Pawan Jury BhilwaraRj
'पार्टी पोलिटिक्स'
धारावारिक स्तम्भ : भाग - 2
पिछले अंक में हमने पार्टी या संघठन के बेसिक मुद्दों और कार्यकर्ताओं का टाइम वेस्ट कर के संघठन में बनाए रखने की कला पर चर्चा की थी, इस अंक में सदाबहार और मौसमी मुद्दों पर तब्सरा करेंगे ।
...
ब. सदाबहार मुद्दे- कुछ मुद्दे ऐसे होते है जिनकी प्रासंगिकता कभी ख़त्म नही होती, ये ऑल टाइम हिट की तरह होते है । लगभग क्लासिक नुमा ।
इनकी खोज 1947 के बाद हुए पहले आम चुनावों में की गयी थी ।
ये मुद्दे तब से आज तक जारी है और किसी क्लासिक फिल्म की तरह हमेशा 'रश' खींचते है ।
उदाहरण के लिए पेयजल की किल्लत, भुखमरी, गरीबी, रोटी कपड़ा और मकान, बेरोजगारी, बिजली, विकास, सामाजिक न्याय, सड़के, नालियाँ, जनता का राज, व्यवस्था परिवर्तन, भय मुक्त प्रशासन, महंगाई आदि आदि ।
लगभग सभी पार्टियों की झोले में यह मुद्दे पड़े रहते है और समय समय पर इन्हें निकाल कर जनता के सामने पेश किया जाता है ।
हर पार्टी को चाहिए कि समय समय पर इन्हें लगातार उठाते रहे वरना देखा गया है कि कुछ चतुर नेता सदाबहार मुद्दों को हाईजेक करके उसे मूल मुद्दा बना लेते है और उस पर पार्टी खड़ी कर लेते है ।
मिसाल के लिए बीजेपी के सभी राष्ट्रीय नेता जब वातानुकुलित कक्षों में बैठ कर सिर्फ बयानों और टीवी डिबेट की राजनीति कर रहे थे तब अचानक केजरीवाल ने पेड मिडिया के सपोर्ट से सड़क पर उतर कर ष्टाचार के मुद्दे को झटक लिया और पार्टी खड़ी कर ली ।
हालांकि सभी पार्टिया अभी भी इस मुद्दे को सदाबहार मुद्दों की लिस्ट में डालने के लिए संघर्ष रत है ।
...
सदाबहार मुद्दों को 'हेंडल' करने के तरीके :
सदाबहार मुद्दों को आंशिक रूप से हल करते रहे, क्योंकि अपनी उपलब्धियां गिनवाने में यह सब काम आती है ।
जैसे यदि आप सबको मकान देने का वादा कर रहे है, तो 10 लाख घरो की जगह 10 हज़ार घर बनवा दे । लेकिन भूल कर भी पूरी समस्या को हल न करे । मतलब ऊंट के मुंह में जीरा छिड़कते रहे ।
तरीका - इसके लिए योजनाये चलायें, कभी भी क़ानून पास नही करे ।
योजनाएं चलाने के लाभ :
- योजनायें अस्थाई पृकृति की होती है , कभी भी उसको बंद किया जा सकता है या लंबित किया जा सकता है । मतलब स्टेयरिंग आपके हाथ में रहता है ।
- योजना का प्रचार करने के दो तीन वर्ष बाद उसे बजट देना बंद किया जा सकता है, इस तरह योजना का दम तोड़ा जा सकता है ।
- योजना अपने नेताओं के नाम पर चलाने से नेता और पार्टी का खूब सारा प्रचार सरकारी पैसे से मुफ्त में हो जाता है ।
- योजनाओं या स्कीमो में भारी बजट देकर जम कर पैसा हडपने का अवसर मिलता है ।
- जब सत्ता परिवर्तन होता है तो नई सरकार फंस जाती है, योजना जारी रखती है तो आप का प्रचार होता है इसलिए योजना या तो बंद कर दी जाती है या फिर बजट रोक दिया जाता है । इस तरह आप मुद्दे को पुनर्जीवित कर सकते है कि 'यदि हम सत्ता में आये तो फिर से इस योजना को चालू कर देंगे' ।
- योजनाओ में 'अपने आदमियों' को फिट करके उन्हें आय के अवसर मुहैया करवाए जा सकते है ।
- योजनाओ द्वारा स्थानीय कार्यकर्ताओं को उपकृत करने का अवसर भी बना रहता है ।
सावधानी :
- भूल कर भी समस्या के निराकरण के लिए काननू पास न करे, न ही कार्यकर्ताओं को ये जानकारी होने दें कि समस्या का स्थाई समाधान क़ानून है ।
- इस से कार्यकर्ता आपको समाधान का ड्राफ्ट देने को कहेंगे, और यदि आपने ड्राफ्ट दे दिया तो आपको क़ानून पास करना पड़ेगा । इस से समस्या का स्थायी समाधान हो जाएगा और आपके हाथ से मुद्दा हमेशा के लिए निकल जाएगा ।
उदाहरण के लिए मान लीजिये कि आप देश से गरीबी हटाने का वादा करके सत्ता में आते है और इसके निवारण के लिए DDMRCM क़ानून पास कर देते है । इस क़ानून के पास होने से देश की खनिज सम्पदा के खनन से प्राप्त रोयल्टी 75 करोड़ नागरिको के खाते में सीधे जमा होने लगेगी । तो हर नागरिक को 700 रू महिना और 5 व्यक्तियों के परिवार को 3500 रू का चेक हर महीने मिलने से गरीबी हमेशा के लिए ख़त्म हो सकती है ।
इस से एक तो आपके हाथ से बैठे बिठाए 67 साल पुराना मुद्दा हाथ से निकल जाएगा ऊपर से जो खनिज को आप उद्योगपतियों के साथ मिल कर लूट रहे है वो कमाई भी बंद हो जायेगी ।
इसलिए इस प्रकार के कानूनी समाधानों से बचे और कार्यकर्ताओं को भी बचाए रखे । इसी में पार्टियों की भलाई है ।
आप खुद सोचिये कि जब गरीब ही नही बचेंगे तो आप गरीबी हटाओ के नारे किसे सुनायेंगे ?
इसलिए मुद्दों को कभी क़ानून बनाकर स्थाई रूप से हल नही करे, बल्कि उन पर राजनीति करे ।
...
मौसमी मुद्दे - ये मुद्दे मुहांसों की तरह होते है, और चेहरे पर आते जाते रहते है । ज़्यादातर करके इनका कोई इतिहास नही होता और न ही लम्बा भविष्य होता है, ये किसी औचक घटना से प्रकट होते है और न दो चार दिन या महीने दो महीने में स्वत: गायब हो जाते है या कर दिए जाते है ।
पेड मिडिया इनकी खुराक पर ही पलता है, कभी कभी इन मुद्दों की आयु 1-2 दिन ही होती है ।
नया 'माल' मार्केट में आते ही ये हट जाते है । इन मुद्दों में मनोरंजन की प्रधानता होती है , इस प्रकार ये मुद्दे सभी पार्टीयो और पेड मिडिया की रोज़ की खुराक होती है ।
उदाहरण के लिए - आलू प्याज टमाटर के भाव बढ़ना, पेट्रोल डीज़ल की कीमते, अपहरण, बलात्कार की घटनाएं,नेताओं की तू तू मै मै के विवाद, कभी राखी सावंत, कभी मल्लिका, कभी वेद प्रताप वैदिक और तरुण तेजपाल और कभी न जाने क्या क्या ।
इनकी सूची अंतहीन है, रोज आते है रोज जाते है ।
...
ये मुद्दे पूरी तरह से यूजलेस होते है, इनमे खबर का तत्व जीरो होता है, 100% जीरो । फुल फ्री रहने वाले कार्यकर्ताओं को 365 ही दिन इनमे व्यस्त रखा जा सकता है ।
देश की जनता और कार्यकर्ताओं के टाइम को बहुत बड़े पैमाने पर वेस्ट करने के लिए इनका इस्तेमाल करना चाहिए ।
करोडो नागरिको को पार्टियां और पेड मिडिया रोज इन फ़ालतू और बेकार के मुद्दों (जो कि मुद्दे ही नही है ) पर व्यस्त कर के रख सकती है । ताकि कार्यकर्ता इस भ्रम में रहे कि यही आज की बड़ी खबर या मुद्दा है । इस तरीके से कार्यकर्ताओं का सारा उपयोगी समय खींच लिया जा सकता है जिस से कार्यकर्ताओं का ध्यान मूल मुद्दों जैसे सेना को मज़बूत करना और सव्देशी हथियारों के उत्पादन आदि पर नही जा पाता ।
सभी पार्टियों को चाहिए की कार्यकर्ताओं को अच्छे कानूनों का प्रचार करने से रोकने के लिए इन टाइम पास गतिविधियों में उलझाए रहे ।
प्रजा अधीन राजा @ pk