पार्टी द्वारा नारो के रूप में ही उठायी जानी चाहिए , न कि कानूनी ड्राफ्ट के रूप में । ताकि कार्यकर्ताओं का टाइम और उर्जा नारे बाज़ी में खर्च करवा के जनाधार बनाए रखा जा सके । .. जारी
प्रजा अधीन राजा @ pk